मणिकर्णिका मूवी भारत के गौरवशाली नारी इतिहास

समकालीन हिंदी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ निधि है ये मूवी।भारत के गौरवशाली नारी इतिहास का इससे अद्वितीय फिल्मांकन असंभव है ,नारी सुरक्षा के ज्वलन्त पैरोकारों को चाहिये की सरकारी स्तर पर इस मूवी को टैक्स फ्री किया जाए और देश की  सभी बेटियों को इसे निःशुल्क दिखाने की व्यवस्था भी हो।देश भर के राज्यों में कार्यरत महिला बाल विकास के आला अफसरों में अगर अपने महकमें के प्रति जरा सी भी प्रतिबद्धता है तो इस आशय का निर्णय लिया ही जाना चाहिये कि सभी बेटियों के लिये जो करोडों की धनराशि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान में सिर्फ अखबारी विज्ञापन पर जाया की जा रही है उसमें से कुछ राशि इस मूवी के लिये हर जिले में प्रावधित कर दें।जो सन्देश औऱ आत्मगौरव का भाव आपके करोड़ो के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विज्ञापन नही पैदा कर सके वह काम कंगना रनोत की यह अदभुत मूवी कर सकती है।

भारतीय सिनेमा की महानतम अदाकारों की मौजूदा प्रतिनधि के रूप में कंगना का अभिनय बेमिसाल है जो कला प्रेमी है उनके लिये तो यह मूवी गजब की है ही लेकिन इसका जो दूसरा पक्ष है वह उन जेंडरवादियों के लिये करारा तमाचा भी है जो भारत की नारी शक्ति को अबला के रूप में प्रतिस्थापित कर नारीवाद की नकली दुकान चलाते रहते है।मणिकर्णिका यह  साबित करती है कि  भारत की भूमि पर नारी सिर्फ पौराणिक आख्यानों में ही दुर्गा का अवतार नही है वह असल जीवन मे भी मणिकर्णिका बनकर जनरल ह्यूरोज जैसे जल्लादों को आजादी की पहली लड़ाई में अकेला मर्द लिखने के लिये मजबूर करती है।मूवी में अपने घोड़े से जनरल ह्यूरोज को घसीटते हुए कंगना का अभिनय प्रशंसा की सभी सीमाओं से परे है।जो जेंडरवादी भारत मे नारी को दयनीय औऱ लोकजीवन में दोयम रुप मे निरूपित करते आये है उनके लिये यह मूवी अवश्य देखना चाहिये कि कैसे एक साधारण लड़की पेशवा के वात्सल्य में बगैर किसी डिस्क्रिमिनेशन के लालन पालन में जीवन के सभी स्त्रियोचित औऱ पुरुषत्व के हुनर सीखती है,कैसे वैधव्य की कुरीतियों को उस दौर में सफलतापूर्वक चुनोतियाँ देकर खुद के अंतर्निहित औऱ अर्जित किये गए आत्मविश्वास के बल पर स्थापित सत्ता की चूल्हे हिला सकती है,जिस समय इन नारीवादियों के पितामह जर्मनी में पैदा भी नही हुए होंगे तब बुंदेलखंड की वीर भूमि पर बाबा विश्वनाथ के आशीर्वाद से एक मणिकर्णिका समाज को नेतृत्व दे रही थी वह भी आत्मीय रिश्तों के बल पर न कि वर्ग  संघर्ष की खोखली बुनियाद पर।एक रानी के रूप में प्रसाशक की योग्यताओं,अपनी मातृभक्ति की प्रमाणिकता ,अदम्य साहस,कुशल संगठक,औऱ एक संस्कारी पत्नी,बहु,माँ के रूप में भारत की बेटी का सार्वजनीन चेहरा है मणिकर्णिका जिसे एक मूवी के रूप में बहुत ही सरल रोचक और सहज शैली में फिल्माया गया है।

मौजूदा दौर की हमारी पीढ़ी अपने आत्मगौरव से वंचित है इतिहास लेखन की  अक्षम्य विकृतियों ने हमारी पीढ़ी को आत्मगौरव से शून्य बनाने का जो षड्यंत्र रचा है उसी का नतीजा है कि आज जेएनयू जैसे कैम्पस में जब भारत के टुकड़े करने की कर्कश स्वर बुलन्द होते है तो शहला रशीद,कन्हैया कुमार,औऱ अनिर्बान जैसे लोगो के पक्ष में हमारे ही भाई बहन खड़े नजर आते है।यह आत्मगौरव की वंचना से उपजी मानसिकता ही वरन मणिकर्णिका को इस उदघोष की क्या आवश्यकता थी कि तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहे न रहे।

यह मूवी सरकारी औऱ गैर सरकारी सरंक्षण में प्रदर्शित किये जाने की आवश्यकता इसलिये भी है क्योंकि आज की पीढ़ी पढ़ने से ज्यादा देखने मे यकीन करती है पढ़ने के लिये लोग तैयार नही है क्योंकि देश की नई आर्थिक नीतियों ने राजनीति को इस तरह शिकंजे में ले रखा है कि राजनीति का ध्येय नागरिकों से नागरिक बोध खत्म कर उन्हें या तो उपभोक्ता बनाये रखा जाए या मूड मति वोटर।उपभोक्ता आज मोबाइल पर जीवित है इसलिये आज की भाषा मे मूवी सबसे सशक्त माध्यम है देश की महान परम्पराओ को जीवित रखने में।इसलिये सरकारो  को चाहिय की वे इस मूवी को हमारी मातृशक्ति के लिये देखने की व्यवस्था करें।

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