शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यजक्ति में आत्मषज्ञान का बोध कराने के साथ ही उसे प्रबुद्ध और जागरुक बनाने में सहायक हो: उपराष्ट्रपति

उपराष्‍ट्रपति एम. वैंकेया नायडू ने कहा है कि स्‍कूलों,कॉलेजों और विश्‍वविद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्‍यक्ति में आत्‍मज्ञान का बोध कराने के साथ ही उसे प्रबुद्ध और जागरुक बनाने में सहायक बने। श्री नायडू आज हैदराबाद में आंध्र विद्यालय कॉलेज ऑफ आर्ट, साइंस एंड कामर्स के दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर तेलंगाना के शिक्षा मंत्री श्री जगदीश रेड्डी और अन्‍य गणमान्‍य लोग भी उपस्थित थे।


उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि 2020 तक भारत की युवा आबादी की औसत उम्र 28 वर्ष पर सीमित हो जाएगी, जबकि चीन और अमेरिका में यह 37, पश्चिमी यूरोप में 45 और जापान में 49 वर्ष होगी। उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास में जनसंख्या का स्वरूप, बदलाव की बड़ी भूमिका निभाता है।


श्री नायडू ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं, गुणवत्तायुक्त शिक्षा तथा रोजगार और कौशल विकास के जरिए एक सक्षम मानव संसाधन बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हालांकि मानव संसाधन विकास की दिशा में भारत ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है लेकिन इसके बावजूद वह निरक्षरता, माध्यमिक स्कूली शिक्षा, निम्न स्तर की जनसेवाओं और लैंगिक भेदभाव जैसी बड़ी बाधाओं से जूझ रहा है। ऐसे में देश को नई प्रौद्योगिकी के अवसरों का लाभ उठाते हुए ज्यादा प्रभावी शिक्षा नीति बनाने की जरूरत है।


श्री नायडू ने कहा कि देश में लैंगिक जागरुकता के माध्यम से लैंगिक समानता और महिलाओं की सुरक्षा पर नए सीरे से ध्यान देने की आवश्यकता है। लैंगिक जागरुकता का काम परिवार, स्कूल और कॉलेजों से ही शुरू कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने शिक्षण संस्थानों से अपील की कि वह ज्यादा से ज्यादा युवा महिलाओं को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करें।


उन्होंने कहा कि रोजगार के अवसर होने के बावजूद कई बार उसके लायक दक्ष लोग नहीं मिलते। इसे ध्यान में रखते हुए अक्‍टूबर 2016 में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 2.0 शुरु की गई थी। इसके तहत चार साल की अवधि में एक करोड़ युवाओं को कौशल विकास प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है।


शिक्षा के सामान अवसर पर जोर देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इसके लिए महिलाओं और लड़कियों, अनुसूचित जाति और जनजाति, दिव्यांगजनों और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को उच्च शिक्षा के लिए बाधामुक्त और सामान अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है।


उन्होंने सौ साल पहले दिए गए स्वामी विवेकानंद के उद्बोधन - "उठो, जागो और तबतक नहीं रुको जब तक लक्ष्‍य प्राप्‍त नहीं हो जाए" का हवाला देते हुए कहा कि यह दुनिया अवसरों से भरी पड़ी है लोगों को इसका लाभ उठाना चाहिए।  


 


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