खुद की चन्द्र पैसो में स्तुतिगान कराने बाले समझे!!प्रो.पी.डी.खेरा के जीवन का उद्देश्य


व्यापार चाहे शिक्षा का हो या खाना बेचने का उस व्यापार से एक के दो, दो के चार व्यापार खडे कर लेने बाले आजकल महान बनने के लिए लाइन में खडे हो गये है। जब हम नौकरी या व्यापार  अपने परिवार के लिए करते है तो फिर जो है वही रहे और अगर कुछ करना है तो सबक ले प्रो.खेरा से जिन्होने वास्तव में सब कुछ छोडा,आप भी छोडे और महान बने! त्याग कुछ नहीं जिन्दगी भर डन्डी मारी और अब महान?महान क्या होता है पढे- छतीसगढ़ के बिलासपुर जिले के अचानकमार टाईगर रिजर्व के वनग्राम लमनी छपरवा में विनोबा भावे की तरह दिखने वाला एक शख्स जंगलों के बीच बनी झोपड़ी में पिछले 33 साल से रह रहा था। नाम थौ डा.प्रोफेसर प्रभुदत्त खेरा। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में 15 साल तक समाजशास्त्र पढ़ाते रहे है। सन 1983-84 में एक दोस्त की शादी में बिलासपुर आना हुआ। उसी के बाद जंगल घूमने गए । वहां एक आदिवासी बच्ची को फटी पुरानी फ्राक में बदन छिपाते देखकर उन्हें कुछ ऐसी अनुभूति हुई कि सुई धागा लेकर उसकी फ्राक सिलने बैठ गए।इस दौरान वे वहीं रेस्ट हाउस में रुककर वहां बसने वाले बैगा जनजाति के लोगों के रहन सहन को देखते समझते रहे. इन लोगों की हालत और सरकार की बेरुखी देखकर प्रो.खेरा का मन इतना व्यथित हुआ कि उन्होंने प्रोफेसर की नौकरी छोड़ दी और दिल्ली का ऐशो आराम छोड़कर लमनी के जंगलों में ही आ बसे। 33 सालों से बैगा आदिवासियों की सेवा और उनका जीवन सुधार ही प्रो.पी.डी.खेरा के जीवन का उद्देश्य रहा है। 80 साल की उम्र में वे संरक्षित बैगा जनजाति के बच्चों को शिक्षा देते हुए इस दुनियां से इस वर्ष विदा हो गये।शिक्षा देकर कोई महल,अटारी,कार नहीं खरीदी अपनी पेशन से बच्चों को शिक्षा देते रहे।


 


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