और लेखनी भी जुट गई सेवा कार्य में

कोरोना (कोविड-19) एक ऐसा संकट है जिससे आज भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व इसकी चपेट में हैं। इस महामारी ने विश्व में ऐसी तबाही मचा रखी है कि मानवता भी चीख पड़ती हैं। विश्व की महाशक्तियाँ भी इसके आगे धराशायी हो गयी लेकिन भारत में आज भी उम्मीद की किरणें दिखाई दे रही हैं। अभी तक हम इस महामारी पर और इससे उत्पन्न दुष्वारियों पर यथासम्भव नियन्त्रण करने में सफल रहे हैं। जब सारा देष अपने घरों में कैद होने को मजबूर है, सम्पूर्ण देष के शहर, गाँव गली ढ़ाई महीने तक लाकडाउन की स्थिति में रहने के बाद आज भी जीवन्त नहीं हो पा रहे हैं, आवागमन के साधन यहाँ तक कि आवष्यक सेवाओं को छोडकर दोपहिया वाहन भी तीन महीने से खड़े हुये हैं, औद्योगिक प्रतिश्ठान, व्यापारिक केन्द्र, दुकानें आदि बन्द पड़ी हैं, लोगों के सामने विषेशकर रोज कमाने खाने वालों के सामने रोजगार का संकट है। ऐसे समय में सामाजिक संस्थाओं, विशेष रूप से संघ और उसके आनुशंगिक संगठनों ने इन असहाय, गरीबों, जरूरतमन्दों की सेवा करने का बीड़ा उठाया और निकल पड़े घरों के बाहर सेवा कार्य करने। नर सेवा-नारायण सेवा का मूलमन्त्र ही एक राश्ट्रभक्त का ध्येय होता है अतः बिना किसी भय के इस जानलेवा बीमारी की चिन्ता न करते हुए निर्बल निरीहों की सहायता करना अखिल भारतीय साहित्य परिशद् ने अपना लक्ष्य बना दिया। इस महामारी के समय संगठन की    गतिविधियाँ सामान्य समय से बहुत बढ़ी हुई रहीं।
कोरोना काल के लाकडाउन में अखिल भारतीय साहित्य परिषद उ.प्र. ने भी अपने सहयोगियों के साथ जुट पड़ने का आह्वान किया और इस पुनीत कार्य में देखते देखते अनेक बुद्धिजीवी, साहित्यकार बंधु, बहिनें, जीवन की परवाह किये बिना अपने शहर गाँव की निर्धन बस्तियों में जा जा कर सेवा कार्य करने लगे। उन्हें भोजन सामग्री, मास्क, सेनेटाइजर एवं अन्य जीवनोपयोगी बस्तुओं, दवायें आदि वितरित कर कोरोना से बचाव के तरीके बताकर उन्हें जागरूक किया जाने लगा। यह क्रम लगातार ढ़ाई महीने तक चलता रहा। लेखनी पकड़ने वाले हाथ सेवाकार्य से जुड़कर यहाँ भी उत्तम से उत्तम कार्य करने में अग्रणी रहे।
यह खेद का विषय है कि इस संकट काल में कुछ राष्ट्रविरोधी संगठन एवं असामाजिक तत्व भी सक्रिय हो गये जो सामाजिक ताना-बाना बिगाड़कर जातिगत, क्षेत्रगत विद्वेश फैलाकर इस देश को कमजोर करना चाहते थे। ऐसे लोगों ने देश के विभिन्न प्रदशों के बड़े औद्योगिक नगरों में अन्य प्रदेषों के कामगार बंधुओं मजदूरों के प्रति झूठी अफवाहें फैलाकर क्षेत्रवाद व जातिवाद के नारे उछालकर, लोगों को भड़काकर, बैमनस्य उत्पन्न करके पलायन करने को मजबूर कर दिया। देश में स्थिति एक बार पुनष्च सन 1947 के विभाजन जैसी पलायन की हो गयी। फलस्वरूप लाखों कामगार मजदूरों को शहर छोड़कर सैकड़ों हजारों किलोमीटर दूर अपने गाँव जाना पड़ा। पैदल ही सुदूर गाॅव जा रहें मजदूरों के लिये माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने पूरी संवेदना के साथ साधन व सुविधाएँ उपलब्ध करायी एक तरफ अन्धेरा है तो दूसरी ओर प्रकाश भी होता है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी ने जिस सम्वेदना के साथ सभी का साथ दिया, परिवहन, भोजन, दवाइयों और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध करवायी इसे देख सभी कामगार मजदूर आत्मविष्वास के साथ अपने गाॅव लौटे। जैसे ही संघ व अन्य संगठनों को इसकी जानकारी हुई यहाँ भी हम अपने लोगों की सेवा करने में, भोजन पानी, दवा आदि देकर तथा यथासम्भव स्थानीय प्रशासन व उदारवादी दानशील लोगों के सहयोग से परिवहन साधन की व्यवस्था कराकर उन्हें उनके गन्तव्य तक पहुँचाने में सहयोग करते रहे। अखिल भारतीय साहित्य  परिषद के कार्यकर्ता भी विभिन्न जिलों में सेवा भारती के साथ मिलकर सेवाकार्य में जो सहयोग किये वह प्रशंसनीय है।
सेवाकार्य के साथ ही साथ परिषद की गतिविधियाँ बौद्धिक स्तर पर भी गतिषील रहीं। संगठन की जीवन्तता बनाये रखने हेतु अनेक स्तरों पर साहित्यिक संगोष्ठियों का आयोजन भी समय-समय पर किया गया।
उत्तर प्रदेश साहित्य परिषद् के द्वारा अ.भा. साहित्य परिशद की राश्ट्रीय स्तर पर एक संगोश्ठी का आयोजन किया गया जिसमें देश के सभी प्रदेशों के पदाधिकारियों ने ई0 वेबिनार के रूप में प्रतिभाग किया। संगोश्ठी का विशय-‘स्वदेशी अवधारणा और यथार्थ‘ था, जिसमें देश के विद्वत वक्ताओं ने स्वदेशी की अवधारणा पर अपने उद्बोधन से मार्गदर्षन किया।
उ.प्र. साहित्य  परिषद द्वारा साहित्य संगोष्ठी (वेविनार) का आयोजन अलग-अलग तिथियों में किया गया। जिसके तीन विषय मुख्य थे। पहला ‘स्वदेशी अवधारणा और यथार्थ‘ दूसरा ‘अपनी बोली अपना गाँव‘ एवं तीसरा ‘अपने लोक देवता-ग्राम देवता‘। तीनों विषयों के माध्यम से भारतीय संस्कृति की जड़ें ग्राम्य स्तर तक किस तरह जुड़ी हुई है, इस पर विस्तार से चर्चा की गयी।
उत्तर प्रदश साहित्य परिषद द्वारा प्रान्त स्तर पर उत्तर प्रदेश के छहो प्रान्तों की संगोश्ठी का आयोजन क्षेत्रवार ‘अपनी बोली अपना गाॅव’ विषय पर किया गया जिसमें सभी 75 जिलों में गाॅवों तथा महानगरों के पदाधिकारियों सहित प्रान्तीय कार्यकर्ताओं की सहभागिता रही। इतने व्यापक आयोजन के लिए हम अपने समस्त सहयोगियों को साधुवाद देते हैं।
 साहित्य परिषद की इन ई-गोष्ठियों का मूल उद्धेष्य भारत की मूल ईकाई गाॅव की भूमिका, स्थानीय बोली एवं ‘अपने लोक देवता-ग्राम देवता‘ से जुड़कर देष की संस्कृति को अक्षुण्ण तथा षक्तिषाली बनाने का लक्ष्य रहा। नर सेवा नारायण सेवा का मूल मंत्र ग्राम से जुड़ना और जरूरतमन्दों की मदद करना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति एवं भगवत आराधना है यह संदेष इन गोश्ठियो के माध्यम से दिया गया। 
लाकडाउन काल में साहित्य परिषद के बंधु, बांधवियों द्वारा अपनी लेखनी के माध्यम से इस महामारी के सम्बन्ध में, बचाव के उपाय, तथा लोगों को जागरुक करने के उद्देष्य से अनेक कहानी, लेख, कवितायें, गीत, छन्द आदि भी लिखे गये। लोगों को कोरोना से भयभीत न होकर उससे बचाव करते हुये अपने जीवन को जीवन्त बनाये रखने की पे्ररणा इस सद्यःरचित साहित्य के माध्यम से दी गई। डाॅ0 शिवमंगल सिंह ‘मंगल‘ द्वारा रचित एक गीत की कुछ पंक्तियाॅ यहाँ उद्धृत करना मैं आवष्यक समझता हूँ क्योंकि यह गीत एक नई ऊर्जा का संचार करने की प्रेरणा देता हैं -
 ‘‘सहन कर लो मुसीबत को, घड़ी ये बीत जायेगी।
 उगेगा फिर नया सूरज, सुहानी भोर आयेगी।।
 घटायें हों घनी काली, उड़े जब धूल अम्बर में,
 गुजर जायेगा तूफाँ ये, खुशी चहुँ ओर छायेगी।।
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 जहाँ निर्बल निरीहों का खुला अपमान होता हो, 
 अड़ा दो वक्ष फौलादी, तो दुनिया गीत गायेगी।
 नदी के बीच भँवरों में, फँसी हो डोलती बेबस,
 बढ़ो ले हाथ पतवारें, ये नैया पार जायेगी।।
अभी खतरा टला नहीं है। कोरोना महामारी अभी भी दिन प्रतिदिन सुरसा की भाँति मँुह फैला रही है। हमें अब हनुमान की तरह बुद्धि, विवेक बल से इससे निपटने के लिये युक्ति से काम लेना होगा। आवश्यक सावधानियों के साथ अपने समाज व राष्ट्र पर ध्यान देना होगा। हम अपने आस पास रहने वाले निर्धन जरूरतमंदो की यथासम्भव सहायता करते रहें, साथ ही देष विरोधी असमाजिक तत्वों पर भी अपनी पैनी दृष्टि से उन्हें पहचान कर उनका प्रतिरोध करना भी हम सबका दायित्व है। यही हमारी सच्ची राष्ट्र सेवा है। अखिल भारतीय साहित्य परिशद की लेखनी जब भी उठे राश्ट्र एवं राश्ट्रीय जनमानस के कल्याणार्थ ही उठे। यही अपेक्षा है।


(इस महामारी (कोविड-19) के समय जब देष लाॅकडाउन में था और लोग घर से निकलने में संकोच करते थे उस समय सामान्यकाल से अधिक संगठन का कार्य हुआ। उसी अनुभव के आधार पर यह लेख)


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