चंद्रमा का पृथ्वी भ्रमण

 हमारे जैसे प्रातः भ्रमण को कृत संकल्पित व्यक्ति सुबह साढ़े सात बजे के आसपास भ्रमण पर निकलते हैं क्योंकि हमारे मोबाइल का मुर्गा सात बजे बाग देता है ।ऐसे ही एक दिन पार्क में आठ बजे तथाकथित महान ज्ञानी,विद्वान एवं उपदेशक श्रीमान नगीना प्रसाद से मुलाकात हो गई। सामान्य रूप से उनको देखकर भ्रमणार्थी अपनी दिशा परिवर्तित कर देते हैं,किंतु उस दिन आमने सामने से टकराव हो जाने से दिशा परिवर्तन का विकल्प ही नहीं बचा। मुर्गा फंसता देख वे अपनी औकात पर आ गए ओर पूछा, "खैरा जी,बहुत दिनों बाद दिखे!"
            हम बोले,  "क्या करें साहब, स्वास्थ्य खराब था।"
           उन्होंने अवसर लपक लिया और बोले, "ब्रह्म बेला में घूमा करें ,शुद्ध वायु से  फेफड़े और हृदय स्वस्थ होंगे, तो आप स्वस्थ रहेंगे।"
           मैंने पूछा, "आप ब्रह्म बेला में क्यो नही घूमते?"
           वे चहक उठे,"मैं तो स्वस्थ हूं यह देखो स्मार्ट वॉच,6875 मीटर चल चुका हूं,।हां,अब रिटायर हो गया हूं तो लेट उठता हूं।एक बार ब्रह्म बेला में निकला था,एक बाबा मिल गए,वे हवा खा रहे थे।मैंने पूछा तो बोले ब्रह्म बेला की वायु में गजब की जीवन शक्ति होती है। मैं तो यही खाता हूं और फिर दिनभर कुछ नहीं लेता।"
          मैंने कहा,"इन बाबा जी को खाद्य मंत्री बना दिया जाए तो देश की खाद्य समस्या का समाधान हो जाएगा।"
          वे बोले,"इसके बाद वे कभी मिले नहीं।अरे हां, कहीं पढ़ा था ब्रह्म बेला में अच्छी आत्माएं घूमने निकलती हैं ।आप तो आध्यात्मिक व्यक्ति हैं, शायद आप से टकरा जाएं।"
           उनकी बातें मुझ पर प्रभाव डालने लगी मैंने उत्सुकता से पूछा,"ब्रह्म बेला कब होती है?"
          वे बोले," रात के अंतिम पहर में।"
          मैंने फिर पूछा,"अंतिम पहर कब?"
          "हम सब बता देंगे तो तुम क्या करोगे, मुझे घर जाना है।"कहते हुए वे तेजी से आगे बढ़ गये।
           मैं समझ गया कि उनकी ज्ञान क्षमता ने जवाब दे दिया है।घर आकर गूगल बाबा से पूछा,तो समझा,ब्रह्म बेला रात के अंतिम पहर रात तीन से सुबह छह के बीच कभी होती है।दूसरे दिन सुबह चार बजे उठा और पार्क के लिए रवाना हो गया।पार्क में सन्नाटा पसरा हुआ था,आदमी तो दूर चिड़िया भी नहीं दिखाई दे रही थी।मैं डर से थरथर कांपने लगा।तभी दूर धवल वस्त्र में एक साया हिलता-डुलता नजर आया,मैं सिहर उठा। कहीं यह भूत वूत तो नहीं!अंतरात्मा बोली,भूत ब्रहम् बेला में नहीं,आधी रात को घूमने निकलते हैं।मैंने चैन की सांस ली और हिम्मत कर साए के करीब पहुंचा।वह एक सुंदर पुरुष था जिसकी गोल मुखाकृति थी रंग गोरा था एवं चेहरे पर कहीं-कहीं काले दाग थे।मैं उसके साथ साथ चलने लगा,परिचय बढ़ाने की दृष्टि से पूछा,"आप भी यहां घूमने आते हैं,कभी दिखे नहीं?"
          वह बोला, "कभी-कभी,पर आप भी तो कभी दिखे नहीं।"
          "मैं विलंब से आता हूं सूर्योदय के बाद।" मैंने उत्तर दिया।
          "तब तक मैं चला जाता हूं ।"उसने कहा।
          "तब तो आप तीन बजे सुबह उठ जाते होंगे?"मैंने जिज्ञासा बस पूछा।
          "नहीं पूरी रात जागता हूं।"उसने उत्तर दिया।
          "आप पुलिस में नौकरी करते हैं या अस्पताल में।"मैंने पूछा।
           "दोनों से भगवान बचाए।"उसने उत्तर दिया।
             अब वह मुझे रहस्यमय लगने लगा। उस से पीछा छुड़ाने के लिए मैं तेजी से चलने लगा,वह समझ गया और बोला,"डरो मत, मैं चंद्रमा हूं।"
              मैंने आश्चर्य से पूछा,"आप चंद्रमा है, रहते कहां हैं?"
             " हां चन्द्रमा हूं,आकाश में रहता हूं।"उसका उत्तर था।
             "आकाश में कहां?"मेरा प्रश्न था।
             "अपने निर्धारित मार्ग पर घूमता हूं।उसने उत्तर दिया।
              तभी मुझे ठोकर लगी, मैं डगमगाया तो वह बोला,"संभल कर चलिए,मैं तो आकाश में लटका रहता हूं फिर भी नहीं डगमगाता आपके पास आधार है फिर भी डगमगा गए। यदि मैं डगमगा जाऊं तो प्रलय आ जाए।"
             मुझे समुद्र के ज्वार भाटा याद आने लगे और लगने लगा की ये चंद्रमा ही हैं।मैंने उत्सुकता से पूछा,"अच्छा,आप वास्तव में चंदा मामा है।"
             "हां भाई,तुम्हारे पिताजी भी मुझे चंदा मामा कहते थे।अब तुम सोच लो मैं तुम्हारी मां का भाई हूं या दादी का।"
             "आप बच्चे से मजाक कर रहे हैं,यहां क्यों आए हैं"।
             "भ्रमण के लिए"
             "क्यों?"
             "क्यों का क्या अर्थ?तुम हमारे यहां जा सकते हो,हम तुम्हारे यहां नहीं आ सकते क्या?" उसने उत्तर दिया।
             "हम वहां रिसर्च के लिए जाते हैं"।
             "पहले धरती की रिसर्च तो कर लो, फिर हमारे यहां आओ। यहां तुमने पृथ्वी को बांट रखा है।दूसरे देश जाने के लिए पासपोर्ट लगता हैऔर हमारे यहां मुंह उठाए चले आते हो।ब्रह्मांड के नियम मानते नहीं,ऐसा कितने दिन चलेगा।"चंद्रमा समझाते हुए बोला फिर पूछा,"क्या तुम कवि हो?"
             "नहीं,क्यों?"मैंने पूछा।
             "मैं उन कवियों को ढूंढ रहा हूं, जिन्होंने मेरा जेंडर बदल दिया,पुल्लिंग से स्त्रीलिंग कर दिया,अब तुम देखो,चांद सी महबूबा हो मेरी ---, चौदहवीं का चांद हो --,चांद जैसे मुखड़े पर बिंदिया सितारा ---, कितने गीत सुनाऊ, बहुत क्रोध आता है,तुम्हारे कवियों की ऐसी कल्पना पर।"चंद्रमा झल्लाते हुए बोला।
             "छोड़ो प्रभु रजनीश,कवियों का कोई ठिकाना नहीं,वे पानी में आग लगा दे,पहाड़ को नदी बना दें,चाय के कप में क्रांति कर दें,भूकंप ला दें,ज्वालामुखी फोड़ दें,आप तो समझदार हैं।" मैंने समझाया।
              " मुझे रजनीश मत कहो बंधु ,तुम्हारे यहां तो रजनीश भगवान बन गए थे। हम भगवान नहीं,देवता हैं।"चंद्रमा अपने कानों पर हाथ रखते हुए बोला, "तुम तो हमसे भी पार जाने की बात करते हो,चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो --कहां जाने का कार्यक्रम है?
              "मंगल पर जाने का विचार है।"
              "मंगल देव आपका मंगल करें।"चंद्रमा हाथ जोड़ते हुए बोला।
               "प्रभु,मंगल के कारण मेरे विवाह मै  विलंब हो गया,मंगल देव जन्मपत्रिका की लग्न में विराजमान हो गए,चार को मैंने रिजेक्ट किया छह ने मुझे,जब गुरु की कृपा हुई तो विवाह हुआ।"मैंने आपबीती सुनाई।
               सुनकर चंद्रदेव मुस्कुरा दिए फिर प्रश्न किया,"तुम्हारे यहां क्या चल रहा है?अब तो अक्सर ऊपर से बड़ी सुंदर आतिशबाजी दिखती है।क्या रोज दिवाली मनाने लगे हो?"
              "क्यों परिहास कर रहे हो,चंद्रदेव?यहां दिवाला निकल रहा है आप दिवाली की बात कर रहे हैं।"मैंने फिर कहा," जिनके पास लक्ष्मी हैं उनकी तो रोज दिवाली होती है।"
             " हम तो सबको बराबर चांदनी देते हैं, वरुण देव सब को पानी देते हैं,सूर्य देव सबको  प्रकाश देते हैं, तुम लोग ऐसा कुछ क्यों नहीं करते कि सबको लक्ष्मी मिले?"चंद्र देव ने पूछा।
              "महाराज, हमारे यहां अर्थ युग चल रहा है।"मैंने उत्तर दिया।
              "यह अर्थ युग क्या होता है? ब्रम्हदेव तो बता रहे थे पृथ्वी पर कलयुग चल रहा है।"चंद्रमा ने पूछा।
              "कलयुग का ब्रह्मदेव जाने,यहां तो सारे काम अर्थ प्रधान हो गए हैं।अर्थ के लिए आदमी कुछ भी कर सकता है। पानी हवा बेच सकता है, जहर बेच सकता है,हथियार बेचने के लिए आतिशबाजी कर सकता है, युद्ध कर सकता है।अब आपको क्या बताएं कब विश्व युद्ध हो जाए, कह नहीं सकते।" मैं बोला।
              " यह अर्थ युग नहीं अनर्थ युग है, तुम्हारा भविष्य तो महाकाल के हाथ में है।" चंद्रमा ने कहा।
               "प्रभु,हम क्या कर सकते हैं।"मैंने हाथ जोड़कर पूछा।
              "तुम क्या कर सकते हो, आनंद करो। जो करना है,महाकाल को करना है।मेरे जाने का समय हो गया है,सूर्य देव आते होंगे। हम प्रकृति के नियमों से बंधे हैं, प्रकृति के अनुसार चलते हैं। तुम भी चलो।"कहते हुए  चंद्र देव जाने लगे।
               "अरे!रुकिए प्रभु ,एक सेल्फी हो जाए सोशल मीडिया में पोस्ट कर दूंगा, वायरल हो जाएगी ,पाउट बनाइए ---।"कहते हुए मैंने चंद्रमा के साथ मोबाइल से सेल्फी ले ली
               "कुछ नहीं आएगा, मैं प्रकाश पुंज हूं--।" मैं कुछ कहता उसके पहले ही चंद्र देव अंतर्ध्यान हो गए।
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