पंडित परमानंद की जयंती छह जून पर श्रद्धा सुमन अर्पित

सुमेरपुर 06 जून 2020 लॉकडाउन को दृष्टि में रखकर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए वर्णिता संस्था के तत्वावधान_ में विमर्श विविधा के अंतर्गत जिनका देश ऋणी है के तहत क्रांतिकारी विचारों के अमर पुरोधा पंडित परमानंद की जयंती छह जून पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए। संस्था के अध्यक्ष डॉ भवानी दीन ने कहा कि भारत की आजादी के लिए जब संघर्ष चल रहा था, उस काल में बीसवीं सदी के प्रथम दशक में बुंदेलखंड में यह पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जो अपने आप में बेमिसाल थे। 1914 तक पंडित जी अनेक देशों की यात्रा कर चुके थे, परमानंद का सरीला तहसील के सिकरौदा गांव में 6 जून 1892 में गया प्रसाद खरे के घर जन्म हुआ था, मां का नाम सगुनाबाई था। इनके दादा मखराखन देश प्रेमी थे। सत्तावनी समर में मनराखन का प्रभावी प्रतिभाग था। परमानंद अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। इन पर अपने दादा और इलाहाबाद में भाई के पास रहकर प्राप्त की गई शिक्षा के समय देश प्रेमियों से संपर्क और लाला लाजपत राय के इलाहाबाद के भाषण ने इन्हें राष्ट्र प्रेमी बना दिया। यह आजीवन अविवाहित रहे। पंडित परमानंद गदर दल  के संस्थापकों में से एक थे। भारत के आजादी के लिए विद्रोह का सिंगापुर में दिया गया भाषण उद्बोधनो में से एक है। 21 फरवरी 1915 के सशस्त्र विद्रोह की कार्य योजना में परमानंद का प्रमुख हाथ था। देशद्रोहियों के कारण यह विद्रोह भले ही सफल ना हो पाया हो किंतु उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से क्रांतिकारियों की धरपकड़ हुई। 13 सितंबर 1915 को साथियों के साथ इन्हें फांसी की सजा मिली। जिसे बाद में काले पानी की सजा में बदल दिया गया यह सेलुलर जेल में 22 वर्ष रहे। जनता ने पंडित जी की उपाधि से इन्हें विभूषित किया। इस कारण ये पंडित कहलाये। ये अगस्त 1937 को जेल से रिहा हुए, कालांतर में 13 अप्रैल 1982 को उनका निधन हो गया। कार्यक्रम में अवधेश कुमार गुप्ता एडवोकेट, राजकुमार सोनी सर्राफ, संदीप सिंह, राधारमण गुप्त और अजय गुप्ता मौजूद रहे। 


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