हरगोविन्द कुशवाहा बुंदेलखण्ड के चलता फिरता एनसाइक्लोपीडिया

हरगोविन्द कुशवाहा, बुन्देली कला मर्मज्ञ भी हैं और वरिष्ठ अधिवक्ता व राजनैतिक भी। उनके राजनैतिक और कलात्मक सफर की उड़ान सहआयामी है और उनके बारे में यह कहना कठिन है कि वह एक राजनेता के रूप में अधिक प्रतिभावान हैं या इस पर उनके कला प्रेम को श्रेष्ठता प्रदान की जा सकती है। एक कला मर्मज्ञ के रूप में किसी कलाकार की अनदेखी या उसकी कला की श्रेष्ठता को उपे क्षत किये जाने की स्थिति में वह विगत 40 वर्षों से उसकी आवाज हैं। सरकारी स्तर पर आयोजित होने वाला झाँसी महोत्सव हो, आयोजित अखिल भारतीय हस्त शिल्प मेला का परिप्रेक्ष्य हो, या देश के बिभनिन्न स्थलों पर आयोजित होने वाले सान्स्क्र्तिक समारोह हों हर जगह हरगोविन्द जी की सक्रिय सहभागिता बुन्देली कलाकारों को आत्मसम्बल प्रदान करती रही है।



हरगोविन्द कुशवाहा का सरोकार ग्रामीण परिवेश से है और जो वर्षों से शहरी सभ्यता का हिस्सा होकर भी अपने ज़मीनी बुन्देली सरोकारों की जड़ों से खुद तो जुड़े ही हैं इसके साथ ही नई पीडी को बुन्देली माटी से जोड़ने के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं। उनके अन्दर आज भी वह आकर्षण है, जो उन्हें उनके शहरी प्रशंसकों के साथ ग्रामीण परिवेश से जुड़े लोगों से जोडने में उनकी मदद करता है। बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के अनेक विश्वविद्यालय व महाविद्यालय में इन्हे बन्देली लोक कला संस्कृति पर ब्याख्यान हेतु आमन्तित करते हैं। बर्तमान समय में पूरे बुंदेलखंड में हरगोविंद कुशवाहा को बुन्देली संस्कृति का पर्याय ही माने जाने लगा है देश सभी बड़े न्यूज़ चैनल, आकाश वाणी, समाचार पत्र में हरगोविंद कुशवाहा बुंदेलखण्ड की संस्कृति का जाना माना नाम है। आज भी सरकारी स्तर या शोध के लिए जब भी बुन्देली की कला संस्कृति पर कुछ भी कार्य होता है तो बुंदेलखण्ड की गहन जानकारी के लिए हरगोविंद कुशवाहा को ही आमंत्रतित किया जाता है।


 हरगोविन्द कुशवाहा को बुंदेलखण्ड का चलता फिरता एनसाइक्लोपीडिया कहा जाता हैयह बुन्देली के हर स्वरूप को आत्मसात किए हुये हैं। पेशे से अधिवक्ता एवं लोक गायक न होने के वावजूद भी बुंदेलखण्ड के महान लोककवि ईसुरी की फागें हों या किसी भी बुन्देली लोककवि के कवित्व या बुन्देली लोक गीत, हरगोविंद कुशवाहा जब इनको ठेठ बुंदेलखंडी अन्दाज में गुनगुनाते हैं तो वह जीती जागती बुन्देली संस्कृति की प्रतिमूर्ति का प्रतिरूप नजर आते हैं, और ऐसा प्रतीत होता है जैसे उस लोककवि की आत्मा उनके व्यक्तित्व में समाहित हो गयी हो।


बुंदेलखण्ड के इतिहास, कला, संस्कृति, लोक साहित्य का हरगोविंद कुशवाहा एक सजीब पुस्तकालय हैं। इन्होने विगत 40 वर्षों से बुन्देली लोक कलाओं एवं बुंदेलखण्ड की परम्पराओं को को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में अपने जीवन को लगा दिया है बंदेलखंड के लोक नर्त्य राई को देश विदेश में पहचान दिलाने में इनका बहुत ज्यादा योगदान रहा है। उनके बारे में यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि साहित्य, संगीत और ललित कलाओं पर उनकी गहरी पकड़ है और भले इन विधाओं में उनकी सृजनशील सक्रियता उतनी न रही हो, किन्तु रस मर्मज्ञता में उनका सानी मिलना सहज सुलभ नहीं है। उनका व्यक्तित्व अध्ययनशील है और सोते-जागते उनके गिर्द किताबें बिखरी रहती हैं। ये किताबें ही उनका ओढना और बिछौना हैं, उनके व्यक्तित्व को निखारने में बहु विषयक पुस्तकों का योगदान अतुलनीय है। इनमें बुन्देली साहित्य, संस्कृति, संगीत और ललित कलाओं से जुड़ी पुस्तकें समाहित हैं, जो उनकी लाइब्रेरी में बहुतायत से मौजूद हैं। साहित्यप्रेमी उन्हें कवि अज्ञेय की तरह एक यायावर की संज्ञा देते हैं, क्योंकि अध्ययन के अलावा घुमक्कड़ी छवि के कारण भी उनके व्यक्तित्व में ज्ञान गंगा प्रवाहित हुयी है।


बुंदेलखण्ड के झाँसी जिले की तहसील टहरौली के ग्राम बमनुआँ में गोले कुशवाहा और श्रीमती सुमित्रा के परिवार में 4 दिसम्बर 1949 को जन्म लेने वाले हरगोविन्द का शुरूआती पालन-पोषण व शिक्षा ग्रामीण परिवेश में ही हुयी, जबकि 8वीं से 12वीं की शिक्षा उन्होंने गुरसराय के खैर इण्टर कॉलिज में ली। तत्पश्चात् आगरा, कानपुर और बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक, परास्नातक एवं विधि स्नातक की शिक्षा हासिल की। जनपद के कई माध्यमिक एवं महाविद्यालयों के प्रबन्धक एवं अध्यक्ष जैसे पदों पर कार्य करने के अवसर उन्हें अनेक बार प्राप्त हये।


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