कोविड9 की महामारी से गांव की ओर भाग रहे प्रवासी मजदूरों की कैसे चलेगी जीवन नैया

गांव में कैसे पैदा होंगे रोजगार के अवसर

= शहरों से हो रहा पलायन क्या लेलेगा भयावह रूप =उजड़ चुके गांव को बसाना आसान नहीं  ।

=शहरों से गांव की ओर भाग रहे मजदूरों को उनके स्थानों पर ही न रोकने का फैसला कही सरकार के लिए घातक तो  नहीं।

आजमग कोविड 19 ने भारत सहित विश्व में जो कोहराम मचाया है उसे पूरा देश भयभीत हो कर चुका है ।मानवीय लालच और लाभ की प्रतियोगिता ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं ।लोगों का जीवन संकट में पड़ गया है ।पूरी मानवता आज त्राहि-त्राहि कर उठी है ।शहरों से चला कोरोना वायरस अब गांव में फैलता जा रहा है । शासन और प्रशासन इस तरफ पूरी तरह से गंभीर नहीं है जिसके चलते अब गांव में भी यह विकराल रूप पकड़ती जा रही है ।

रोजी रोटी के लिए अपना सब कुछ छोड़कर गांव से शहर की ओर पलायन कर चुके मजदूर एक बार फिर अब गांव की ओर निकल पड़े हैं । वर्षों पहले गांव में अपने भविष्य को अंधकार में देख लोग शहरों में चले गए थे ।जिससे उनका सामाजिक हो आर्थिक पक्ष मजबूत हुआ। शहरों में मिलते रोजगार के अवसर ने गांव के लोगों को इतना आकर्षित किया कि गांव से एक तरफा पलायन शुरू हो गया ।पलायन इस कदर बड़ा कि कई दशकों से सरकारों के द्वारा इसे रोकने का  अनेक प्रयास किया गया  ले जो  नाकाफी साबित हुआ। गांव के  बेरोजगारों को गांव में ही स्वरोजगार से जोड़ने की योजना शुरू की गई ।गांव में कृषि को प्रोत्साहित, लघु उद्योगों को बढ़ावा, शिल्पकारी ,बुनकरी और टेलीकॉम आदि क्षेत्रों में अनेक काम गांव में ही शुरू  किए गए। किसानों को भी सस्ते दरों पर खाद बीज दवाइयां और कृषि लोन उपलब्ध  कराए गए ।लेकिन इसपर भी पलायन पर कोई खास असर नहीं पडा । पिछले चार दशकों में लोगों का जिस तरह  पलायन शहरों की ओर हुआ परिणाम स्वरूप एक तरफ तो  शहरों में आबादी अनियंत्रित होने लगी तो दूसरी तरफ सामाजिक आर्थिक एवं स्वास्थ्य तथा सुरक्षा का ढांचा तार-तार होने लगा। वही गांव की हालत बद से बदतर होती चली गई ।गांव में बसने वाले अधिकांश लोग कर्ज में डूबते चले गए । किसानों की आत्महत्या का सिलसिला शुरू हो गया । लाख कोशिशों के बाद भी कामगारों का पलायन और किसानों की आत्महत्या रुक नहीं पाई। 

महामारी  शुरुआती दौर में ही  जब लोगों के अंदर  डर का भाव पैदा होने लगा था और लोग अपने रोजगार को  छोड़कर गांव में  जाने का मन बना रहे थे  उसी समय  मजदूरों में  विश्वास जगाने की जरूरत थी  और उन्हें  सारी सुविधाएं देकर  उनको उनके स्थान पर ही रुकना चाहिए था ।सरकारों को जितने प्रयास इस दिशा में करने चाहिए थे  शायद हुए नहीं किए गए । जिसके चलते ही  मजदूरों में अविश्वास का भाव पैदा हुआ  और उनको अपना जीवन  संकट से गिरता नजर आया  । इसके चलते जो जैसे ही था  वैसे ही गांव की वह चल पड़ा। यदि उसी स्थान पर रोक लिया जाता  तो शायद जो परेशानियां मजदूरों को झेलनी पड़ी  उससे  उन्हें बचाया जा सकता था।  साथ ही बंद पड़े कल कारखानों को भी  आने वाले दिनों में  सुगमता से चालू किया जा सकता था  और साथ ही साथ  गांव में भी जो  महामारी भयावह रूप लेती जा रही है  ऐसा  होने से रोका जा सकता था ।

अब करोना महामारी के चलते लाकडाउन से शहरों में मजदूरी का काम कर रहे लोगों के समक्ष भूखमरी पैदा हो गई है नतीजा लोग अपना जीवन संकट में गिरता देख अपना सब कुछ छोड़ कर गांव की ओर भागने लगे हैं ।भारतीय ग्रामीण समुदाय एक सशक्त संस्कारवान समाज रहा है जो हर संकट में एक दूसरे की मदद करता रहा । इस पुराने संस्कारों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। इसलिए उजडे समाज एवं भारत के गांव को दुबारा सामुदायिक संसाधनों के प्रबंधन से बसाना होगा । अन्यथा शहर छोड़कर अपनत्व पाने की लालसा लेकर आ रहे आ रहे प्रवासी मजदूरों को तिरस्कार ही मिलेगा रोजगार तो दिल की बात है। 

लगभग दशकों पूर्व सरकारों ने गांव में काम शुरू किया तो संसाधनों के अभाव एवं सरकारों के दृढ़ निश्चय में कमी होने के कारण गांव का जो विकास होना चाहिए था वह नहीं हो पाया। अब जबकि करोना से ग्रसित लो गांव में पुनर्स्थापित होने के लिए तेजी से भाग रहे हैं तो केंद्र प्रदेश की सरकारों के साथ ही ही स्थानीय प्रशासन को भी दृढ़ निश्चय ही होकर लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करना होगा । किसानों की सहायता करनी होगी । कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देना होगा और इसे सुगमता के साथ गांव के लोगों को मुहैया कराना होगा ।

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