दक्षिण एशिया की पहली महिला चिकित्सक कादम्बिनी गंगोपाध्याय


आजकल, शिक्षा प्रांगण में बड़ी संख्या में M ONDA लड़कियों की भीड़ होना सामान्य बात है। इस 21वीं शताब्दी में शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में लड़कों के साथ-साथ समान रूप से लड़कियाँ भाग ले रही हैं। किंतु 150 साल पहले पराधीन भारत में इस सुपरिचित दृश्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । उस समय लड़कियों को पढ़ाई-लिखाई सीखने के लिए किसी प्रकार का मौका नहीं थाऐसे में स्त्री शिक्षा प्रसार के लिए पण्डित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, पण्डित मदनमोहन तर्कालंकार, बेथुन साहिब और अन्य अनेक विशिष्ट बंगालियों ने अग्रणी भूमिका निभाई थींउन सभी की निष्ठा और कठिन प्रयासों के फलस्वरूप 1849 में कलकत्ता फिमेल स्कूल की स्थापना हुई, जो कि अब बेथुन कॉलिजियट स्कूल के नाम से परिचित है। परिणामत: लड़कियों के लिए लिखाई-पढ़ाई के अवसर खुल गए। वर्षों बाद 1861 में कादम्बिनी ने इस कलकत्ता शहर में जन्म ग्रहण किया। उनके पिता ब्रजकिशोर बसु भागलपुर में हेडमास्टर थे, जो ब्राह्मधर्मावलम्बी व विशिष्ट शिक्षाविद थे। उनका आदि निवास था बरिसाल का चाँदसी अंचल। किशोरी कादम्बिनी बेथुन स्कूल में भर्ती हुई थीवहाँ से 1878 में उन्होंने एन्ट्रेन्स परीक्षा श्रेष्ठता सहित उत्तीर्ण कियाउसके बाद, प्रवेशिका परीक्षा में बैठी और सफल छात्रों में अपना नाम जोड़ लिया। अत्यंत मेधावी छात्रा के रूप में अपनी योग्यता पर यह असामान्य नारी उस समय के समाज के विशिष्ट व्यक्तियों की दृष्टि आकर्षित कर सकी थीं। चन्द्रमुखी बसु एवं कादम्बिनी देवी ने काफी अच्छे अंकों से वर्ष 1883 में बेथन कॉलेज से बी.ए. परीक्षा उत्तीर्ण की और अंग्रेज़ शासित भारत की प्रथम स्नातक (ग्रैजुएट) महिला हुईं। अगले वर्ष ही अर्थात 1884 में कादम्बिनी देवी कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुईंउन्होंने सभी परीक्षाओं को सफलता सहित उत्तीर्ण किया किंतु अंतिम परीक्षा के समय अध्यापक के साथ असंतोष के कारण अनुत्तीर्ण हो गईं। उन्हें जी.बी.एम.सी. की उपाधि दी गई। परंतु उनकी जैसी तेजस्वी महिला इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से विचलित नहीं हुई। आखिरकार, 1892 में वे इंगलैण्ड के लिए रवाना हो गईं और अगले साल एल.आर.सी.पी. (एडिनबरा), एल.आर.सी.एस., डी.एफ.पी.एस. की उपाधि लेकर देश लौट आई। चिकित्सा जगत प्रवेश करते हुए उन्होंने लेडी डॉफरीन अस्पताल में नौकरी शुरू की। उसके पश्चात नौकरी से इस्तीफा देकर, उन्होंने स्वतंत्र रूप से चिकित्सा शुरू की और चिकित्सा क्षेत्र में ख्याति अर्जित की। इस बीच वे विशिष्ट शिक्षाविद द्वारकानाथ गंगोपाध्याय के साथ विवाह सूत्र में आबद्ध हुई। उनके पति स्त्री शिक्षा के प्रसार में एक अग्रणी व्यक्ति थे। उनके साहचर्य एवं अनुप्रेरणा से कादम्बिनी देवी समाज में अपने को एक सुचिकित्सक के रूप में प्रतिष्ठित कर पाई थीइसके अतिरिक्त, बम्बई काँग्रेस (1899) में वे महिला प्रतिनिधि दल की मुख्य सदस्य थी। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (1890) में उन्होंने अंग्रेज़ी में भाषण दिया था, वे प्रथम महिला वक्ता थी। गाँधी जी से निकटता के कारण वे हेनरी पोलक दारा स्थापित 'ट्रांसवेल इण्डियन एसोसियसन' की प्रथम सभापति बनीं। कलकत्ता में आयोजित महिला सम्मेलन (1907) की एक उत्साही सदस्य तथा बिहार-उड़िसा की महिला श्रमिकों की स्थिति सुधारने के लिए गठित अनुसन्धान कमीशन (1922) की मुख्य सदस्य थींएक अच्छी वक्ता के रूप में उनकी ख्याति थीं। आठ संतानों की माँ होने के बावजूद, घरेलू कामकाज निभाते हुए अनेक सामाजिक कार्यों में लीन रहती थीं- यह असाधारण नारी। किंतु यह दुखद है कि ऐसी महान नारी को आज भूला दिया गया है। उनके प्रदर्शित पथ को यदि आज की लड़कियाँ अनुकरण करें तो हमारा समाज और सुन्दर हो जाएगा।


पतन भारतीय से साभार


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