कथाकार #बृजमोहन जी का यूँ जाना...







रात का भोजन शुरू ही किया था कि लखनऊ से “नूतन कहानियाँ” के संपादक भाई सुरेंद्र अग्निहोत्री का फोन आ गया. आदत के अनुसार भोजन एक किनारे रखकर फोन रिसीव किया. उनसे अभिवादन किया ही था कि उन्होंने कहा,



“सर, बुरी खबर है एक…”



सच मानिए के इस पिछले पांच-छह महीनों में इतनी बुरी खबरें सुनने को मिली है कि दिल दहल उठता है. एक तो कोरोना खुद में बुरी खबर दूसरे कुछ अतिरिक्त बुरी खबरें. बहुत उलझन होती है फिर भी दिल को मजबूत कर पूछा तो उन्होंने बताया,



“आपके मित्र बृजमोहन नहीं रहे!”



यह तो वाकई मेरे लिए जड़वत हो जाने की स्थिति बन गई. झांसी के कथाकार लेखक बृजमोहन मेरे लिए बड़े भाई की तरह थे. उनसे परिचय हुए कोई अधिक समय नहीं हुआ था. लगभग ढाई साल पहले ही उनसे बातों का सिलसिला जारी हुआ होगा, जब उन्होंने फेसबुक पर मेरा फोन नंबर मांगा और तत्काल ही कॉल किया. मुझे याद है उस दिन मैं लखनऊ में था और रात के लगभग दस बजे होंगे और जब उनसे बातें हुई तो एक दूसरे के तमाम परिचय और साहित्यिक संबंध निकल आए. उसके बाद तो शायद ही कोई सप्ताह बीता होगा जब उनसे दो या तीन बार बात ना हो. कई बार दिन में दो-दो तीन-तीन बार भी बातें हो जाया करती थी.



जब उनकी तबीयत सही नहीं रहती थी तो वह अक्सर अपने तीनों नंबर स्विच ऑफ कर आराम किया करते थे और मैं समझ जाता था, पर जब भी उनके मोबाइल खुलते तो मिस्ड कॉल का नोटिफिकेशन देखकर वह मुझे पलट कर जरूर फोन करते. दो दिन पूर्व ही उनको कॉल किया था. कॉल भाभी जी ने उठाया तो पता चला कि वह झांसी के एक अस्पताल में भर्ती हैं. पर साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कोई खास चिंता की बात नहीं है थोड़ा कमजोरी महसूस कर रहे थे इसलिए उन्हें चिकित्सकीय देखरेख में रखा गया है. उन्होंने पूछा भी कि अगर कोई खास बात हो तो उनसे बात करा दें, पर मैंने ही मना कर दिया कि जब वह ठीक हों और घर लौट आएं तब बात कर लेंगे. अब मन में एक कसक रह गई है कि शायद दो दिन पहले बात कर ली होती तो अच्छा रहता.



पिछले वर्ष लगभग इन्हीं दिनों में हम लोगों की पहली भेंट हुई. न झांसी और न आगरा, यह भेंट एक संस्था के मनाली शिविर में वहीं जहां हम लोग तीन दिन तक साथ रहे और एक दूसरे को थोड़ा और बेहतर ढंग से जाना. जब पहली बार ब्रजमोहन जी से फोन पर बात हुई तब वह क्रांतिकारी मदारी पासी पर अपनी किताब लिख रहे थे और मैं सरधना की बेगम समरू पर एक औपन्यासिक जीवनी लिखने में व्यस्त था. उनकी किताब पहले आ गई क्योंकि वह मुझसे पूर्व से लिख रहे थे. बृजमोहन जी को समकालीन लेखकों और पाठकों का भरपूर प्यार मिला. यद्यपि ऐतिहासिक चरित्रों को लिखने का उनको कोई विशेष अनुभव नहीं था परंतु उन्होंने इस भुला दिए गए आजादी के नायक को इतनी खूबसूरती से लिखा कि इस किताब ने उन्हें और अधिक चर्चित कर दिया. तमाम पत्रिकाओं और आलोचकों ने उनके इस प्रयास की दिल खोलकर सराहना की. उन्होंने अपनी एक किताब मुझे मनाली शिविर में भेंट की थी जो उनके पास मनाली शिविर में बची एक मात्र शेष प्रति थी. मनाली में उन्होंने मुझसे कई फोटो क्लिक कराये. वहीँ अपनी प्रोफाइल पिक्चर को बदला, और मेरे क्लिक किये हुए फोटो को ही अपनी रचनाओं के साथ भेजा करते.



बृजमोहन जी इससे पहले अपनी तमाम कहानियां के कारण चर्चित रहे थे बैंक की सेवा के दौरान भी उन्होंने न जाने कितनी कहानियां लिखी उन्हें देश की तमाम बेहतरीन पत्रिकाओं यथा कादंबिनी, हंस, अहा जिंदगी, वागार्थ और दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं सरिता, मुक्ता और न जाने किन-किन पत्रिकाओं में छपने का सौभाग्य मिला. उन्होंने अपनी कहानी जहां भेजी वहां या तो उस रूप में अथवा संशोधित रूप में अधिकतर प्रकाशित हो ही गई. दैनिक जागरण के साहित्यिक पृष्ठ पर, दैनिक जनसत्ता के रविवारीय संस्करण में, राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर, दैनिक भास्कर और देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्रों के लिए बृजमोहन की कहानियां एक जाने-पहचाने लेखक की कहानियां मानी जाती थी.



अभी हाल ही में दैनिक जागरण में छपी उनकी एक कहानी को देखकर देश के एक बड़े प्रकाशक ने उनसे संपर्क किया था और उनके कहानी संग्रह को प्रकाशित करने की इच्छा व्यक्त की थी. पिछले दिनों उनके लखनऊ में हुए एक ऑपरेशन के बाद से उनका स्वास्थ्य थोड़ा ढीला रहता था फिर भी उन्होंने उस प्रकाशक से वादा कर लिया था कि वह अपनी प्रतिनिधि कहानियों का एक सेट उनको जरूर प्रकाशनार्थ देंगे. मुझे याद है कि अभी शायद दो हफ्ते पहले ही उन्होंने वह कहानियां उस प्रकाशक को पांडुलिपि के रूप में सौंप कर फेसबुक पर लिखा था कि वह आज बहुत रिलैक्स्ड महसूस कर रहे हैं क्योंकि जो वादा उन्होंने किया था वह आज पूरा कर दिया है.



एक अफ़सोस रह गया. वह सन १८५७ की क्रान्ति की लखनऊ के सिकंदरबाग की अचर्चित वीरांगना ऊदादेवी पर एक किताब लिख रहे थे. उसकी सामग्री जुटाने में मैंने भी उनकी मदद की थी. शायद अभी पच्चीस प्रतिशत ही लिख पाए होंगे. खराब स्वास्थ्य के कारण कम गति से लिख पा रहे थे, पर जब लिखते, तो अगले दिन जरूर विवरण साझा करते. हर बार यह भी कहते कि इस विषय पर जितनी विस्तृत और प्रामाणिक सामग्री आपने मुझे दी है, उतनी कहीं से नहीं मिली.



बृजमोहन जी ने मुझे कहानी लेखन के तमाम बिंदुओं पर ऐसी वृहद और उत्कृष्ट जानकारी दी जो कहीं से मिलना मुश्किल है. कई बार अनुरोध पर और कई बार स्वयं ही अपने मन से. कहानी लेखन में उनकी इतनी पकड़ थी कि वह पूरी कहानी में उस विषय से कहीं विचलन नहीं करते थे और पाठक को कहीं भटकने का अवसर नहीं देते थे. दैनिक जागरण के साहित्य संपादक राजेंद्र राव जी, शम्भूनाथ शुक्ल जी, ‘अकार’ के संपादक प्रियंवद, मुजफ्फरनगर के प्रसिद्ध लेखक हरपाल सिंह अरुष जी, वरिष्ठ एवं चर्चित लेखिका मैत्रेई पुष्पा रजनी गुप्त, विवेक मिश्र, शेर सिंह, आगरा के शैलेन्द्र शर्मा जी और तमाम अनेकों कहानीकारों-उपन्यास कारों से उनकी अच्छी मित्रता थी.



एक न एक दिन इस दुनिया से सबको जाना है, कल हम भी आपको वहीँ मिलेंगे, लेकिन जो दिल के नजदीक होते हैं वह हमेशा दिल में बसे रहते हैं. ऐसी ही छाप बृजमोहन जी ने छोड़ी है. उनका जाना मेरे लिए तो वाकई में एक व्यक्तिगत मित्र का अचानक अलविदा कह जाना है.



(मनाली में मेरे द्वारा खींचा गया बृजमोहन जी का पसंदीदा चित्र)







 











 


 




 




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