देशराज पटेरिया जी का चले जाना


कभी चुप न होने वाले बुंदेलखंड का एकाएक चुप हो जाना*

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*घेरा बनाकर बैठे अपनी अपनी गोद में सूपा रखकर बीड़ी बनातीं महिलाएं और पुरुष और घेरे के बीच में रखा रेडियो।खेत की मेड़ पर रखा फिलिप्स का रेडियो और खेत में निंदाई करतीं महिलाएं। साइकिल के पीछे कैरियर पर लदी एक बड़ी पोटली में बंधा दैनिक जरूरतों का सामान। साइकिल के हैंडल से लटकता रेडियो और गांव गांव जाकर बंजी करते पुटरयारे।*

          *नदिया में कपड़े धोते धोबी मम्मा, बरिया तले चौंतरा पर बाल काटते खबास कक्का,तीजा के आने वाले त्यौहार के लिए शंकर पार्वती की माटी की मूर्ति बनाते परजापत लाला। इन सभी को बेसब्री से इंतजार रहता था रेडियो की एक उद्घोषणा का कि-"यह आकाशवाणी का छतरपुर केंद्र है। अब आप देशराज पटेरिया से बुंदेली लोकगीत सुनिए" और फिर गूंजती थी खनकती हुई वह आवाज जिसने बुंदेलखंड वालों को चार दशक तक पागल कर रखा था।वह आवाज थी देशराज पटेरिया की।उन दिनों लड़के शादी के समय दहेज में फिलिप्स का रेडियो लेने के लिए हड़स जाया करते थे ताकि उसमें देशराज पटेरिया के लोकगीत सुन सकें। गांव के सम्पन्न किसान, मुकद्दम और लंबरदार अपने पैसों का प्रदर्शन अपने नाती के गंता में या मोड़ा के बियाव में देशराज पटेरिया का कार्यक्रम करवा कर करते थे। पटेरिया जी का कार्यक्रम स्थानीय पुलिस के लिए एक चुनौती बन कर आता था। पटेरिया जी का कार्यक्रम निपट जाने के बाद थानेदार राहत की सांस लेते थे। खुद के बलबूते पर भीड़ न जुटा पाने वाले छुटभैये नेताओं के लिए पटेरिया जी भीड़ जुटाने का सुलभ माध्यम थे। पटेरिया जी का कार्यक्रम करवा कर, उसमें जुटी भीड़ में ही वे अपनी बात कर लिया करते थे।*

            *पटेरिया जी को सुनना किसी अलबम को पलटने जैसा था। उसमें बुंदेलखंड की पिछड़ेपन के बावजूद जिंदादिली, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हंसने का सामर्थ्य, खेतों खलिहानों कुओं तालाबों पर पनप जाता करते प्रेम प्रसंग, बुंदेली अकड़-सब चित्र के बाद एक सामने आते जाते थे। पटेरिया जी द्वारा हारमोनियम पर हाथ रखते ही भीड़ पागल हो जाती थी। चारों तरफ से फरमाइशों का कोलाहल। दादा,तुमईं तनक नोनी। दादा,चंदा चकोर। दादा, पूजा के लड़ुआ।जितने लोग उतनी फरमाइशें। पटेरिया जी के गीतों के  बीच-बीच में उनकी चुटकियां भी उतनी ही लोकप्रिय थीं।लोग एक एक पंक्ति को कई कई बार गंववाते थे। दादा, एक बार और। दादा, एक बार और।*

               *मैंने यह देखा कि कैसे एक जीता जागता आदमी किंवदंती में तब्दील होता है।मेरे देखते देखते पटेरिया जी एक किंवदंती में, मुहावरे में बदले। किसी छोटे मोटे बुंदेली कलाकार को दिखावा करते हुए लोग देखते तो कहते-का तुम देशराज पटेरया समझन लगे खुद खों।*

         *बुंदेलखंड अपनी परतें देशराज पटेरया के माध्यम से खोलता था।वे बुंदेली के प्रतीक बन गए थे।*

              *मेरा उनसे बहुत निकट आत्मीय संबंध रहा।जब उन्हें पैरालिसिस का अटैक हुआ। मैं उन्हें देखने झांसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में गया था।वे मुझसे बोलने की कोशिश कर रहे थे।पर पैरालिसिस के कारण बोल नहीं पा रहे थे।उनके होंठों का वो असफल कंपन मुझे आज भी याद है। हजारों लोगों को झंकृत करने वाली आवाज की ऐसी बेवशी देखकर मैं रो पड़ा। फिर वे ठीक हुए फिर मंचों पर लौटे।*

          *वे जब भी भोपाल आते थे। मुझे सूचना आ जाती थी। मुझे उनके कार्यक्रम में जाना ही होता था।कई बार ऐसा हुआ कि उन्होंने श्रोताओं में से मुझे बुलाकर मंच पर अपने पास बिठा लिया। मुझे ऐसा भी सौभाग्य मिला कि बंद कमरे में मैंने अकेले उन्हें सुना।जब केवल वे थे और मैं था।वे गा रहे थे और मैं सुन रहा था। केवल मेरी फरमाइशें थीं और वे एक के बाद एक पूरी कर रहे थे। केवल स्नेहवश।ऐसी ही एक एकाकी महफ़िल में उनके द्वारा मुझे सुनाई गई एक चीज़ अभी भी मेरे कानों में प्रतिध्वनित हो रही है। कव्वाली की तर्ज में थी-"मुझे चाहने लगे हैं सांवरे। अब किसी की मोहब्बत नहीं चाहिये।"*


 

*बुंदेलखंड के महान बेटे को विनम्र श्रद्धांजलि*

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