माता कैयकई वो काबर

माता कयकई वो काबर राम ला बनाये बनवासी।
हांसत खेलत राज भवन मा कइसे लगा दिये आगी।।
माता कैयकई वो---


चँवथे पन मा राजा दशरथ बेटा पाइस राम ला।
राम लक्ष्मण भरत शत्रुध्न धरे रहिस नाम ला।
धरती  के भार उतारे खातिर आइस राम अविनाशी।


माता कैयकई  वो काबर---


रामचंद्र के राज तिलक के होवत हे तइयारी।
मोंगरा गुलाब के झालर लगे हे केंवरा फूल के महकारी।
अतर फुलेल गली महमावे मगन हे पुरवासी।



माता कैयकई वो काबर---



कोप भवन में रानी रिसागे चूंदी मुड़ी छरियाय।
राजा दशरथ पूछन लागे रानी तँय कइसे रिसाय।
राजा बनही राम अवध के तँय वोकर महतारी।।


माता कैयकई वो काबर--



कैयकई कहिथे दू बरदान मोर बाँचे हाबे थाती।
उही ला आज माँगहू राजा अऊ जुड़ाहूं छाती।
माँग ले रानी का माँगबे फेर छोड़ दे आज उदासी।


माता कैयकई वो काबर----


चऊदा बरस राम बनवासी भरत हा बनही राजा।
सोला  सिंगार  तभे मँय करहूं अऊ बजवाहूँ बाजा।
रानी अइसन झन कहि रानी राम मोर दूनों आँखी।।



माता कैयकई वो काबर----


वल्कल पहिर के राम जी आगे माता मँय हा बन जाहूं।
मोला आज्ञा दे दे पिता जी चौदह बरिस बिताहूं।
सुन के माता कौशल्या के फाटत हावे छाती।।


माता कैयकई वो काबर---


सीता कहिथे महूँ जाहूं नाथ  मँय तोर चरण के दासी।
लक्ष्मण कहिथे भईया मँहू जाहूं बना ले मोला साथी।
राजा दशरथ तड़पत हावे जस पानी बिन मीन उदासी।।


माता कैयकई वो काबर---


 राम राम राम कहि प्रान छुटगे होगे अवध उदासी।
राम बिना होगे सुन्ना अयोध्या रोवय ऊंहा के वासी।
भरत शत्रुध्न  आके देखय कइसे छाय हे ईंहा उदासी।


माता कैयकई वो काबर  राम ला बनाये बनवासी।
हाँसत  कुलकत राज भवन मा  कइसे लगा दिये आगी।
माता  कैयकई वो काबर--


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