उत्तर प्रदेश के तीन जिलों में नवजात स्वास्थ्य पर गहन अध्ययन शोध सारांश

पृष्ठभूमि एवं औचित्य-


जीवनकेपहले 28 दिन (नवजातकाल) बच्चेकेजीवितरहनेकेलिएसबसेनाजुकअवधि होती है।जन्मकेपहलेमहीनेमेंबच्चोंकीमृत्युकासबसेअधिक जोखिमहोताहै, (UNICEF, 2018)। भारतीय संविधान के आर्टिक्ल 21 के तहत जीवन जीने का अधिकार और संयुक्त राष्ट्रिय बाल अधिकार संधि मे इसे मौलिक अधिकार माना गया है। सततविकासलक्ष्यकेलक्ष्य-3 के तहत 2030 तक सभी रोके जा सकने वाली नवजात शिशुओं और 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चो की मृत्यु को रोकना और नवजातशिशुमृत्युदरकम से कम 12 प्रति एक हज़ार जीवित जन्म तक लाना और 5 वर्षतककेबच्चों कम से कम 25 प्रति 1000 जीविततककमकरना शामिल है। 2016 केनेशनलप्लानऑफ़एक्शनमेंभारतनेनवजातशिशुमृत्युदरको 2021 में 21 तककमकरनासुनिश्चितकियाहै।भारतकाविश्वमे होने वाले जीवितजन्ममें 1/5 औरनवजातशिशुमृत्युमेंएकचौथाईसेअधिककायोगदानहै।भारतमें 2018 मेंनवजातशिशुमृत्युदर 1000 जीवितजन्मोंपर 23 था (एसआरएस 2018)। कुलशिशुमृत्युका 72 प्रतिशतऔरआधेसेज्यादा 5 सालतककेबच्चोंकीमृत्यु नवजात कालमें आतीहै, पहलेहफ्तेमेंहोनेवालीमृत्युमेंकुलशिशुमृत्युका अकेले 55 प्रतिशतहिस्साहै (एसएसआर 2018)।  राष्ट्रीयपरिवारस्वास्थ्यसर्वेक्षण (एनएफएचएस- IV) 2015-16 केआंकड़ोंकेअनुसारकेवल 24 प्रतिशतबच्चोंकोजन्मके 2 दिनोंकेभीतरयोग्यचिकित्साकर्मियोंसेस्वास्थ्यपरीक्षणप्राप्तहोताहैऔरघरमेंपैदाहुए 3 प्रतिशतसेकमबच्चोंकोजन्मके 24 घंटेकेभीतरस्वास्थ्यसुविधाजांचकेलिएलेजायागया।इनसबकेकईअनगिनतकारण और निर्धारक हैंजो की बहुमुखी है जिसमे इंफ्रास्ट्रक्चरकीकमी, अभिभावकोंकीशिक्षा, लोगोंकास्वास्थ्यसुविधाओंकेप्रतिअस्वैच्छिकव्यवहारकेसाथ-साथअन्यसामाजिकआर्थिककारणशामिल हैं।नवजातशिशुमृत्युदरकेचिकित्सकीयकारणभीहैं, जिनमेंसमयसेपहलेजन्म, जन्मकेसमयवजनकमहोना, जन्मकेसमयदमघुटनायासांसनालेपानाइत्यादिभीशामिलहै।वर्षोंसेराज्यऔरसिविलसोसाइटीसंगठनोंनेइनमुद्दोंपरलगातारप्रयासजारीरखेहैं।पिछलेकुछदशकोंमेंमृत्युदरकमकरनेकेलिएकिएगएप्रयासोंसेकईसकारात्मकनतीजेभीदिखेहैं, जबकिविश्वकीऔसतनतुलनामेंभारतमेंअबभीअधिकनवजात शिशु मृत्यु दर (एनएनएमआर)है।
(एसआरएस 2018) भारतमेंउत्तरप्रदेशमेंसबसेअधिकनवजातशिशुमृत्युदरहै, जिसमेंहर 1000 जीवितजन्मोंपर 32मृत्युदर्जहोतीहै।राज्यमेंग्रामीण-शहरीअंतर,देशमेंसबसेअधिकहैजिसकेचलतेग्रामीणक्षेत्रोंमेंप्रति 1000 जीवितजन्मोंपर 34 मौतेंऔरशहरीक्षत्रोंमेंप्रति 1000 जीवितजन्मोंपर 21मौतेंनवजात कालमेंदर्ज़हुईहै।

उत्तरप्रदेशमेंचाइल्डराइट्सएंडयू (क्राइ)नेमातृऔरशिशुकेस्वस्थकिआवश्यकजरूरतकोसमझाहैऔरसाथहीअनेकउपायोंकेमाध्यमसेव्यवस्थाऔरसामुदायिकस्तरोंपरजमीनीहस्तक्षेपकियाहै।क्राईकेअनुभवसेदेखाजाएतोशिशुऔरनवजातकीमृत्युकामुद्दाजटिलहै, इसमे कई सारे आपस मे जुड़े हुए कारक हैं, जिसके चलते सामाजिक और सांस्कृतिक निर्धारकों का पता लगाने के लिए एक अध्ययन की आवश्यकता महसूस की गई थी। अध्ययनकेनिष्कर्ष CRY औरअन्यसिविलसोसाइटीसंगठनों (CSO) कोउत्तरप्रदेशमेंहोरहीनवजातशिशुमृत्युसेसंबधितमुद्दोंकोहलकरनेमेंमददगारसाबितहोंगे।साथहीविभिन्नहितधारकजैसेकीनीतिनिर्माताओंऔरइन्फ्लुएंसर्सकेविभिन्नमंचोंपरनीतिसंवादकोमजबूतीभीदेंगे।


शोध काउद्देश्य-
शोधकेमुख्यउद्देश्यइसप्रकारहै -
1. नवजातशिशुओंकीमृत्युकेसामाजिकऔरसांस्कृतिककारकोंकोसमझना
2. माताओंमेंनवजातशिशुकीदेखभालकेसंबंधमेंसमुदायकीमान्यताओं, परंपराओंऔरप्रथाओंकोसमझना
3. नवजातशिशुऔरशिशुस्वास्थ्यकेसंबंधमेंस्वास्थ्यसेवाओंकीउपलब्धता, उपयोगिताऔरउनतकइसकीपहुंचकादस्तावेजीकरणकरना
4.  स्वास्थ्यव्यवस्थाओंऔरसामुदायिकप्रणालियोंकेसंबंधमेंमाताओंकेअनुभवोंकादस्तावेजीकरणकरना

शोधडिजाइन -
यहअध्ययनउत्तरप्रदेशकेतीनजिलों- कौशाम्बी, सोनभद्रऔरवाराणसीकेग्रामीणक्षेत्रोंमेंसंचालितकियागयाथा।क्राई (CRY)केइनतीनोंजिलोंमेंहस्तक्षेपकार्यक्रमहै।क्राईकेविभिन्नकार्यक्रमोंकेमाध्यमसेकौशाम्बीके 60 गांव, वाराणसीके 50 (ग्रामीण) गाँवऔरसोनभद्रजिलेके 28 गांवमेंउपस्थितिहै।
ऊपरदिएगएतीनोंजिलोंमेंशोधकार्यप्रणालीकेअंतर्गतक्राईकेक्रियान्वयनमे सहयोगीसंस्थाननेएकनिर्धारितप्रारूपमें (अप्रैल 2018 से 31 मार्च 2019 तक) सभीनवजातोंकीमृत्युकाविवरणदर्जकिया।कुल 55 मामलोंमेंसे 29 माताओंकेउप-नमूनोकोअलगसेगहनसाक्षात्कारकेलिएचुनागया, जिसमेंनवजातशिशुमृत्युदरसम्बंधितविभिन्नविषयोंकोशामिलकियागया (जिसेसंबंधितजिलोंमेंमृत्यु कीसंख्याकेसंबंधमेंसमानुपातिकरूपसेवितरितकियागया है)। यहसाक्षात्कारफरवरी 2020 मेंआयोजितकियागयाऔरजिनमाताओंनेसर्वेसेपहलेएकसालमेंअपनेनवजातशिशुकोखोदिया, उनकोविस्तृतअनुवेशणकेलिएचुनागया।
क्षेत्रोंकादौराकरनेकेदौरानरिफ्लेक्सिवनोट्सकादस्तावेजीकरण, निष्कर्षनिकालनेकेलिएकियागया।अस्थायी सरोकारों को ध्यान मे रखते हुएवर्णनात्मकविश्लेषणकियागया।


नैतिक आयाम -
डाटाकलेक्शनकेदौरानसहीवनैतिकशोधकेआचरणकासख्तीसेपालनकियागया है।सभीमाताओंकोअध्ययनकेउद्देश्योंकेबारेमेंस्थानीयभाषामेंविधिवतजानकारीदीगई।साक्षात्कारकेलिएसूचितसहमतिलीगईऔरमाताओंकासाक्षात्कारउनकेघरोंमेंलियागयातथासाक्षात्कारमेंउनकीस्वैच्छिकभागीदारीथी।


शोध मूल्यांकन -
अध्ययनमेंसीमितनमूनोंकीप्रतिक्रियाओंकादस्तावेजीकरणकियागया, जिसवजहसेसीमित-समान्यताओंकेलिएगुंजाइश सीमितहै।हालांकियहनिष्कर्षअध्ययनक्षेत्रोंमेंआपकोसामाजिक-सांस्कृतिकपहलुओंतथाबच्चोंसेसंबंधितस्वास्थ्यसेवाओंउपलब्धता, उपयोगऔरपहुंचकेबारेमेंबताताहै, इसकाउपयोगनीतिगतसंवादऔरकार्यक्रम हस्तक्षेपकेलिएकियाजासकताहै।किनही कारण वश शोध मे आंगनवाड़ी से जुड़ी जानकारी का सत्यापन नहीं किया गया हैं।

केस स्टडि एवं विस्तृत साक्षात्कार के आधार पर मुख्य निष्कर्ष -
महिलाओं की आयु:

कुल 74.5 प्रतिशतमहिलाओंकीउम्र 20-30 वर्षथीऔर 11 प्रतिशतमहिलाएं 20 वर्षसेकमउम्रकीथीं।वाराणसीकेग्रामीणक्षेत्रोंमेंबड़ीसंख्यामेंमहिलाएंयानी 46 प्रतिशत 22-25 वर्षकीआयुकेबीचथीं, और 31 प्रतिशतमहिलाएं 20 वर्षसेकमउम्रकीथीं।कौशाम्बीमें, कोईभीमहिला 20 वर्षसेकमनहींथीऔरउनमेंसेअधिकांश (71.4%) 20 से 30 वर्षकीआयुवर्गकेबीचथीं।सोनभद्रमें, अधिकांशमहिलाएं (64.3%) 20-25 वर्षकीआयुकेबीचथींऔर 14 प्रतिशतमहिलाएं 20 वर्षसेकामउम्रकीथीं।
 
शैक्षिकयोग्यता:
कुल, अधिकांशमहिलाएं (61.8%) असाक्षरथीं। 20 प्रतिशतनेप्राथमिकशिक्षापूरीकीथी।वाराणसीकेग्रामीणक्षेत्रोंमें 77 प्रतिशतसेअधिकअसाक्षरथी  औरलगभगसमानप्रतिशतमहिलाएंकौशाम्बी (75%) मेंथी, जो स्वास्थ्यकी दृष्टि से चिंतनीयहै।सोनभद्रमेंकेवल 21 प्रतिशतमहिलाएंहीअसाक्षरथीं।

नवजातमृत्युसेसंबंधितकारक-

बच्चेकालिंग :यहपायागयाहै किनवजातशिशुओंकीमृत्युदरअनुपातमेंलड़कों (47.3%) कीतुलनामेंलड़कियों (52.7%) कीसंख्याअधिकथी।यह विवरणवाराणसी (53.8%) औरकौशाम्बी (60.7%) केग्रामीणक्षेत्रकाथा।जबकिसोनभद्रमेंनवजातशिशुओंकीमृत्युमें 64.3 प्रतिशतलड़केथे।  

जन्मकाक्रम : कुलमिलाकरपहलेजन्मेशिशुकीमृत्युदर 31 प्रतिशतऔरचौथेशिशुकेजन्मकीमृत्यु 29 प्रतिशतहै।वाराणसीकेग्रामीणक्षेत्रोंमें, पहलेजन्मेबच्चोंकीमृत्यु सबसे अधिक है औरबाकी 30 फीसदी मृत्युदूसरेजन्मेबच्चोंकीहुईं।कौशाम्बीमें, 32 प्रतिशतमामलेपहलेजन्मकेथेऔरसबसेअधिकमृत्युउनबच्चोंकीहुईजोचौथेक्रममेंजन्मेथे (39 प्रतिशत)।  सोनभद्रमें, जन्मकेक्रमसेबहुतअंतरनहींपड़ा, क्योंकिवेतुलनात्मकरूपसेसमानरूपसेबंटेथे - पहलेऔरदूसरेजन्मक्रममेंमौतोंकाअनुपात 28 प्रतिशतहीथा, जबकिनवजातमृत्युके 21 प्रतिशतमामलेतीसरेऔरचौथेक्रममेजन्मेबच्चोंकेसाथथे।

पंजीकरण, ए एन सी औरपरामर्श:कुलमहिलाओंमेंसेअधिकांशमहिलाएं (93 प्रतिशत) नेआंगनवाड़ीकेंद्रोंमेंपंजीकरणकरायाथाऔरकुल (88 प्रतिशत) महिलाओंकोआशाकार्यकर्ताऔरआंगनवाड़ीकार्यकर्ताओंसेपरामर्शमिला।वाराणसीकेग्रामीणक्षेत्रमेंलगभगसारीमहिलाएंस्थानीय आंगनवाड़ीकेंद्रोंमेंपंजीकृतहैं, परकेवल 53 प्रतिशतमहिलाओंकोहीपरामर्शमिला।कौशाम्बीमें 96.4 प्रतिशतमहिलाएंपंजीकृतहैं।सोनभद्रमेंआंगनवाड़ीकेंद्रोंमेंपंजीकृतमहिलाओंकाअनुपात (78.6 %) कमहै, हालांकिवहांसभीमहिलाओंकोपरामर्शमिला।
अधिकांशमहिलाओं (94 प्रतिशत) कोगर्भावस्थाकेदौरानआईएफए (आयरनफोलिकएसिड ) कीगोलियांमिलींऔरटेटनसटॉक्सॉइडइंजेक्शन (84 प्रतिशत) कीदोखुराकेंमिली।हालांकि, प्रत्येकदसमहिलाओंमेंसेकेवलएकनेकहाकिउन्हेंपूर्णप्रसवपूर्वजांचमिलीहै (11.2 प्रतिशत)।सोनभद्रमेंसभीमहिलाओंकोटेटनसटॉक्सॉइडइंजेक्शनऔर IFA टैबलेटमिलीं; हालांकि, केवल 18 प्रतिशतकीसभी 4 प्रसवपूर्वजांचेंहुईं।वाराणसीकेग्रामीणमें, 84 प्रतिशतमहिलाओंकोटेटनसटॉक्सॉइडइंजेक्शनऔर IFA दोनोप्राप्तहुईं; वहीं, केवल 8 प्रतिशतकीसभी 4 प्रसवपूर्वजांचेंहुईं।कौशाम्बीमें 82 प्रतिशतमहिलाओंकोटेटनसटॉक्सॉइडइंजेक्शनऔर 96 प्रतिशतमहिलाओंकोआईएफएटैबलेटप्राप्तहुईं, वहींकेवल 11 प्रतिशतमहिलाओंकीसभी 4 प्रसवपूर्वजाँचेंहुईं।


माताओं के साथ विस्तृत साक्षात्कार के दोरान यह जानकारी प्राप्त हुई की-


अधिकांश साक्षात्कार मे भाग लेने वाली माताओं (83 प्रतिशत) को उनके गर्भावस्था के दौरान एक आशा द्वारा दौरा कर पंजीकृत किया गया था। अधिकांश माताओं (88 प्रतिशत) ने बताया कि उन्हें आशा द्वारा परामर्श दिया गया। आशाओं द्वारा काउंसलिंग विषयोंमे पोषण महिलाओं द्वारा सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले विषयों मे था – कुल 94 प्रतिशत माताओं ने पोषण के बारे मे काउन्सेलिंग मिली,वहींसंस्थागत प्रसव के बारे मे 83 प्रतिशत, सरकारी योजनाओं (78 प्रतिशत) और क्रमशः सुरक्षित मातृत्व और व्यक्तिगत स्वच्छता (50 प्रतिशत)के बारे मे जानकारी प्राप्त हुई। हालांकि, माताओं ने ए एन सी की महत्वता से संबन्धित जानकारी को साझा नहीं किया। साक्षात्कार के दौरान यह देखा गया कि अधिकांश माताओं को पोषण या संस्थागत प्रसव के लाभों के बारे में नहीं पता था, लेकिन उन्हें सरकारी वित्तीय योजनाओं के बारे मेंअधिक जानकारी थी।


 


माताओं द्वारा साक्षातकार के दोरान दी गयी जानकारी  यह दर्शाती है कि हर पांच में से एक माँ गर्भावस्था के दौरान किसी भी स्वास्थ्य सुविधा का लाभ लेने स्वस्थ्य केंद्र या अस्पताल नहीं गयी। केवल 41 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं दो बार से अधिक चेक-अप के लिए स्वास्थ्य केंद्र या अस्पतालगयी। केवल 55 प्रतिशत माताओं (लगभग आधी) को स्वयं स्वस्थ्य केंद्र या अस्पताल जाने की अनुमति दी गई थी। जिन्हें स्वयं जाने की अनुमति नहीं थी, उन्हें स्वास्थ्य सुविधा के लिए पति या सास के साथ जाना पड़ता था। केवल 13 प्रतिशत माताओं ने चारो प्रसव पूर्व जांच करवाई थी।


अध्ययन में केवल 7 प्रतिशत माताओं ने जन्म पंजीकरण प्रमाण पत्र प्राप्त किया और अधिकांश महिलाओं (86 प्रतिशत) ने कहा कि उन्हें बच्चे का कोई मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिला है।


जन्म कास्थान : ज्यादातरजन्म (78%) संस्थागतप्रसवकेजरिएहुए, जिसमेंसे 60 प्रतिशतसार्वजनिकस्वास्थ्यसुविधाकेंद्रमेंहुएऔर 18.2 प्रतिशतनिजीस्वास्थ्यसुविधाकेंद्रमेंहुए।घरोंमेंजन्मेबच्चोंकाअनुपातसबसेअधिकसोनभद्रमेंथा (28.6 प्रतिशत) उसकेबादवाराणसीकेग्रामीणक्षेत्र (23.1 प्रतिशत) औरसबसेकमकौशाम्बी (10.7 प्रतिशत) मेंथा।


साक्षात्कार के दोरान माताओं ने भी इसी तरह की जानकारी साझा की जिसके अनुसार62 प्रतिशत प्रसव सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में हुए, 24 प्रतिशत प्रसव निजी क्लीनिकों में हुए, और 10% प्रसव घर पर हुए और 3% पारवहन के दौरान हुए।


कुल 69 प्रतिशत को प्रसव केबादअस्पताल से एक ही दिनमे छुट्टी दे दी गईऔर केवल 28% माताओं ने जन्म के 7 दिनों के भीतर अपने नवजात को स्वास्थ्य परीक्षण के लिए लेकर जाने कि पुष्टि की।


लगभग एक तिहाई (31 प्रतिशत) ने प्रसव के लिए उप केंद्र (एससी) का रुख किया, 24 प्रतिशत ने अपने प्रसव के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) का विकल्प चुना और 7 प्रतिशत ने सरकारी अस्पताल में प्रसव कराया।


हर चौथे प्रसव में से एक निजी अस्पताल या क्लिनिक में हुआ। यहभी पाया गया कि 52 प्रतिशत उत्तरदाता निकटतम स्वास्थ्य सुविधा के 2 से 3 किमी के दायरे में थे और 56 प्रतिशत उत्तरदाता सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) से 10 किमी के दायरे मे थे। अध्ययन मे पाया गया कि निकटतम उप स्वस्थ्य केंद्र (एच एस सी), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और जिला अस्पताल कि उत्तरदाताओं से औसत दूरी क्रमश 2.3 किलोमीटर , 5.1, 11.5 और 13.6 किमी है। वहीं 34 प्रतिशत उत्तरदाताओं सेनिजी स्वस्थ्य सुविधाएं 3 से 5 किमी के दायरे मे पायी गयी।


 


 


 


स्वास्थ्य सुविधाएं एवं प्रसवकेदौरानसहयोग:


संस्थागतप्रसवकरानेवालीमहिलाओंमें, हरदसमेंसेकेवलएकप्रसव (14प्रतिशत) मेंडॉक्टरउपस्थित रहे।उनमेसेअधिकांशमहिलाओंको (86प्रतिशत) एएनएमद्वारासहयोगमिला।जिलेवारदेखें, तोवाराणसीमें 80 प्रतिशतप्रसवोंमेंएएनएमनेसहायताकी, जबकि 20 प्रतिशतप्रसवडॉक्टरकीदेखरेखमेंकिएगए।कौशाम्बीमें 88 प्रतिशतएएनएमद्वारासहायताकीगईऔरकेवल 12 प्रतिशतसहायताडॉक्टरनेकी।सोनभद्रकेआंकड़ोंसेपताचलताहैकिसंस्थागतप्रसवोंमें 87.5 प्रतिशतप्रसवोंमेंएएनएमनेसहायताकीऔर 12.5 प्रतिशतडॉक्टरनेकी।निष्कर्ष यह भी बताते हैं कि 17 प्रतिशत प्रसवों को किसी भी कुशल या प्रशिक्षित सहायक द्वारा सहायता प्रदान नहीं की गई थीबल्कि दाई या रिश्तेदारों द्वारा मदद की गयी।


उपलब्ध सुविधाओं से संबंधित अनुभवों से पता चलता है कि कई उत्तरदाताएँ आशा, एएनएम, और प्रशिक्षित प्रसव सहायक आदि की उपलब्धता से संतुष्ट थी। लेकिन केवल 5% से भी कम उत्तरदाताओं ने स्वस्थ्य सुविधाओं मे साफ-सफाई को लेकर संतुष्टि व्यक्त की। उत्तरदाताओं द्वारा विभिन्न समस्याओं का सामना किया गया जैसे डॉक्टर की अनुपलब्धता, अस्वच्छ स्वास्थ्य सुविधाएं, बिजली की समस्याएं आदि। उत्तरदाताओं ने यह भी बताया कि उन्हे अपने ब्लेड, दवाइयां, दस्ताने आदि खुद खरीदने पड़ेएवं सहायक कर्मचारियों के व्यवहार के प्रति असंतुष्टि व्यक्त की।


गुणात्मक प्रतिक्रियाओं से पता चलता है हालांकि महिलाओं के लिए बेड, दवाएं, एएनएम, आशा, दाई और डॉक्टर सुविधा उपलब्ध थे, फिर भी कई लोगों ने आपातकाल के समय डॉक्टर की अनुपलब्धता की शिकायत की। कुछ ने अपने विचार साझा करते हुए यह भी बताया कि नर्स का व्यवहार अच्छा नहीं था और उन्हें अतिरिक्त पैसे भी देने पड़े।


प्रसवऔरगर्भावस्थाकेजोखिम:


अधिकांशमहिलाओंकेसामान्यप्रसव (89 प्रतिशत), औरउनमेंसेलगभगआधी (44 प्रतिशत) महिलाओंमेंखूनकीकमीकेकारणऔरमहिलाओंकेवजनमेंकमीकेकारणहाईरिस्कप्रेगनेंसीथी।इनसभीहाईरिस्कप्रेगनेंसीमेंसे 7 (29 प्रतिशत) प्रसवघरमेंहुएहै।हाईरिस्कप्रेगनेंसीकाप्रतिशतसबसेज्यादासोनभद्र (64.3 प्रतिशत) मेंथाउसकेबादकौशाम्बीमें (39.3 प्रतिशत) औरवाराणसीग्रामीणक्षेत्र (30.8 प्रतिशत) था।सोनभद्रमेंगर्भावस्थाकेदौरानजटिलताएंभीसबसेअधिकथीं(28.6 प्रतिशत)। 3 जिलोंमेंमहिलाओंकेसामान्यप्रसवकाअनुपात 85 प्रतिशतयाउससेअधिकथा।

प्रसवकेदौरानकी जाने वाली सांस्कृतिकऔरस्थानीयप्रथायेँ:


हरदससेएकमामलेमेंगर्भनालकोकाटनेकेलिएपुरानेयासंक्रमितउपकरण/ ब्लेडउपयोगकिया गयाथा।इसकाप्रतिशतवाराणसीग्रामीणक्षेत्रमेंसबसेअधिक (33.1 प्रतिशत) था, उसकेबादसोनभद्रमें 14.3 प्रतिशतऔरकौशांबीमेंशून्यप्रतिशतथा।आधेनवजातशिशुओंमेंसेलगभग 51 प्रतिशतकोतुरंतयाजन्मकेएकघंटेकेभीतरस्तनपाननहींकरायागया।औरहरदसवेंबच्चेमेंसेएकबच्चेको (12.7 प्रतिशत) कोस्तनपानकेअलावाकुछऔरदियागया (जैसेगायकादूधयाशहदविभिन्नसांस्कृतिकप्रथाओंकेचलते)। सोनभद्र मे केवल 28.6% बच्चो को जन्म के एक घंटे के भीतर माँ का दूध मिल सका, वहीं वाराणसी (ग्रामीण) मे यह आंकड़ा 38.5% और कोशम्बी मे सबसे अधिक 64.3% था। माताओं के साक्षात्कार से यह भी पता चला की केवल 35 प्रतिशत बच्चों को एक घंटे के भीतर कोलोस्ट्रम (माँ का पहला गाढ़ा दूध) दिया गया जबकि 62 प्रतिशत को जन्म के एक घंटे के भीतर कोलोस्ट्रम नहीं मिला। एक घंटे के भीतर कोलोस्ट्रम नहीं देने वाली महिलाओं मेंसे56% ने बताया कि बच्चे को कोलोस्ट्रम कभी नहीं दिया गया था।


माताओं ने बताया कि परिवार द्वारा पर्याप्त देखभाल नहीं की गयी। हर दस में से एक महिला को गर्भावस्था के दौरान देखभाल करने के लिए परिवार में कोई नहीं था।


गर्भावस्था से संबंधित मान्यताओं, वर्जनाओं और प्रथाओं की एक विस्तृत श्रृंखला मौजूद थी। कुल 52 प्रतिशत महिलाओं ने गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के दौरान कुछ या सभी उपरोक्त स्थानीय प्रथाओं का पालन किया जिसमे गर्भवती महिलाओं केयात्रा करने पर प्रतिबंध,व्यक्तिगत स्वच्छता संबंधी प्रथाएंऔर आध्यात्मिक कारकशामिल हैं। 69 प्रतिशत माताओं ने बताया की उन्हे प्रसव पूर्व जटिलताओं का सामना करना पड़ा। गर्भवस्ता एवं प्रसव कि जटिलताओं के प्रबंधन के लिए घरेलू उपचार का प्रयोग करने वाले केवल 10.3 प्रतिशत उत्तरदाता थे जो कि अपेक्षाकृत कम थे। साक्षात्कार के दौरान बताए गए कुछ घरेलू उपचार इस प्रकार थे - बच्चे को ठंड से राहत दिलाने के लिए गर्म सूती कपड़े में लपेटना, स्थानीय ओझा के पास जानाजो काला जादू,टोना-टोटका जानते थे और स्थानीय देवी-देवताओं से प्रार्थना करते थे।


नवजातबच्चोंकावज़न:


नवजातशिशुओंमें36.4 प्रतिशतकम वज़न वाले बच्चे (LBW -लोबर्थवेट)थे।यहप्रतिशतसोनभद्रमेंसबसेअधिकथा (57 प्रतिशत), इसकेबादवाराणसीग्रामीणक्षेत्रमें (31 प्रतिशत) औरकौशाम्बीमें (27 प्रतिशत) था।


जन्म और मृत्यु के बीच की अवधि:


ज़्यादातर बच्चोंकीमृत्युऔसतन 4 दिनोंकेभीतरहुईहै, जिसमेंवाराणसीग्रामीणक्षेत्रमे5 दिनसेलेकरसोनभद्रमें 3.6 दिनतक। 82 प्रतिशतमृत्युजन्मके 7 दिनोंकेभीतरहुईंइसलिएये निर्णायक तोर पर यहप्रारंभिकनवजातमृत्युहै।यहप्रतिशतकौशाम्बी (86 प्रतिशत) मेंसबसेअधिकथा, इसकेबादसोनभद्र (79 प्रतिशत) औरवाराणसीग्रामीण (77 प्रतिशत) था।दिनोंकीसंख्यासोनभद्रमें (0 से 15 दिनों) कमथीजोयहदर्शाताहैकीनवजातबहुतकमदिनोंकेलिएजीवितथे।


माताओं के साथ किए गए साक्षात्कार यह दर्शाते हैं की बड़े नमूनोकी तरह, उप-नमूने मे भी बालिकाओं की मृत्यु कुल नवजात मृत्यु के 51.7 %है जो कि प्रतिशतआनुपातिक रूप से अधिक है। नवजात मृत्यु में 62 प्रतिशत शुरुआतीदिनों मे हुई मौतें थीं(जैसा की केस स्टडि की जानकारी मे भी बताया गया है)। 7 दिनों के भीतरजिनमें से आधी (31%) मौतें एक ही दिन हुई थीं। 1 ऑर्डर और 4+ ऑर्डर जन्मों में 72.3 प्रतिशत नवजात शिशुओं की मृत्यु हुई, जो ऊपर दिए गए अनुभाग में प्रस्तुत बड़े नमूने के निष्कर्षों के अनुरूप है।


 


मृत्युकास्थान:


अधिकांशमौतेंघरमेंहुईं (58 प्रतिशत) और 38 प्रतिशतस्वास्थ्यसुविधा (निजी -20 प्रतिशतऔरसार्वजनिक - 18 प्रतिशत) मेंहुईं।सभी 3 जिलोंमें, सबसेज्यादामौतेंघरोंमेंहुईं - वाराणसीग्रामीण (53.8 प्रतिशत), कौशाम्बी (57.1 प्रतिशत) औरसोनभद्र (64.3 प्रतिशत)।

केंद्रीय / राज्ययोजनाओंकेअंतर्गतलाभ :


लगभगएकतिहाईउत्तरदाताओं (39 प्रतिशत) कोप्रावधानितकेंद्रीय / राज्यमातृत्वलाभयोजनाओंकेतहतलाभमिला। वाराणसीग्रामीणमें, 30 प्रतिशतमहिलाओंकोकेंद्रीय / राज्ययोजनाओंकेतहतलाभमिला।यहअकड़ाकौशाम्बीमेंसर्वाधिकरहाजिसमे 58 प्रतिशतमहिलाओंकोविभिन्नयोजनाओंकेतहतलाभप्राप्तहुआ।उल्लेखनीयहैकिसोनभद्रकीकिसीभीमहिलाकोकेंद्रीययाराज्यस्तरकीमातृत्वयोजनाओंकेतहतकोईलाभनहींमिला। 


माताओं के साथ किए गए साक्षात्कार के अनुसार अधिकांश महिलाओं (93.1 प्रतिशत) के पास MCPC कार्ड थे। यह भी देखा गया कि यद्यपि गर्भवती माताओं को पंजीकृत किया गया था, लेकिन उनके पासMCP कार्ड नहीं रखा गया था।


लगभग 79 प्रतिशत माताओं ने गर्भावस्था की अवधि के दौरान एक दिन में तीन बार भोजन करने की सूचना दी, जबकि 17 प्रतिशतमहिलाओं ने बताया की उन्हे एक दिन मे 3 बार भोजन प्राप्त नहीं हुआ, हालांकि ज़्यादातर उत्तरदाताओंको आशा, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और एएनएम द्वारागर्भावस्था के दौरान पोषण आहार और कैल्शियम के सेवन के महत्व के बारे मे परामर्श दिया गया था। अधिकांश माताओं (93 प्रतिशत) को गर्भावस्था के दौरान सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधा  (पोषण आहार) मिला था।


निष्कर्ष एवंसुझाव


यह शोध पर्याप्त रूप से उन कारकों को दर्शाता है जो माताओं और नवजात शिशुओं के लिए प्रभावी स्वास्थ्य सेवा में बाधा उत्पन्न करते हैं। इस शोध से असंतोषजनक स्वास्थ्य देखभाल और बाल स्वस्थ्य प्रथाओं के लिए अग्रणी प्रणालीगत और सामाजिक-सांस्कृतिक कारक स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। यदि हम आपूर्तिकी बात करें तो पर्याप्त और प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ की उपलब्धता में कमी (केवल 14 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने डॉक्टर से सहायता प्राप्त डिलीवरी की सूचना दी), पर्याप्त स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की कमी (बेड और प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मि केवल 17 प्रतिशत महिलाओं के लिए उपलब्ध थे) औरवित्तीयसामर्थ्य (40 प्रतिशत से कम माताओं को योजनाओं से कोई वित्तीय सहायता मिली - गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों से होने के बावजूद) मुख्य अवरोध के रूप में सामने आए हैं।


यह बाध्यताए जब शिक्षा की कमी, कम आय, जागरूकताका अभाव और अप्रतिकूल सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं के कारण माताओं को हुए अंतर्निहित नुकसान के साथ मिलकर असंतोषजनक स्वास्थ्य संबन्धित व्यवहार और बाल स्वस्थ्य प्रथाओंको जन्म देती है।और इस अध्ययन सेइसकेसंकेतभी मिले हैं, जैसे कि 41 प्रतिशत महिलाओं ने घर पर या उप-केंद्रों में प्रसव का विकल्प चुनाजहां डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे, केवल 28 प्रतिशत माताएँ ही प्रसव के 7 दिनों के भीतर किसी भी स्वास्थ्य सुविधा की जाँच के लिए गएवहीं जन्म के दिन, कोलोस्ट्रम-फीडिंग केवल 35 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कराई गयी आदि, अन्य अप्रतिकूल बाल स्वस्थ्य से जुड़े व्यवहारों औरप्रथाओं से नवजात शिशु के अस्तित्व के लिए एकगंभीरजोखिम पैदा हो गयाहै।


शोध यह भी दर्शाता है की गर्भवती महिला को दी जाने वाली देखभालके महत्वपूर्ण निर्णय को प्रभावित करने वाले कारकों में महिला, उसके पति और उसके रिश्तेदार, प्रशिक्षित दाई कीउपलब्धता और योग्यता, गंभीर जोखिम वाले गर्भधारण को पहचानने और सही सलाह लेने की क्षमता, परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति, बीमारी के लक्षणो और उसकी गंभीरता को पहचानना, निकटतम उपलब्ध स्वास्थ्य सेवा तक की दूरी, वित्तीय और अवसर लागत (सामर्थ्य), पिछले अनुभव और देखभाल की कथित गुणवत्ता से दूरीशामिल है। अन्य कारक हैं भौतिक पहुँच, घर से यात्रा का समय, सुविधा, परिवहन की उपलब्धता और लागत और सड़कों की स्थिति।यह अध्ययन उन बाधाओं और अंतरालों की बहूलता को बढ़ाता है जो माताओं और नवजात शिशुओं के लिए पर्याप्त, प्रभावी और समय पर स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित करने के लिए ठोस सिफारिशों के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं।


रोकथाम हेतु देखभाल –


प्रसव- पूर्व देखभाल (एएनसी), जो सुरक्षित प्रसव के लिए महत्वपूर्ण है, पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।अध्ययन मे यह देखा गया की 15 प्रतिशत से भी कम माताओं को पूर्ण एएनसी प्राप्त हुई थी, जिससे माँ और बच्चे दोनों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ गया था। अध्ययन इस तथ्य का संज्ञान लेता है कि आशा कार्यकर्ता यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं और पूर्ण एएनसी चेक-अप के महत्व को प्रभावी ढंग से बढ़ावा देना चाहिए। गंभीर  जोखिम वाले गर्भधारण की पहचान करने के लिए सक्रिय उपाय (जैसा कि 44 प्रतिशतमाताओं द्वारा अनुभव किया गया है) और पर्याप्त रेफरल तंत्र भी चिंतनीय है। आशा, एएनएम और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं जैसे आउटरीच कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए, साथ ही अतिरिक्त संसाधनो को ‘अंटाइड फंड्ज’ के रूप मे आपातकालीन स्थितियों लिए उपयोग किए जा सकता हैं।


सुरक्षित प्रसव के श्रेष्ठ अभ्यास –


अध्ययन में पाया गया कि यद्यपि घर पर प्रसव में काफी कमी आई है, लेकिन फिर भी अध्ययन क्षेत्रों में इसका मौजूदा अभ्यासदेखा गया है (उदाहरण के लिए - वाराणसी ग्रामीण में 29 प्रतिशत माताओं ने घर पर प्रसव करवाया)। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए, आशा, एएनएम आदि जैसे अधिक आउटरीच कार्यकर्ताओं की भर्ती की जानी चाहिए। साथ ही संस्थागत देखभाल की गुणवत्ता में सुधार करने की आवश्यकता है ताकि अधिकतम नवजात शिशुओं की मृत्यु को रोका जा सके और स्वास्थ्य जटिलताओं को समय रहते संबोधित किया जा सके। यह भी फायदेमंद होगा यदि दाई को प्रशिक्षित किया जा सके ताकि वे समय पर स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए जटिल गर्भधारण का उल्लेख कर सकें और इस प्रकार, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा दे सकें।


पारगमन के दौरान होने वाली मौतों को कम करने के लिए, मौजूदा 102 और 108 एम्बुलेंस सेवाओं की पिक एंड ड्रॉप सुविधा के संदर्भ में परिवहन सुविधाओं को स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा मजबूत किया जाना चाहिए और समय पर कार्य करना चाहिए ताकिआपात स्थिति के दौरान माता और बच्चे के जीवन को बचाया जा सके। सामुदायिक सामूहिकता और समूहों का गठन परिवार की आपातकालीन जरूरतों और गर्भवती महिलाओं के लिए परिवहन जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाना चाहिए और सबसे अधिक गरीब परिवारों कि गर्भवती महिला के स्वास्थ्य और पोषण की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी किया जाना चाहिए।


प्रसव के दौरान चिकित्सा देखभाल और प्रोटोकॉल –


अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि शायद ही किसी सरकारी सुविधा में किसी भी संस्थागत प्रसव में डॉक्टरों द्वारा सहायता प्रदान की गई (15 प्रतिशत से कम)। इसी तरह, गुणात्मक निष्कर्षों से पता चलता है कि अधिकांश स्वास्थ्य सुविधाओं में मानव संसाधन जैसे कि नवजातशिशु विशेषज्ञ, प्रसूति रोग विशेषज्ञ, लैब तकनीशियन, एनेस्थेटिस्ट और मिडवाइव्स की भारीकमी थी। स्वास्थ्य कर्मचारियों के रिक्त पदों को तत्काल आधार पर भरा जाना चाहिए और विशेषज्ञों जैसे कि स्त्री रोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ को सोनभद्र जैसे उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भर्ती किया जाना चाहिए। अध्ययन के निष्कर्षों ने चिकित्सा सुविधाओं में खराब नैदानिक ​​प्रथाओं को भी प्रतिबिंबित किया (उदाहरण के लिए, संस्थानों में वितरित होने वाली माताओं के 62 प्रतिशत माता-पिता को उसी दिन छुट्टी मिल गई, इस प्रकार, मां और उसके बच्चे की प्रसव पूर्व देखभाल की आवश्यकता से समझौता करनापढ़ा)। डिस्चार्ज प्रोटोकॉल सहित मातृ और शिशु देखभाल की सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रशिक्षित करने, निगरानी करने और उन्हें सुनिश्चित करने की तत्काल आवश्यकता है। उचित संस्थागत देखभाल महत्वपूर्ण रूप से नवजात मृत्यु को कम कर सकती है।


प्रसवोत्तर चेक-अप (पीएनसी) सुनिश्चित करना –


नवजात मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए प्रसव उपरांतदौरे को श्रेष्ठ प्रथाओं में से एक के रूप में स्वीकार किया जाता है। एक बार फिर, आशा कार्यकर्ता द्वारा निभाई जाने वाली संभावित भूमिका जन्म के बाद पहले 7 दिनों के भीतर अनिवार्य 3 प्रसव उपरांत संपर्कों को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण है। पीएनसी की स्थापना सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त आवंटन, प्रशिक्षण और निगरानी के साथ तत्काल ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।


स्वास्थ्य संबंधी व्यवहारों और बच्चों की देखभाल के तरीकों में सुधार –


मातृ और शिशु कि देखभाल से संबंधित मुद्दों, प्रसव पूर्व देखभाल, प्रसव से जुड़े जटिलताओं के खतरे के संकेत, स्मार्ट मोबाइल वैन के उपयोगसे प्रसव पूर्व देखभाल पर समुदाय मे लघु फिल्मों, 'नुक्कड़ नाटक' आदि का उपयोग करते हुए सूचना का प्रसार किया जाना चाहिए। यह साधन उन समुदाय में अधिक प्रभावीहै जहां जनसंख्या का बड़ा अनुपात अशिक्षित है।


विशेष रूप से कम वज़न वाले बच्चे और समय से पहलेजन्मे बच्चों को देर से स्तनपान कराने से बच्चों की मृत्यु सहित गंभीर चिकित्सा परिणाम हो सकते हैं, और इसलिए समुदाय (माँ और बच्चे के परिवार) को सही ज्ञान प्रदान करना अनिवार्य है। सरकार प्रायोजित और सामुदायिकनिवारण आधारित हस्तक्षेप कार्यक्रमों के माध्यम से पुरुषों की सक्रिय भागीदारी की मांग की जानी चाहिए। पति-पत्नी के बीच संचार बच्चे के जन्म की तैयारी को बढ़ावा देने का एक प्रभावी साधनहो सकताहै। इसलिए, इसे प्रसवपूर्वऔर प्रसव उपरांत देखभाल सेवाओं में पतियों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।


सामुदायिक जागरूकता और संवेदीकरण –


जन्म के लिए व्यक्तिगत और पारिवारिक तैयारी को विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षण के माध्यम से बढ़ावा दिया जाना चाहिए जैसे कि सकारात्मक दृष्टिकोण, जन्म की तैयारी के प्रति अनुकूल धारणा, आत्मप्रभावकारिता और पारिवारिक और सामाजिक समर्थन। विभिन्न समुदायों में मौजूद कई सांस्कृतिक मान्यताएं और परंपराएं देखभाल प्रथाओं को प्रभावित करती हैं (52 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने संस्कृति-प्रेरित होने के बाद निम्नलिखित प्रथाओं की पुष्टि की)। बच्चियों की देखभाल में उपेक्षा और लड़कियों के लिए स्वास्थ्य सेवा की खराब पहुंच के कारण, आंकड़ों ने दर्शाया कि लड़कों की तुलना में अधिक लड़कियों (53%) की मृत्यु (47%) जन्म के पहले महीने में हुई। समुदाय में इस तरह की परंपराओं की उपस्थिति का एहसास, गहन सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) अभियान मिथकों और गलत धारणाओं को दूर करने और स्वस्थ और न्यायसंगत प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए तैयार किए जाने चाहिए। परिवार के सदस्यों की विस्तृत काउंसलिंग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और प्रचलित प्रथाओं से जुड़े वर्जनाओं को संबोधित करने के लिए आयोजित किया जाना चाहिए।


नीतिगतसुझाव -


भारत में नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य के क्षेत्र मे सीखे गए सबक INAP / NHM / NAPC / SDGs के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में प्रगति को तेज करने और अधिक प्रभावी बनाने के लिए राज्य-विशिष्ट रणनीतियों औरबहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। नवजात और बच्चे के जीवनके लिए नीतिगत विकल्पों में सामुदायिक जागरूकता, निवारक रणनीतियों को अपनाना, स्थानीय स्वास्थ्य ढांचे को बढ़ाना और बाल स्वास्थ्य और संबंधित मातृ एवं किशोर स्वास्थ्य नीतियों और योजनाओं में निवेश बढ़ाना शामिल किया जाना चाहिए।



  1. जन्म और मृत्यु पंजीकरण को सख्ती से अनिवार्य किया जाना चाहिए। सिविल पंजीकरण और महत्वपूर्ण सांख्यिकी (जन्म और मृत्यु का पंजीकरण मृत्यु के कारण के साथ) हर नव-जन्म की गिनती के लिए उत्तरोत्तर मजबूत किया जाना चाहिए। कार्यक्रमों में सुधार के लिए मृत्यु दर के बारे में सूक्ष्म स्तर के अनुसंधान, सूचना और विश्वसनीय डेटा की आवश्यकता होती है। एनएनएम की रिपोर्टिंग की प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए और प्रत्येक नवजात की मृत्यु को भविष्य मे जन्म लेने वाले बच्चो के स्वास्थ्य में सुधार के लिए ऑडिट किया जाना चाहिए। गर्भधारण के पंजीकरण और संबंधित अनुवर्ती के लिए सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा सख्त दिशा-निर्देश रखे जाने चाहिए।

  2. राज्य के अधिकारियों द्वारा वार्षिक कार्यान्वयन योजनाओं की समय-समय पर निगरानी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। वार्षिक स्वास्थ्य योजनाओं को भी स्थानीय आवश्यकताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए और तदनुसार, प्रभावी बजट प्रक्रियाएं होनी चाहिए।सेवाओं में अंतराल का आकलन करने और सुधारात्मक उपाय करने के लिए स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा समय-समय पर स्वास्थ्य सुविधा ऑडिट और जरूरत के अध्ययन का आकलन किया जाना चाहिए।


 


3.मातृत्व और बाल स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर आउटरीच कार्यकर्ताओं के लिए आवधिक प्रशिक्षण और प्रशिक्षण के मूल्यांकन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। सेवाओं में अंतराल का आकलन करने और सुधारात्मक उपाय करने के लिए स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा समय-समय पर स्वास्थ्य सुविधा ऑडिट और जरूरत के अध्ययन का आकलन किया जाना चाहिए। मातृ / शिशु देखभाल और उपलब्ध सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी का प्रसार करने के लिए गहन जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि कार्यक्रमों की पहुंच बढ़ाई जा सके।


 


4। सामुदायिक स्तर पर लड़कियों की जल्दी शादीको रोकने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। स्कूल और सामुदायिक स्तर के कार्यक्रमों और गतिविधियों के माध्यम से किशोरियों के बीच पोषण संबंधी कमियों जैसे मुद्दों को हल करने का प्रयास किया जाना चाहिए।



  1. मातृत्व और बाल स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर आउटरीच कर्मचारी के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण और मूल्यांकन का प्रचार किया जाना चाहिए। हालांकि संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रमों में प्रोत्साहन का समावेश किया गया है, स्वस्थ प्रथाओं जैसे कोलोस्ट्रम फीडिंग, एक्सक्लूसिव स्तनपान, गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान पौष्टिक भोजन का सेवन और व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना भी प्रोत्साहित किया जा सकता है।

  2. सरकारी योजनाओ की पहुच बढ़ाने के लिए मातृ / शिशु देखभाल और उपलब्ध सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी के प्रसार के लिए सघन जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। स्कूल और सामुदायिक स्तर के कार्यक्रमों और गतिविधियों के माध्यम से किशोरियों के बालविवाह और पोषण संबंधी कमियों जैसे मुद्दों के समाधान के लिए भी प्रयास किए जाने चाहिए।

  3. प्रसवोत्तर दौरों को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, क्योंकि दुनिया भर में इस रणनीति को नवजात और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए सबसे असरदार अभ्यास के रूप में स्वीकार किया गया है। इसलिए आशा की भूमिका महत्वपूर्ण है। सरकारी दिशानिर्देश जन्म के 7 दिनों के भीतर 3 प्रसवोत्तर संपर्कों को निर्देशित करते हैं। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसकी निगरानी और सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

  4. साथ ही संस्थागत देखभाल की गुणवत्ता में सुधार लाने और डिस्चार्ज प्रोटोकॉल को तैयार करने और लागू करने पर ध्यान देने की आवश्यकता है। संस्थागत देखभाल नवजात शिशु मृत्यु दर (एनएमआर) को विशेष रूप से शुरुआती एनएमआर को काफी कम कर सकती है जो अध्ययन के निष्कर्षों में भी दिखता है (पूरे एन एम आर का 82%)।

  5. स्वास्थ्य विभाग और सरकारी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा एएनसी की गुणवत्ता में सुधार के लिए उठाए जाने वाले कदम विशेष रूप से 4 एएनसी की और अधिक ध्यान केंद्रित करें ताकि गर्भावस्था के अंतिम सप्ताह के भीतर अंतिम एएनसी और बीपी / सीआर (जन्म की तैयारी और जटिलता की तत्परता) को संबोधित किया जा सके।

  6. एसडीजी के लक्ष्यों को प्राप्त करने और एनएमआर को कम करने के लिए तत्काल रणनीति को सामान्यीकृत रणनीति से केंद्रित दृष्टिकोण (नेरोड दाउन अप्रोच) में बदलनेकी आवश्यकता है। इनमे से एक रणनीति आदिवासी बहुमूल्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना है क्योंकि वहां बड़ी संख्या में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर्ज हो रहीं हैं। इसके जन्मक्रम मे प्रथम जन्म पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है क्योंकि यह बड़े हुए एनएमआर के पीछे की मुख्य वजहों मे से एक है।

  7. आई पी एच एस मानकों के अनुसार मानव संसाधनों की पर्याप्तता को संबोधित करने से संबंधित अधिकांश सिफारिशें, उनका प्रशिक्षण, गुणवत्ता के बुनियादी ढांचे की उपलब्धता आदि पर्याप्त बजटीय आवंटन पर निर्भर हैं। केन्द्रीय बजट मे बाल बजट का अनुपात लगातार 3 साल से घट रहा है। इसी प्रकार कुल बाल बजट मे बाल स्वस्थ्य के लिए किए गए बजटीय आवंटन मे भी गिरावटका रुझान 3.9 प्रतिशत (2018-19 बीई) से 3.57 प्रतिशत (2019-20 बीई) से 3.4 प्रतिशत (2020-21 बीई)देखा गया है। इस प्रकार, स्वास्थ्य के लिए सार्वजनिक प्रावधान (बजट प्रावधान) बढ़ाकर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को सार्वभौमिक बनाने की तत्काल आवश्यकता है।


 


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About -Child Rights and You (CRY)


 


CRY is an Indian non-profit organization that believes in every child's right to a happy childhood - to live, learn, grow and play.


We address children’s critical needs by working with parents, teachers, Anganwadi workers, communities, district and state level governments as well as the children themselves. We focus on changing behaviors and practices at the ground level and influencing public policy for advocacy at a systemic level - thereby creating an ecosystem where children are made the nation’s priority.


In the last 40 years, with the help of our partners, donors, volunteers and supporters, we have impacted the lives of over 3 million children across 19 states in India.


 


 


What We Do


 


We work in all 4 areas of children’s rights:


 


Education


Ensuring that children go to school and complete their education


 


Health & Nutrition


Increasing access to proper nutrition and quality healthcare


 


Safety & Protection


Addressing issues like child labour, child marriage, trafficking and abuse


 


Participation  


Creating an environment where children's voices are heard and considered


 


 


Our Impact (2019 - 20)


 



  • 6,80,490 children impacted overall 

  • 1,63,541 children in CRY project areas, between the ages of 6-18 years, in school 

  • 97% children in CRY project areas, under the age of 1 year, immunized 

  • 88% children in CRY project areas, under the age of 5 years, free from malnutrition 

  • 2,064 children in CRY project areas rescued from child labour, child marriage & child trafficking


 


 


Awards & Recognition



  • CRY is recognized as India’s Most Trusted NGO (Trust Research Advisory Report 2018)

  • CRY has been chosen as one of the top 100 nonprofits making a difference in the world by The Elders – an international body founded by Nelson Mandela

  • Puja Marwaha (CEO, CRY) won the Olga Alexeeva Memorial Prize for Best Innovation in Philanthropy


 


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