अमृता प्रीतम की जुबानी उनकी कही अनकही कहानी

अमृता प्रीतम की तेजाबी शब्दावली दर्द की दास्ताँ का प्रतिनिधित्व करते हुए एक आह भरती हुई मूकता की भाषा में कहती


है:   


 


बदन का मांस                       


जब  गीली मिट्टी की  तरह होता


तो सारे लफ्ज़-


मेरे सूखे हुए होठों से  झरते


और मिट्टी में


बीजों की तरह गिरते.


कुछ ऐसे ही सारा शगुफ्ता के जीवन और जीवनी को करीब से देखने, जानने और महसूस करने वाली महबूब लेखिका अमृता प्रीतम ने सारा शगुफ्ता के शब्दों को दोहराते हुए लिखा है-”ऐ खुदा,  मैं बहुत कड़वी हूँ, पर तेरी शराब हूँ!और मैं उसकी नज़रों और उसके खत को पढ़ते पढ़ते खुदा के शराब की बूद-बूँद घूँट घूँट कर पी रही हूँ.” औरों के दिलों में झाँकने और दर्द की पीढ़ा को खुदा की शराब समझकर बूँद बूँद पीने वाली अमृता प्रीतम ने दर्द की परिभाषित करते हुए लिखा है:


तेरे इश्क की एक बूंद/ इसमें मिल गई थी


इसलिए मैंने उम्र की/ सारी कड़वाहट पीली..!


ज़िन्दगी और दर्द का चोली दामन का साथ है, जब तक जान में जान है, सीने में सांसे धड़कती हैं, मिलना बिछडना कायम रहता है. जीवन के सूर्यास्त के समय ज़िन्दगी भी तो मौत से मिलती है.


पंजाब की प्रख्यात कवित्री, कहानीकार व उपन्यासकार अमृता प्रीतम ने नारी के जीवन में धँसकर देखा, महसूस किया, और उनकी कलम ने नारी के ज़हन की त्रासदी को पहचानाते हुए उनके मनोभावों को अपनी इस कविता 'पुल' में व्यक्त किया है:


"कल हम दोनों ने/ एक पुल जलाया था


और एक दरिया के/ किनारों की तरह नसीब बांटे


बदल झटके/ तो एक बदन की वीरानी


इस किनारे थी/ और एक बदन की वीरानीउस किनारे...!


 


अमृता प्रीतम की जिंदगी में इंद्रजीत इमरोज तब दाख़िल हुए जब अमृता और साहिर के रास्ते अलग हो गए. दोनों के दिलों में एक दूसरे के लिए जो मोहब्बत बैठ गई थी वह निकलने वाली न थी. यह तो वही जान सकता है जो इस आग से तपकर निकला हो. अपने मन की भावनाओं को कलम के माध्यम से अमृता ने लिखा है -


हथेलियों पर /इश्क की मेहंदी का कोई दावा नहीं


हिज्र  का एक रंग  है/ और तेरे ज़िक्र की एक खुशबू….!


मेरी एक ग़ज़ल का यह शेर भी इसी बात का ज़ामिन है-


 


उसे इश्क क्या है पता नहीं, कभी शमअ पर वो जला नहीं


उसे क्या बुझायेंगे आंधियाँ, ये चराग़े-दिल है दिया नहीं


 


अलबता अमृता ने यह तस्लीम कर लिया था कि उसकी  झोली में साहिर के प्यार का इतना ही हिस्सा था, और साहिर ने भी यह मान लिया था कि उनके हिस्से में अमृता का जितना प्यार था वे पा चुके!.फिर भी महफिलें जमतीं, अक्सर पीने पिलाने के जाम के दौर होते और एक अधूरी अनबुझी प्यास लबों पर लिए सभी अपनी अपनी राह चल देते. एक महफिल में साहिर, अमृता व् इमरोज़ तीनों साथ रहे, जाम सभी के सामने, पर पी सिर्फ साहिर ने. खामोशी उस दौरमें सभी को टटोलती रही. लेकिन उस रात 12:00 बजे साहिर ने अमृता को फोन करके अपनी एक ग़ज़ल का मुखड़ा सुनाया, जो उन्होंने तब ही लिखा था, और वही ग़ज़ल उनकी कलम की ज़ीनत बन गई.



 


मेरे साथी खाली जाम, मेरे साथी खाली जाम


तुम आबाद घरों  के वासी,  मैं आवारा और बदनाम


इसी साहिर के नाम अमृता ने “आखरी खत” लिखा,  वही साहिर जो लाहौर में मजनू की मानिंद उसके घर के करीब आकर कोने पर स्थित पान बीड़ी की दुकान पर आता, कभी पान खरीदना तो कभी सिगरेट, कभी सोडा का ग्लास हाथ में लिए घंटों खड़ा रहता, उसकी खिड़की की ओर देखता रहता जो उस दुकान की तरफ खुलती थी.


“सिर्फ तुम्हारी झलक पाने के लिए” –साहिर के मुंह से यह हक़ीक़त जानते ही अमृता ने अफसोस से अपना माथा पीट लिया.  अंतराल के बाद उन्होंने कहीं लिखा-


“ मेरे और साहिर के बीच दीवारें थी. वे उर्दू  ज़बान में लिखते और मैं पंजाबी में. उन दीवारों ने भी कभी मेरी नज्मों को साहिर तक पहुंचने न दिया.’इस रिश्ते का इससे ज्यादा दर्दनाक अंजाम क्या हो सकता था?


वह “आखिरी खत” जो  अमृता ने साहिर के लिए लिखा था वह ‘आईना’ रिसाले में छपा. साहिर ने वह ख़त जब पढ़ा तो कई दिन तक उसे छाती से लगाए घूमते रहे.


इश्क दीवानापन है यारो और कुछ भी तो नहीं


दर्द पागलपन है यारो और कुछ भी तो नहीं!


    ज़ाहिर है शामअ पर मर मिटने वाले आशिकअपनी माशूका पर मर मिटने की तौफीक रखते हैं. इन्द्रजीत इमरोज़ फैसल आबाद के पास एक गांव में रहते थे. सिर्फ नौ साल की उम्र के थे कि माँ का साथ छूट गया. जब सातवीं क्लास में थे तो कहीं अमृता की तस्वीर देख ली जो दिल में उतर गई. हाई स्कूल में थे तो अमृता का एक अफसाना ‘डॉक्टर देव’ पढ़ा और पढ़ते ही अमृता उनके दिलो दिमाग पर छा गई. एक नशे का खुमार था या प्रेम का बुखार, पर किसी तरह उन्होंनेअमृता का फोन नंबर हासिल किया और उन्हें फोन लगाया, अमृता ने पूछा’ कौन  है?”


तो इंद्रजीत ने कहा“डॉक्टर देव".


कुछ समय यूँ ही बीच से गुजर गया.  और रोजगार की तलाश में इंद्रजीत दिल्ली आये तो वे भी उसी कॉलोनी में आकर बसे जहां अमृता रहती थी. इंद्रजीत एक अच्छे कलाकार थे और इमरोज़ के नाम से उनकी तस्वीरों की बड़ी साख थी. उनकी आमदनी 1500 रुपए हो जाती थी और अमृता की हर माह 125 रुपये. दोनों बस में सफर करते थे, इस तरह एक दूसरे के साथ उनकी पहचान होती गई, बढ़ती गई, और बढ़ते बढ़ते गहरी होती गई.


          इमरोज़ ने जैसे-तैसे एक स्कूटर खरीद ली और अमृता को स्कूटर पर लिफ्ट की पेशकश की जो अमृता ने मान ली. फिर दोनों का मिलना, साथ आना-जाना बना रहा.इमरोज़ बताते हैं कि वह स्कूटर पर मेरे पीछे बैठकर मेरी कमर पर उंगली से कुछ लिखती रहती थी. और एक दिन किसी इंटरव्यू में उसने खुद ही उस राज़ से पर्दा उठा दिया कि वह इमरोज के पीछे बैठकर उसकी कमर पर उंगली से साहिर साहिर लिखती रहती थी.”  लगता है अमृता ने अपने वजूद के रोंए रोएं में साहिर का नाम तराश रखा था, जिसने आधी रात के समय एक शेर अपने साथी के नाम लिखा


 


मेरे साथी खाली जाम, मेरे साथी खाली जाम


तुम आबाद घरों  के वासी,  मैं आवारा और बदनाम


इस इश्क़ को किस नाम से पुकारा जाए? यह इश्क नहीं आसान, इक आग का दरिया है जिसे पार कर जाना है.’ शायद यह इश्क ही एक रचनाकार को शायर बना देता है, एक शेर मेरी ग़ज़ल का भी यही बात दोहरा रहा है-


‘यह शायरी क्या चीज है अलफ़ाज़ की जादूगरी


तेरे लिए आवारगी मेरे लिए दीवानगी’


 


ऐसी ही दीवानगी के तहत शायद अमृता इमरोज़ की कमर पर उंगली से साहिर साहिर लिखती रही. अपने अहसासों को शब्दों में बखूबी ज़ाहिर करते हुए उन्होंने यह भी लिखा है:


श्क का बदन ठिठुर  रहा है/ गीत का कुर्ता कैसे सियूं


ख़यालों का धागा उलझ गया है/ कलम की सुई टूट गई है


और सारी बात खो गई है….


 


    एक दिन इमरोज़ को, गुरुदत्त ने फिल्मों के काम करने के लिए बुलाया. इमरोज़ ने इस ऑफर की खबर अमृता को सुनाई. इसका ज़िक्र करते हुए अमृता ने अपनी आप बीती में लिखा है- ‘लगता है जैसे मुझसे कोई छूट रहा हो, उसी मुंबई ने मेरे साहिर को मुझसे ले लिया था और अब वही मुंबई दूसरी बार..!आँखों का पानी संभल ही नहीं रहा था. दूसरा कोई मेरे आंसुओं को देख ना ले इसलिए मैंने उस दिन का अखबार उठाकर आंखों के आगे रख लिया.”


शायद अमृता की अर्जी दुआ बनकर लौट आई. इन्द्रजीत का मुंबई से फोन आया ‘मैं कल लौट रहा हूँ.’  नौकरी अच्छी है, गुरुदत्त भी पसंद है मगर मुझे लगता है मैं यहाँ नहीं रह पाऊंगा.’  और इमरोज दिल्ली लौट आए. लेकिन काम और आमदनी मुंबई में ही थी, इसलिए उसे मुंबई जाना पड़ता था. अमृता एकदम नितांत अकेली हो जाती. उस दौरान दोनों खतों के ज़रिये अपनी धड़कनें एक दूसरे के पास  भेजते. 1960 में लिखे गए एक खत में अमृता ने लिखा- ‘राही तुम मुझे आखिरी समय में क्यों मिले?  जिंदगी का सफर खत्म होने वाला है और अगर मिलना था तो जिंदगी की दोपहर में मिलते, कम से कम उस दोपहर का ताप तो देख लेते!”


जवाब में इमरोज़ ने लिखा-‘तुमखूबसूरत शाम ही सही लेकिन मत भूलो तुम ही मेरी सुबह हो, तुम ही मेरी शाम, मेरी मंजिल हो,  मेरीकिस्मत हो.”


अमृता जिनको अपना समझती थी वह हमेशा उसके साथ रहे, चाहे वह दुख की धूप हो या सुख की छाँव. गुलज़ार भी उन में से एक थे. इमरोज़ को लिखे एक खत में अमृता ने गुलजार के आने का जिक्र किया-‘कल गुलज़ार आया था, आते ही कहा-‘सुना है आप की तबीयत ठीक नहीं है’  मैंने कहा कि वैसे तो ठीक हूँ पर शाम को दर्द शुरू हो जाता है जब सूरज डूबता है. गुलज़ार हंसने लगा, बोला ‘पुराने समय में किसी ने चांद चारपाई के पाये से बाँधा था, आप सूरज को बांध लें’.


मैंने कहा- ‘वह तो मैंने बांध ही रखा है,  शाम को जब जीत का खत आता है तो वह सूरज ही तो होता है.’


आखिरकार वह घड़ी भी आ गई जब दोनों को लगा कि वे अलग अलग नहीं रह सकते. 8 जनवरी 1964 से वे दोनों बिना शादी किए साथ-साथ रहने लगे. इससे पहले अमृता ने इंद्रजीत से पूछा था कि- पहले सारी दुनिया देख आओ और अगर लौट कर भी तुमने मेरे साथ जीना चाहा तो मैं वही करूंगी जो तुम कहोगे.’


जवाब में इंद्रजीत ने उस कमरे के सात चक्कर लगाए और कहने लगा-’ लो देख ली सारी दुनिया, अब क्या कहती हो?”


उस वक्त समाज में ऐसे रिश्ते की बहुत मुखालफत हुई. लेकिन इंद्रजीत ने परवाह नहीं की. उन्होंने तो अपना समाज रचा हुआ था. कहा-‘तुम मेरा समाज और मैं तुम्हारा समाज हूँ, वर्ना कोई समाज नहीं”. वह दोनों मिलकर खाना बनाते, सब्जी इंद्रजीत बनाते और गेहूं के आटे के फुलके अमृता बनाती थी. फिर दोनों इकट्ठे मिलकर खाना खाते. इन्द्रजीत अमृता को स्कूटर पर लेकर ‘आकाशवाणी’ ले जाते, जहाँ वह काम कर रही होती, फिर शाम को उन्हें लेकर लौटते. दिन भर कहीं पेंटिंग करते रहते थे. दोनों बच्चों को भी वही स्कूल छोड़ने जाते थे. दोनों ने 10,000 रुपये जमा करके एक कार खरीदी और कार का नाम ‘नीली’ रखा गया. नया घर था, नई कार और नया साथी इंद्रजीत.


 


1966 में इंद्रजीत ने अपना नाम बदल दिया और वे इंद्रजीत से इमरोज़ हो गए और उसके बाद दुनिया ने अमृता का वह दौर देखा जो एक सुपरस्टार का दौर था. हर तरफ अमृता का झंडा लहरा रहा था.


1986 में यूनेस्को की एक कांफेरेंस थी जिसका टॉपिक था Science and Religion Should go together. इसमें अमृता ने भागीदारी ली.  उसी के हवाले में अमृता लिखती हैं –‘मैंने conference में  अपना पेपर पढ़ा और वहीँ  गुजारिश की कि लफ्ज़ ‘मजहब’ बदलकर ‘धर्म’  कर दिया जाए, यानी ‘रुहानियत’. उनका दावा रहा कि रूहानियत तो एक ही है, लेकिन मजहब कई होते हैं- जिन में आपसी टकराव बना रहता है. इसी कारण इतने मसाइल उत्पन होते हैं. और आखिर में ‘रूहानियत’ को सही शब्द करार किया गया.


1989 में अमृता ने आवाम के गंभीर मसाईल से मुखातिब होते हुए कहा- ‘हम सभी जानते हैं कि इन्सान और इन्साफ के दरमियान एक लम्बा फासला है, जिसे तय करते हुए लोगों की जिंदगी के जाने कितने साल और कितनी कमाई बर्बाद हो जाती है. यह लाभ लाखों दुखी लोगों का सवाल है जहाँ आम इंसान के लिए इन्साफ का सपना देखना भी मुहाल है.” यह थी राजनेता अमृता प्रीतम- तब, जब राज्यसभा में यह मसला उठा था.


 


अदब के आशिकों के लिए अमृता ने गद्य और पद्य में कई किताबे लिखीं और समाज को सौंपी. उनके अफसानों में- पिंजर(नावेल),  डॉक्टर देव (नावेल),  कोरे कागज,  49 दिन,  धरती सागर और सीपियाँ, रंग का पत्ता, दिल्ली की गलियां,  तेरहवां सूरज,  जलावतन,  कहानियों के दो मज़मून है- कहानियां जो कहानियां नहीं,  और ‘कहानियों के आंगन में .’


शायरी के संकलन में- अमृत लहरां, जीवंदा जीवन, ओकेतियां वालियां!बदलां दी लाली, सांझ दी लाली, लोक हीरा, पत्थर घटे, अशोका, कस्तूरी, नागमणि, इक थी अनीता, हयात के हवाले से, कच्चे रेशम सी लड़की, मैं कविता हूँ, जलते बुझते लोग, जेबकतरे, कोरे कागज़, रसीदी टिकेट (autobigraphy), और shadows of words, और The Skeleton, शामिल हैं.


ई सदी दर्शन दे रही थी और पुरानी सदी रुखसत हो रही थी. अमृता सन 2000 तक जिंदगी के अस्सी बहार देख चुकी थी. इमरोज का साथ उनका हर दिन नया और ताज़ा बनाता था.


ज़िन्दगी के तवील सफ़र में 1919 से 2005 तक अमृता थक कर हारी. अलबता बुढ़ापे की बीमारियों से कमज़ोरी हावी होती रही. इमरोज़ के लिए 31 अक्टूबर, 2005 का दिन बहुत भारी था, जब 45साल की दोस्ती ने इमरोज़ की बाहों में दम तोड़ दिया. लेकिन इमरोज़ आज भी अमृता के साथ आनंद ले रहे हैं.  वह कहते हैं-‘अमृता ने जिस्म छोड़ा है रूह तो मेरे साथ है. घर के कोने-कोने में उसकी निशानियां मौजूद है. हम जीते हैं कि हमें प्यार करनाहै और हम प्यार करते हैं कि हमें जीना आ जाए.”


इमरोज़ के नाम अमृता की आखिरी नज़्म जिसका उन्वान है- ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी” एक अमर दास्ताँ की व्यथा गाथा है जो शायद शब्दों में आज भी एक अधूरी कहानी है-


मैं तुम्हें फिर मिलूंगी


कहाँ किस तरह नहीं जानती


शायद तुम्हारे ख़यालों की चिंगारी बनकर


तुम्हारे कैनवास पर  उत्तरूंगी


या शायद तुम्हारे कैनवास पर रेखा बन कर


खामोश तुम्हें देखती रहूंगी


एक झरना बनूंगी जिसे उसका पानी उड़ाता है


मैं पानी की बूंदे तुम्हारे जिस्म पर ढोंऊंगी


और ठंडक सी बन कर तुम्हारे सीने से  लिपटूंगी.


ये है अमर प्रेम के किस्से जो इतिहास में दर्ज हो जाते हैं.



 


देवी नागरानी


 


देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत)  8 ग़ज़ल-वकाव्य-संग्रह, (एकअंग्रेज़ी) 2 भजन-संग्रह, 10 सिंधी से हिंदी अनुदितकहानी-संग्रहप्रकाशित।सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्परअनुवाद।श्री मोदी के काव्य संग्रह,चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद,व् रूमी का सिंधीअनुवाद.NJ, NY, OSLO, तमिलनाडू, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित।डॉ. अमृता प्रीतम अवार्ड, व् मीर अली मीर पुरूस्कार, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषदव् महाराष्ट्र सिन्धी साहित्य अकादमीसेपुरुसकृत।


contact: dnangrani@gmail.com


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