दशहरा नहीं मैं मनाऊँगा

दशहरा नहीं मैं मनाऊँगा
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निकल पड़ा  दशहरा देखने ,
भीड़ थी काफी सड़को पर।
जीवन जान जोखिम भरा,
फिर भी गम नहीं मानव पर।
लगी दुकानें मिठाइयों की ,
धूलो से  खूब सनी थी।
बच्चें के आगे हम भी,
बेबस हो पड़े थे ।
बच्चों के  खिलौनें सजे,
देख देख रोने लगे। 
शौक पूरा  करने को,
पत्नी जिद करने लगे।
भरी भीड़ खचाखच में,
कौन किनको जानता है?
पैर के ऊपर पैर सटे है,
लोग धक्का दे जाते है।
रावण के उन पुतलों को,
देखने सब जाते है।
रावण दहन करके ,
पटाखे फोड़े जाते है।
पटाखे से कभी जलते,
कभी बच्चें खो जाते हैं।
नारियों की आबरू से कभी,
बदमाश छेड़ जाते हैं।
कलयुग के इन रावणों को,
मैं इसे जलाऊँगा ?
मन ही मन सोचता हूं,
दशहरा नहीं मैं मनाऊँगा।
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स्वरचित©®
 डिजेन्द्र कुर्रे"कोहिनूर"
पिपरभावना,बलौदाबाजार(छ.ग.)


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