कचनार

कचनार



 जानकारी


इंडियन बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ ने 1985 २में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सलाह दी कि वे अपने-अपने राजकीय पशु, पक्षी, बृक्ष और पुष्प चिन्हित करें। ताकि देश के हर क्षेत्र के लोग अपने वन्य प्राणियों और वनस्पति जगत के संरक्षण की भावना से अभिप्रेरित हो सकें। तब कचनार को बिहार का राजकीय फूल घोषित किया गया है। इसका वानस्पतिक नाम बाउटिनिया वारीगेटा है। हिंदी में कचनार के अलावा गोरियल और कूरल नामों से भी यह जाना जाता है। संस्कृत में इसे का चनार और कोविदार भी कहते हैं। कचनार का बाउटिनिया नाम वनस्पति जगत से जुड़े एक समर्पित व्यक्ति जीन बौहिन और उनके भाई गैस्पार्ड बौहिन के सम्मान में पड़ा। कचनार की दो खंडीय पत्ती को, जो मूलतः एक ही होती है, इन दोनों बंधुओं की कुलीन जोड़ी मानी जाती है। __ कचनार अपनी खूबसूरती की वजह से लोगों को आकर्षित करता है। सफेद रंग का कचनार अपनी पंखुड़ियों केआधार भाग पर पीले रंग की आभा लिए हुए होता है। इससे इस पुष्प की सुंदरता में चार चांद लग जाते हैं। इसका पुष्प वृंत छोटा होता है जिससे पांच पंखुड़ियां (पुष्प दल) लगी होती हैं। इसके हर पुष्प में पांच पुंकेसर लगे होते हैं। कभी-कभी सात पुंकेसर भी देखने को मिलते हैं। कचनार का फल लगभग तीस सेंमी लंबा, दस से पंद्रह बीज लिए हुए. सेम की तरह चपटा लेकिन लगभग आयातनाकर होता है। कचनार एक मध्य आकार का वृक्ष है। वृक्ष की छाल अपेक्षाकृत चिकनी और भूरे रंग की होती है। इसकी पत्ती लगभग हृदयाकार होता है जिसके बीच में एक गहरी खांच होती है जिससे यह दो संयक्त पत्ती प्रतीत होती है। खांच वाले स्थल पर नीचे की ओर पत्ती कटी रहती है। इसके कारण कचनार की पत्ती तितली के खुले पंख का भी आभास देती है। कचनार बगीचे, गृहवाटिका और लान के लिए सुंदर सजावटी वृक्ष हैं। इसको ज्यादा देखभाल की जरूरत भी नहीं पड़ती है। कम उर्वर मिट्टी में भी कचनार पनप जाता है। अत्यधिक ठंड इसके लिए हानिकारक होता है। पौधा रोपने के दूसरे साल झाड़ीनुमा आकार ले लेता है और उस पर फूल आने लगते हैं। अपने चरम पर पुष्पित वृक्ष का नयनाभिराम नैसर्गिक आनंद, शांति और सुकून देता है। यह औषधीय महत्त्व का भी वृक्ष है। इसका लगभग हर भाग परंपरागत चिकित्सा में उपयोगी है। कचनार की बंद कली और कच्चे फल का उपयोग सब्जी के रूप में भी किया जाता है।


जनसत्ता से साभार 


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