क्या भूलूं? सब याद ही आ रहा.. शत शत नमन सुनील दुबे जी


सुनील दुबे जी नहीं रहे.. उनके ना रहने से जुड़ी फेसबुक पर पहली पोस्ट पर नजर अपने अग्रज शंभू दयाल शुक्ला जी की वॉल पर पड़ी. पढ़ते ही स्तब्ध रह गया. हमारी पत्रकारिता के "परों" को जान दुबे जी ने ही दी.. यानी हिंदुस्तान में पूर्णकालिक पत्रकार  उन्हीं की कृपा से बना. उसके पहले प्रद्युम्न तिवारी जी ठोक पीटकर लाइन पर ला चुके थे. अमर उजाला में मानदेय पर काम मिल चुका था. यह साल था 1994. वर्ष 1996 में हिंदुस्तान लखनऊ संस्करण लांच हुआ और इसी के साथ अपनी भी लॉन्चिंग हो गई.


अपने 50 परसेंट से कम मार्क्स वाले थोड़े से सर्टिफिकेट और मार्कशीट लेकर बड़ी उम्मीद से लखनऊ हिंदुस्तान में नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गया था. वही पहली दफा छोटे कद लेकिन बड़े  मन वाले सुनील दुबे जी उसे पहली बार मिला था. चौड़ा चेहरा. मुंह में पान. मिलते ही बोले-" आ गए" चलो बैठो, अपनी बारी का इंतजार करो. बारी आने पर हिंदुस्तान टाइम्स के कार्यकारी अध्यक्ष नरेश मोहन जी के सामने पेश किया गया. ज्यादा कोई बात नहीं.. थोड़े से सवाल और ट्रेनी स्टाफ रिपोर्टर की नौकरी हाथ में. रायबरेली का लेटर बाद में मिला.


शुरू हुई हिंदुस्तान में नौकरी. याद है 7 सितंबर 1996 लखनऊ में ज्वाइन करके रायबरेली आ गया था. अखबार तो निकला 14 अक्टूबर 1996 में. पूरे जिले में घूम घूम कर पूरी टीम तैयार की. निर्देश यही था टीम बना कर लाओ. अमर उजाला में काम का अनुभव था. सो, टीम में दो एक मेंबर ऐसे भी थे जो अखबार की एजेंसी लेने को भी तैयार थे. लखनऊ सब को लेकर एक गाड़ी से पहुंचे. दुबे जी अपने चेंबर में बैठे हुए थे अंदर पहुंचे प्रणाम किया. बताया. कहा- "एजेंट को पत्रकार नहीं बनाऊंगा." सुनते ही अपनी तो हवा खिसक गई. जल्दी से बाहर निकला और पत्रकार बनने के आतुर एजेंट को यह बात छुपा जाने की बात ढंग से समझाई.


दुबे जी के साथ बहुत सी यादें हैं. आज उनके ना रहने की खबर के बाद वह सब याद आ रही है.. एक-एक करके. वह खाटी संपादक थे. गलती पर चढ़ाई ऐसी होती थी कि आज नहीं अभी के अभी नौकरी गई लेकिन बात आई और गई.. कभी किसी की नौकरी के पीछे नहीं पड़े. सबको "एवमस्तु". काम करने की पूरी आजादी. गलती की छूट कतई नहीं. रायबरेली का ब्यूरो चीफ रहते हुए उन्होंने तब के हिंदुस्तान के पॉपुलर सप्लीमेंट "अपनी खबर" में उन्नाव के रिपोर्ताज और आर्टिकल भी छापे. ऐसी आजादी कम लोग देते हैं और कम को मिलती भी है. नए साल का ग्रीटिंग वह निरंतर भेजते रहते थे अपने मातहतों को भी. एक बार उनके भेजे ग्रीटिंग मे लिखा संदेश मन में हमेशा हमेशा के लिए अंकित हो गया. उसमें लिखा था-" आप जीवन में उस जगह पहुंचे जहां हर जरूरतमंद की मदद कर सके" अपने मातहत के लिए ऐसी शुभकामना और प्रार्थना कम लोग ही करते हैं. ऐसे थे हमारे दुबे जी. क्या भूलूं? ऐसे समय में सब याद ही आ रहा है.


उनके हिंदुस्तान से हटने के बाद और लखनऊ में शिफ्ट हो जाने पर बीच-बीच में मिलता भी रहा. इधर काफी दिनों से उनके दर्शन और आशीर्वाद से वंचित रहा. चाह कर भी लखनऊ जाकर उनसे मिलना नहीं हो पाया. हालांकि एक बार बीच में यह संकल्प लेकर ही जाना हुआ के अपने सभी पूर्व अधिकारियों से आज भेंट करूंगा लेकिन उनकी बीमारी की खबर मिली और कोरोना के डर से उनके पास जाने से डर गया और आखरी दर्शन नसीब नहीं हुए. इसका जिंदगी भर अब मलाल ही रहेगा.


हिंदुस्तान में किस्सा-ए-नौकरी..


तब हिंदुस्तान हिंदुस्तान हुआ करता था. हिंदुस्तान में नौकरी वाया बड़े भाई संजीव त्रिपाठी मिली. इसका भी किस्सा बड़ा रोचक है. तब हम नए-नए अमर उजाला कानपुर में जुड़े थे. प्रद्युम्न जी ने उन्नाव में निकलने से बचा लिया था और मैं प्रादेशिक डेस्क का सबसे छोटा सिपाही बनकर काम कर क्या रहा था. सीख रहा था. डेस्क पर ही संजीव त्रिपाठी जी भी उप संपादक के रूप में काम कर रहे थे. लखनऊ से हिंदुस्तान निकलने के करीब साल भर पहले से हिंदुस्तान की चर्चा शुरू हो चुकी थी.  कानपुर अमर उजाला संस्करण के कई लोग संजीव जी से हिंदुस्तान में नौकरी के लिए अनुरोध करते थे. कभी गंभीरता पूर्वक कभी हंसी मजाक में. धीरे-धीरे इस रहस्य की परतें खुली कि हिंदुस्तान में नौकरी के लिए उनसे ही क्यों कहा जा रहा है? पता चला लखनऊ संपादक होकर आने वाले सुनील दुबे जी उनकी मौसी के लड़के हैं. 


पांचवे सवार की तरह हम भी इसी अनुनय-विनय में शामिल हो गए. कहते हैं ना! गाय गाय बिहाव हुई जात हय.. वही हमारे साथ हुआ और हिंदुस्तान में नौकरी मिल गई. हमें याद है उस समय अमर उजाला कानपुर से एक साथ करीब दर्जनभर सीनियर जूनियर लोग इंटरव्यू देने जाने वाले थे. अमर उजाला के प्रबंधकों और संपादक को यह खबर लग चुकी थी. तब हमारे जैसे सबसे जूनियर साथी को श्री राजीव सिंह जी ( तब अमर उजाला कानपुर में फ्रंट पेज इंचार्ज और अब अमर उजाला लखनऊ के संपादक) ने रात कोई 1:00 बजे घर वाले बेसिक फोन पर फोन मिलवाया. हमसे कहा गौरव तुम मत जाओ यहां तुम्हारा अच्छा करा देंगे लेकिन पिताजी और भैया ने हिंदुस्तान टाइम्स को "नेशनल ग्रुप" बताते हुए ज्वाइन करने की सलाह दी और इस तरह अपने आदरणीय राजीव सिंह जी की बात का सम्मान ना करने का अपराध हमसे हो गया और हमने हिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया. तब पहली सैलरी 35 सो रुपए थी. 6 महीने बाद कार्यालय संवाददाता के पद पर तरक्की सुनील दुबे जी की कृपा से ही हुई. तब से लेकर आज तक हिंदुस्तान का हिस्सा बना ही हुआ हूं.


आज जब सुनील दुबे जी इस दुनिया में नहीं है तब उनकी कहीं समझाई और डांट कर बताई गई हर बात याद आ रही है.. उनके डांटने में भी मां का "ममत्व" सा होता था. हिंदुस्तान के पुराने लोगों को  याद होगा  वह जब डांटते थे तो अपनी चेयर से उछल उछल पड़ते थे. लगता था कि आज तो काम से गए लेकिन उनके रहते काम से कोई कभी गया नहीं.. ऐसे सुनील दुबे जी को शत शत नमन.. 


आप जीवित रहते भी यादों में थे और शरीर छोड़ने के बाद भी हमेशा हमेशा हमारी और हमारे परिवार की यादों में रहेंगे..
🙏🙏विनम्र श्रद्धांजलि🙏🙏


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