मध्यप्रदेश उपचुनाव- कहाँ चले हाथी राजा...

 


 कहाँ चले हाथी राजा...


अब बसपा सुप्रीमो के लिए मध्यप्रदेश में इसका बदला निकालने का अच्छा अवसर है। बसपा के प्रत्याशी कांग्रेस से दलित और पिछड़े वोट को काटकर अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की ही मदद करेंगे। इस पार्टी ने दावा किया है कि वह कम से कम दस सीटों पर जीत हासिल करके सरकार में भागीदारी हासिल करेगी।



 


इस उपचुनाव  में कांग्रेस के लिए 'उफ' वाला फैक्टर बहुजन समाज पार्टी की वजह से भी है। बसपा सुप्रीमो मायावती आमतौर पर उपचुनावों में हाथ आजमाने से बचती हैं. लेकिन राज्य में उन्होंने सभी 28 सीटों पर प्रत्याशी उतारने का एलान कर दिया है। अब कुछ पीछे जाएं। राज्य में सन 2018 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कमलनाथ ने साफ कहा था कि भाजपा के खिलाफ उनका बसपा सहित समाजवादी पार्टी से पैक्ट हो चुका है। ऐसा ही हुआ भी। इसका असर यह रहा कि खासतौर से ग्वालियर-चंबल संभाग में बसपा का कमिटेड वोट कांग्रेस के हिस्से चला गया। पार्टी ने वहाँ जबरदस्त जीत हासिल की। सिंधिया का खेमा भले ही इस विजय का श्रेय अपने नेता को देता हो, किन्तु सच यह है कि सिंधिया तो लोकसभा चुनाव में खुद की ही सीट नहीं बचा पाए थे। अब परिदृश्य बदल चुका है। राजस्थान में अशोक गेहलोत ने बसपा विधायकों को तोड़कर पहले ही मायावती को झटका दिया है। अब बसपा सुप्रीमो के लिए मध्यप्रदेश में इसका बदला निकालने का अच्छा अवसर है। बसपा के प्रत्याशी कांग्रेस से दलित और पिछड़े वोट को काटकर अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की ही मदद करेंगे। इस पार्टी ने दावा किया है कि वह कम से कम दस सीटों पर जीत हासिल करके सरकार में भागीदारी हासिल करेगी। यह दावा भले ही गले न उतरे, लेकिन पार्टी की इस कोशिश ने कांग्रेस के लिए और दुविधा वाली स्थिति पैदा कर दी है। कांग्रेस की एक और परेशानी है। कमलनाथ ने पंद्रह महीने के कार्यकाल में बसपा को जितने आश्वासन दिए थे, उस अनुपात में इस पार्टी को सम्मान नहीं मिला। दूसरी बात यह भी कि इस चुनाव में वह अधिकाँश जगह कमजोर नजर आ रही है। इसलिए पार्टी चाहकर भी इस स्थिति में नहीं आ सकती कि वह बीएसपी को यह कहकर उम्मीदवार उतारने से रोक सके कि उसकी फिर सरकार बनने पर इस दल को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। ग्वालियर-चंबल संभाग में जातिगत गणित हावी है। वहां बीएसपी त्रिकोणीय संघर्ष की सूरत में जिस जातिगत वोट को अपनी तरफ खींचेगी, उस पर दो साल पहले के चुनाव में कांग्रेस ने कब्जा कर रखा था, इसलिए अब इसी दल की चुनावी संभावनाओं को बीएसपी नकरात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है। यहां यह याद दिला दें कि प्रदेश में विंध्य के बाद ग्वालियर-चंबल ही वह हिस्सा रहा, जिसने बहुजन समाज पार्टी को यहां की सियासत में आगे बढ़ने के भरपर मौके प्रदान किये थे।


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