नए पत्रकारों को गढ़ने कढने वाले श्रद्धेय सुनील दुबे जी की यादें

नए पत्रकारों को गढ़ने कढने वाले श्रद्धेय सुनील दुबे जी की यादें



स्वर्गीय श्रद्धेय सुनील दुबे जी नए पत्रकारों को गढ़ने कढने में बहुत माहिर थे। राष्ट्रीय सहारा लखनऊ की नींव उन्हीं के संपादकत्व में रखी गई। हिंदुस्तान पटना व लखनऊ को भी उन्होंने ही शुरू कराया और स्थापित किया। यह मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे राष्ट्रीय सहारा लखनऊ में उनके साथ काम करने का मौका मिला। दुबे जी छोटी सी छोटी खबरों पर बारीकी से नजर रखते थे व रचनात्मक सामाजिक सरोकार वाले समाचारों को प्राथमिकता देते थे। खबरें छूटने व प्रतिद्वंदी अखबारों से तथ्यों में कमजोर पड़ने पर उनकी डांट भी पड़ती थी। अगले दिन कोई खबर अच्छी साबित होने पर पीठ थपथपा कर वह प्रोत्साहित भी खूब करते थे। वे खुलकर तथ्यपरक स्टोरी लिखने को प्रोत्साहित करते व मौका आने पर बचाव में रिपोर्टर के पीठ के पीछे खड़े होते थे
मुझे याद है लंबे समय तक विधानसभा के समक्ष धरना देने का रिकॉर्ड बनाने वाली कटोरी देवी को लेकर मैंने लिखा था कि ' महात्मा गांधी का हथियार फेल, कटोरी निस्सहाय'। इसकी उन्होंने खूब प्रशंसा की थी। इसके बाद इस मामले ने तूल पकड़ा। अंततः इसके कुछ समय बाद जाकर कटोरी न्याय पा सकी।
एक और वाक़िए को मैं कभी नहीं भूला सकता। लखनऊ के एक नामचीन होटल के श्रमिक आंदोलनरत होकर होटल के बाहर धरने पर बैठ गए। मैंने इस घटनाक्रम की रिपोर्टिंग की। होटल मालिकों की तरफ से एक तरफा रिपोर्टिंग की शिकायत सीधे अखबार के मालिक श्री सुब्रत राय जी तक पहुंची। उन्होंने सुनील दुबे जी से इस बाबत रिपोर्ट तलब किया। दुबे जी ने मुझसे कहा, बच्चू गड़बड़ तो नहीं लिखे हो। तथ्य मजबूत कर लो। मीटिंग में सहाराश्री इस बाबत पूछताछ कर सकते हैं। मैंने सारे तथ्य व संबंधित खबरों की कटिंग्स एकत्रित कर लिए।
इसके बाद सहाराश्री जी ने एक खुली मीटिंग में अखबार को लेकर तमाम मुद्दों पर चर्चाएं की। सहाराश्री ने उक्त खबरों का भी जिक्र किया व पूछा कि किसने लिखा है। मैंने तुरंत उठ कर जवाब दिया सर मैंने। उन्होंने एक तरफा खबर लिखे जाने की शिकायत मिलने की बात कही। मैंने कहा नहीं सर होटल प्रबंधन का भी पूरा पक्ष रखा गया है। सहाराश्री ने संबंधित खबरें दिखाने की बात कही। मेरा जवाब था, सर आप वार्तालाप जारी रखें, मैं अभी लाकर कटिंग्स पेश करता हूं। इस जवाब पर हाल में बैठे संपादक जी सहित सभी संपादकीय और रिपोर्टिंग कर्मी भौंचक रह गये। संपादक सुनील दुबे जी ने इस पर तुरंत उठकर मोर्चा संभाला व सहाराश्री से कहा कि कोई दुर्भावना वाली बात नहीं है। बिहारी बाबू हैं इनका स्टाइल ही यही है। अभी यह सब कुछ सामने रखेगा।
सहाराश्री ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अभी  प्रभाकर मिश्र जी (तत्कालीन उप संपादक जनरल डेस्क) से बात हो रही थी। उन्होंने राप्ती का पानी पिया है (प्रभाकर जी के गोरखपुर के निवासी होने के नाते), लगता है आपने गंगा का पानी पिया है। मेरा जवाब था नहीं सर मैंने हैंडपंप का पानी पिया है गंगा मेरे घर से बहुत दूर है। मैंने वार्तालाप जारी रखने की बात यह सोचकर कही थी कि मीटिंग डिस्टर्ब न हो।
खैर हाल से निकल ऊपर के मंज़िल पर स्थित रिपोर्टिंग कक्ष से खबरों की कटिंग लेकर मैं सहाराश्री जी के पास पहुंचा। उन्होंने खबरें देखी। संतोष जताया व कहा कि ठीक है। खबर लिखते समय यह जानकर लिखना चाहिए कि जिसके बारे में लिखा जा रहा है वह सामने बैठा है व कभी भी जवाब जवाब तलब कर सकता है। खैर बात आई गई हो गई।
सुनील जी के सानिध्य में मुझे पत्रकारिता का ककहरा सीखने को मिला। राष्ट्रीय सहारा लखनऊ के स्थापित होने के बाद मुझे सन 2007 में राष्ट्रीय सहारा कानपुर की शुरुआत पर कानपुर भेजा गया। फिर समय की व्यस्तता। सुनील दुबे जी के कानपुर के होने के बाद भी उनसे मुलाकात नहीं हो सकी, क्योंकि वह लखनऊ में रहते थे और मेरा केवल साप्ताहिक अवकाश में सप्ताह में 1 दिन लखनऊ आना होता था।
श्रद्धेय सुनील दुबे जी के निधन से बहुत दुखी हूं। संयोगवश शुक्रवार को अवकाश पर होने के चलते लखनऊ में ही था। रहा नहीं गया। दोपहर में विकास नगर स्थित उनके आवास पर पहुंचा। तब तक शव सहारा हॉस्पिटल से नहीं आया था। आवास पर स्वर्गीय दुबे जी के छोटे भाई सुशील दुबे जी से भेंट हुई। पत्रकारों में श्री दिनेश पाठक जी, शोभित मिश्रा जी, श्री विनय मिश्रा जी, कानपुर  के श्री आशुतोष शुक्ला जी शोकाकुल माहौल में आवास पर मिलें। हम सभी ने दुबे जी को लेकर पुरानी यादें ताजा की, जो अब केवल यादें ही रह गई हैं। शव को दाह संस्कार के लिए बैकुंठ धाम (भैसा कुंड) ले जाया गया और इसी के साथ वे पंचतत्व में विलीन हो गए।


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