नवरात्र की शुभ तिथियों में नारी शक्ति पर आधारित ’’लोक कला शैली में शाक्त परम्परा’’ विषय पर आॅनलाइन वर्चुअल प्रर्दशनी का आयोजन

लखनऊ 18 अक्टूबर, 2020
 
ज्ञान के वातायन के रूप में संरक्षित लोक कला संग्रहालय द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की श्रृंखला में आज दिनाॅक 18 अक्टूबर, 2020 को नवरात्र की शुभ तिथियों में नारी शक्ति पर आधारित ’’लोक कला शैली में शाक्त परम्परा’’ विषय पर आॅनलाइन वर्चुअल प्रर्दशनी का आयोजन फेसबुक, यूट्यूब, सोशल मीडिया माध्यम से कराया गया, जिसमें नारी देवी के विभिन्न स्वरूपों यथा- मातृत्व, हरछठ, सावित्री, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली, कन्या पूजन, हवन आदि के रूप में जानी जाती है के चित्राकंन प्रदर्शित किए गये है। जो नारी शक्ति की महत्ता एवं पवित्रता का परिचायक है। नारी ईश्वर की जन्मात्री भी मानी गयी है। यह जानकारी डाॅ0 मीनाक्षी खेमका, प्रभारी अध्यक्ष संग्रहालय ने दी। उन्होंने बताया कि जहाॅ नारी का सम्मान होता है, वहीं ईश्वर विराजमान होते है।
यस्य पूज्यते नार्यस्तु, तत्र रमन्ते देवताः ।।
इस प्रदर्शनी के माध्यम से ये बताने का प्रयास किया गया है कि माॅ दुर्गा कन्याओं में वास करती है तथा वे उन्हीं का रूप हेै जो कि सर्वव्याप्त है। कन्या पूजन की परम्परा घर-घर व्याप्त है परन्तु जहाॅ एक ओर कन्या की पूजा एवं अराधना की जा रही है वहीं दूसरी ओर आज के समाज में उनके साथ विभिन्न प्रकार के अत्याचार भी हो रहे हंै। अतः आज के युवा समाज को यह समझना होगा कि नारी कन्या है, पूजित है तो वह शक्ति स्वरूपा भी है तथा नारी है तो सम्मान है, जीवन है।ं यह प्रदर्शनी बुराई पर अच्छाई की विजय का सूचक है। ये विचार डा0 मीनाक्षी खेमका प्रभारी अध्यक्ष संग्राहलय लोक कला संग्रहालय ने व्यक्त किये।                                            
इसके अतिरिक्त पद्मश्री डा0 योगेश प्रवीन ने लोक चित्राकंन के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि संसार की सुन्दरतम् पेंन्टिंग में भी अधिक प्राणवान परम्परा हमारी लोक कला चित्राकंन की है। अवध की शाक्त पूजा परम्परा के अन्तर्गत, शीतलाष्टमी की थापें हरछठ माता का भितिचित्रि ,करवाचैथ का गौरी बाग़ तथा कोहबर की मैहर मइया के लोक चित्राकंन सदियों से रीति रिवाजों में चल आ रहे है। उŸार मध्य अवध में भी एक आयताकार में सूरज, चन्द्रमा, तुलसी, मछली, गंगा-जमुना नाव, मंदिर चैक आदि मंगल चिन्हों के साथ-साथ सिया-सियाऊ का चित्रण है।
डाॅ0 खेमका ने बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों में देवी पूजन की परम्परा प्रचीन काल से ही पूरे भारत वर्ष में चली आ रही है। जो कि नारी सुरक्षा, नारी सम्मान एवं नारी शक्ति का प्रतीक है चाहे वह मातृका स्वरूपा हो, दुर्गा हो या काली। मातृ पूजा के त्योहार नवरात्रि है जो शुभ कल्याण की मंगल कामना के साथ कलश रूपी धरा के रूप में घर-घर में स्थापित होती है। ये उत्पादकता का सूचक है।
सर्व मंगल मांगलेय शिवे सर्वार्थ साधिके
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुतें।
    उन्होंने बताया कि प्रदर्शित चित्रों में लोक कलाकारों द्वारा निर्मित वर्तमान समय में प्रचलित दुर्गा के विभिन्न शैलियों में बनाये गये चित्रांकन एवं मूर्तिशिल्प प्रस्तुत किये गये है। नवमी के दिन हवन के साथ सिन्दूर खेल होता है तथा दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है। यह भी प्रतीकात्मक ज्यामितीय शैली में प्रदर्शित है।
 उन्होने बताया कि अनादि काल से ही मानव निरंतर ही टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं, ज्यामितीय, रूपाकारों, बिन्दुओं, हस्त थापों आदि द्वारा तीज-त्यौहारों एवं अन्य मांगलिक अवसरों पर अपनी अनुभूतियों की भावाभिव्यक्ति बहुत ही सहज एवं सरल रूपों में करता आ रहा है। मांगलिक अवसरों पर बनायें गये ये चित्र चटकदार रंगों में शुभ के प्रतीकों को बांधे रहते है, जिसकी अपनी आध्यात्मिक प्रधानता है। संग्रहालय द्वारा लोक जनमानस की कलाकृतियों पर आयोजित आॅनलाइन वर्चुअल प्रदर्शनी अत्यन्त ज्ञानवर्धक एवं उत्साहवर्धक है जिसके द्वारा नारी सुरक्षा एवं सशक्तिकरण का संदेश जन सामान्य में वैश्विक परिदृश्य में देने का प्रयास किया गया है। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में समस्त लोक कला संग्रहालय, परिवार का योगदान प्रदान किया गया।


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