राजा शिबि की कहानी

राजा शिबि की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक बार जब वे दरबार में बैठे थे,
तो एक कबूतर उनकी गोद में आकर छिप गया। उसका पीछा एक भूखा गरुड़ कर रहा
था। गरुड़ ने भी राजा से कहा कि वह कबूतर को उसे सौंप दे; पर शिबि
शरणागतों के रक्षक थे। उन्होंने मना कर दिया। अंत में यह सहमति हुई कि
राजा कबूतर के भार के बराबर अपना मांस गरुड़ को दे दें।
दरबार में ही तराजू मंगाया गया। एक पलड़े पर कबूतर और दूसरे पर राजा अपने
शरीर के टुकड़े रखते गये; पर कबूतर का पलड़ा नीचे ही रहा। अंततः शिबि
स्वयं दूसरे पलड़े पर बैठ गये। ऐसा होते ही भगवान भोलेनाथ प्रकट हो गये,
जो राजा के शरणागत रक्षा वाले वचन की परीक्षा ले रहे थे। राजा ने
सत्याग्रह के माध्यम से अपने वचन को सत्य सिद्ध कर दिखाया।
भारतीय इतिहास में ऐसे एक नहीं, हजारों उदाहरण हैं। ‘‘रघुकुल रीत सदा चली
आई, प्राण जांहि पर वचन न जाई’’ भी तो सत्य और अपने वचन पर आग्रह का ही
उद्घोष करता है। राजा दशरथ चाहते, तो कैकेयी को दुत्कार सकते थे। पूरा
राज्य राजा के साथ था; पर राजा ने अपने वचन का पालन किया। और श्रीराम ने
तो पिता के आदेश की प्रतीक्षा भी नहीं की। वे वचन की बात सुनते ही वन को
चल दिये। भरत भी 14 वर्ष तक उनकी पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर व्रत-उपवास
के साथ जीवन बिताते रहे। शत्रु का सगा भाई होते हुए भी शरणागत वत्सल
श्रीराम ने विभीषण को अभयदान दिया। यह सत्याग्रह नहीं, तो और क्या है ?
बालक धु्रव और प्रह्लाद, सीता, सावित्री, द्रौपदी और राजा हरिश्चंद्र आदि
की कथाएं भी सत्याग्रह का अनुपम उदाहरण हैं।
भीष्म की प्रतिज्ञा और उसके पालन के लिए अस्त्र-शस्त्रों का त्याग,
अभिमन्यु की वीरगति का समाचार पाकर अर्जुन की प्रतिज्ञा और उसके पूरा न
होने पर चितारोहण की तैयारी, श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल की 100 गालियों को
सहन करना, कर्ण द्वारा सब जानते हुए भी कवच और कुंडलों का त्याग,
द्रोणाचार्य द्वारा अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठा समाचार सुनकर शस्त्र
त्याग.. आदि सत्याग्रह के ही तो उदाहरण हैं। फिर भी न जाने क्यों
सत्याग्रह का प्रणेता गांधी बाबा को बता दिया जाता है।
रामायण और महाभारत काल को सत्य मानने से जिनके पेट में दर्द होता हो, वे
मुगल हमलों के काल को तो मानते ही होंगे, जब इस सत्याग्रह ने कई बार
‘सद्गुणविकृति’ का रूप भी लिया है। राजा पृथ्वीराज चैहान ने 16 बार
मौहम्मद गौरी को क्षमा किया। राजा हम्मीर ने अलाउद्दीन खिलजी के भगोड़े
सैनिक मुहम्मदशाह को अभयदान दिया। परिणाम दोनों बार इनके और देश के
विरुद्ध गये। मुगल काल में वीर हकीकत, गुरू तेगबहादुर, भाई मतिदास,
सतिदास और दयाला, बन्दा बैरागी, जोरावर और फतेह सिंह आदि के बलिदान भी तो
सत्याग्रह ही हैं। यदि वे मुसलमान बन जाते, तो अपार धन सम्पदा और सुख
सुविधाएं पा सकते थे; पर उन्होंने सत्य का आग्रह नहीं छोड़ा और मृत्यु का
वरण किया। हजारों हिन्दू वीर माताओं और बहिनों का जौहर भी तो सत्याग्रह
ही है।
थोड़ा और आगे चलें। जिला सुरेन्द्र नगर, गुजरात के मुली कस्बे में गत 600
वर्ष से तीतर की रक्षा हित हुए युद्ध की याद में एक मेला होता है। सिंध
के निवासी सोधा परमार जाति के लोग 1474 ई0 में मुली गांव में आकर बसे। एक
बार सूर्य देवता के प्रतीक मंडावरै जी की प्रतिमा के पीछे एक घायल तीतर
छिप गया। उसे ढूंढते हुए चाबड़ जाति के शिकारी आये; पर परमारों के मुखिया
लखबीर जी की मां जोमबाई ने शरणागत को वापस करने से मना कर दिया। इस बात
पर हुए युद्ध में लखबीर के छोटे भाई मंुजोजी सहित 200 परमार तथा 400
चाबड़ योद्धा मारे गये। क्या यह सत्याग्रह नहीं था ?
5 सितम्बर, 1730 (भादों शुक्ल दशमी, वि0संवत 1787) को अलवर के पास ग्राम
खेजड़ली में हरे पेड़ों की रक्षा के करते हुए इमरती देवी के नेतृत्व में
363 स्त्री-पुरुषों और बच्चों द्वारा 27 दिन तक लगातार चलाये गये बलिदान
पर्व को क्या कहेंगे ? 28 वें दिन राजा को स्वयं वहां आकर इन पर्यावरण
प्रेमियों के सम्मुख अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांगनी पड़ी। आज भी उस
घटना की स्मृति में वहां विशाल मेला होता है। अंग्रेजी तोपों के आगे खड़े
होने वाले कूकाओं और हंसते हुए फांसी का फन्दा चूमने वाले भगतसिंह आदि
क्रांतिवीरों के सत्याग्रह के आगे गांधीवादियों का सत्याग्रह कुछ नहीं
बेचता।
ऐसे प्रसंग भारत के चप्पे-चप्पे पर बिखरे हैं। वस्तुतः गांधी जी ने इनसे
प्रेरणा लेकर सत्याग्रह को अंग्रेजों के विरुद्ध एक युगानुकूल शस्त्र का
रूप दिया, जिससे स्वाधीनता आंदोलन को भरपूर लाभ हुआ। गांधी जी के मन पर
बचपन में अपनी मां से सुनी श्रीराम, श्रीकृष्ण, ध्रुव, प्रह्लाद, गौतम
बुद्ध, महावीर स्वामी, अभिमन्यु आदि की उन कहानियों का बहुत प्रभाव था,
जिनमें बार-बार सत्य और अपने वचन पर आग्रह की बात आती है। इससे ही गांधी
जी के मन में सत्याग्रह की भूमिका बनी होगी।
गांधी जी निःसंदेह सत्य के आग्रही थे; पर उन्हें सत्याग्रह का प्रणेता
बताकर भारत की लाखों वर्षों की परम्परा पर धूल डालना निरा दुराग्रह है।
ऐसे लोगों के लिए भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा है - सबसे भले हैं मूढ़,
जिन्हें न व्यापै जगत गति।।
भगवान इन मूढ़ों से भारत की रक्षा करें। हे राम।


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