रामराज्य से पहले राम तत्व जरुरी...........

अपना तो देश खराब है.....इस देश का कुछ नहीं हो सकता.....विदेश में देखो क्या हाल है......इन सारी बातों को खास मौके पर एक बार फिर याद करें। मौका स्वतंत्रता दिवस का है। अपने देश प्रदेश में फैली गंदगी बदहाल बिजली करप्शन और बिगडते हालात को हम सबने कभी ना कभी कोसा होगा....पर क्या यही एक नज़रिया है। कभी इस नजरिये से देखा है कि हम क्या कर रहे हैं। पालीथीन क्यों नदियों में फेंकते हैं... पालीथीन इधर उधर बिना सोचे फेंक देते हैं ये सोचे बिना कि नालियों को चोक करने के लिये ये पालीथीन सबसे बडे कारण है...इनसे ही जल भराव होता। जल भराव होने से हम सरकारों को कोसते हैं पर पालीथीन ना फेंकने की छोटी सी जिम्मेदारी नहीं उठा सकते।


 हम कुछ इंच के लिये अपने घर को बढवा कर या फिर दुकान की चीजों को दुकान के बाहर रखकर अतिक्रमण करते हैं और जाम होने पर सरकार को कोसते हैं....सबसे पहले काम कराने के लिये पैसे देते हैं फिर भ्रष्टाचार को कोसते हैं....... एक कदम बढकर कूडाघऱ पर कूडा फेकने या फिर कूडेदान तक कूडा फेकने की जहमत नहीं करते और फिर गंदगी को रोते हैं। पानी और बिजली बर्बाद करते हैं फिर इनकी कमी पर जगमगाते विदेश को देखकर ललचाते हैं।


हम बिजली पानी सड़क सबके लिए सिर्फ सरकार, सिर्फ सरकार की रट लगाते हैं। क्यों देश सरकार नहीं लोग चलाते है। बल्कि देश चलाते नहीं देश बनाते है। देश सिर्फ भुगोल, एटलस और सरहदों से नहीं बनता है। देश बनता है लोगों से। लोगों की भावनाओँ से। राष्ट्रभक्ति से। राष्ट्रभक्ति अवसरों की मोहताज नहीं होती। सिर्फ तिरंगा फहराने, कार के डंडों पर डैशबोर्ड पर तिरंगा लगाने की बानगी भी नहीं है। सिर्फ क्रिकेट मैच तक सीमित नहीं है। देशभक्ति भावना है। देश पहले है हम बाद में। लेकिन हमारे साथ समस्या ये भी है कि सबसे पहले हम। मंदिर में पूजा करने से लेकर पिक्चर के टिकट तक लाइन तोडने के लिए हम पैसे देने से हिचकना भी भूल गये हैं। फिर कहते हैं सिस्टम खराब है।


बात यह भी नहीं कि लोग ही खराब है सिस्टम परफेक्ट। पर परफेक्ट तो कोई भी सिस्टम नहीं है। जिस अमरीका के सिस्टम को ज्यादातर हम आदर्श बताते नहीं थकते वहां पर भ्रष्टाचार, हत्या बलात्कार, भ्रष्ट नेता, शिक्षा व्यवस्था की व्यापक गड़बडियां और रंगभेद जैसी समस्या है तो ब्रिटेन में संप्रदायवाद, पंथवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी से जूझ रहा है। दरअसल वैश्विक व्यवस्था में समाज के साथ अब समस्याएं भी सरहदों की पाबंद नहीं है। रामराज्य तो कहीं नहीं हो सकता पर उनकी दुहाई देने वाले हम अपने अंदर कितना राम ला पाते हैं। राम बनने के लिए भगवान बनना जरुरी नहीं रामत्व का तत्व ही पर्याप्त है। ईमानदारी, गलत ना करना ना बर्दाश्त करना जैसे तत्व ही रामत्व की तरफ बढने वाले कदम हैं।   


हमने हमेशा मौलिक अधिकारों की बात जरुर की पर मौलिक कर्तव्यों को शतप्रतिशत मानना इसलिए जरुरी नहीं समझा क्योंकि उनके पालन ना करने से हमें सजा नहीं हो सकती। नागरिक इन कर्तव्यों का पालन करने के लिए संविधान द्वारा नैतिक रूप से बाध्य हैं। हालांकि, निदेशक सिद्धांतों की तरह, ये भी न्यायोचित नहीं हैं, उल्लंघन या अनुपालना न होने पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकती।सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक कर्तव्यों का प्रयोग मौलिक कर्तव्यों मे दिए गए उद्देश्यों को प्रोत्साहित करने वाले कानूनों की संवैधानिक वैधता बनाए रखने के लिए किया है। इन कर्तव्यों को सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य ठहराया गया है, बशर्ते राज्य द्वारा उनका प्रवर्तन एक वैध कानून के द्वारा किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने एक नागरिक को अपने कर्तव्य के उचित पालन के लिए प्रभावी और सक्षम बनाने हेतु प्रावधान करने की दृष्टि से राज्य को इस संबंध में निदेश जारी किए हैं। नागरिकों के मौलिक कर्तव्य 1976 में सरकार द्वारा गठित स्वर्णसिंह समिति की सिफारिशों पर, 42वें संशोधन द्वारा संविधान में जोड़े गए थे। मूल रूप से संख्या में दस, मौलिक कर्तव्यों की संख्या 2002 में 86वें संशोधन द्वारा ग्यारह तक बढ़ाई गई थी, जिसमें प्रत्येक माता-पिता या अभिभावक को यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य सौंपा गया कि उनके छः से चौदह वर्ष तक के बच्चे या वार्ड को शिक्षा का अवसर प्रदान कर दिया गया है। अन्य मौलिक कर्तव्य नागरिकों को कर्तव्यबद्ध करते हैं कि संविधान सहित भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों का समेमान करें, इसकी  विरासत को संजोएं, इसकी मिश्रित संस्कृति का संरक्षण करें तथा इसकी  सुरक्षा में सहायता दें। वे सभी भारतीयों को सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने, पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करने, वैज्ञानिक सोच का विकास करने, हिंसा को त्यागने और जीवन के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करने के कर्तव्य भी सौंपते हैं।


राष्ट्रीय स्मारकों पर लिखे हमारे आपके नाम, प्यार का इजहार, आने की तारीख का गोदना इस बात की गवाही दे रहा है कि हम अपनी विरासत के प्रति कितने सजग हैं। विदेशो में जाकर उनकी विरासत से अभिभूत क्या हमने कभी सोचा कि इस तरह की शिल्पकारी से हम क्या करने जा रहे है। क्या हमने कभी ये सोचा कि हमारे मन वचन कर्म से हम भाईचारे, सार्वजनिक सम्पत्ति हिंसा ना करने और उत्कृष्ठता की तरफ क्या योगदान कर रहे हैं। हम मानते हैं कि देश में शोध नही हो रहे। पर क्या हमने कभी पढ़ते समय सिर्फ डिग्री और नौकरी से आगे का सोचा। इसी तरह हमने पानी की किल्लत को कोसा तो बहुत है पर क्या कभी सड़क पर बहते हुए नल को दो मिनट रुककर बंद करने की कोशिश की। लाइट की कमी को हम हमेशा हाय तौबा करते हैं पर पूरे घर की लाइट जलाने को लेकर हमारे तर्क होते हैं कि हम बिजली का बिल चुका रहे है। जरुर चुका रहे हैं पर क्या ये बिजली सिर्फ हमारी है देश की नहीं। क्या अगर साल भर में हमने कुछ हजार यूनिट बचा लिए तो ये देश प्रदेश की बिजली के लिए हमारा योगदान नहीं होगा। दरअसल उपभोक्तावाद और पैसे से सबकुछ खरीदने की ताकत ने गांव के कुएं को मारा, तालाबों को सुखा दिया यानी सार्वजनिक और सामाजिक दायित्व का दायरा अपार्टमेंट के अपने फ्लैट तक सीमित कर दिया। यहां पर इस तर्क का कदापि मतलब नहीं कि क्या अच्छा था क्या होना चाहिए पर सवाल यह है कि हम कब मैं और मेरी से बढकर हम, हमारा देश की भावना की तरफ चलेंगे।  


क्या सबकुछ ठीक करने का ठीकरा सरकार के सर फोडते समय हम ये भी एक मिनट सोचते हैं कि हमने जो किया वो कितना गलत था। या फिर हम जो करे वो सही के नशे में देश और सिस्टम को कोसते रहे....आजादी मुबारक तब हो जब एक बुरी आदत को छोडने की कसम खायें।



अनुराग शुक्ला


(लेखक टीवी पत्रकार हैं )


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