सरदार वल्लभ भाई पटेल जिनकी रगों में कर्तव्यनिष्ठा और सर्मपण का भाव निहित था


 


      ‘‘यह हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह यह अनुभव करे कि उसका देश स्वतंत्र है और उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। हर एक भारतीय को अब यह भूल जाना चाहिए कि वह एक राजपूत है, एक सिख या जाट है। उसे याद रहना चाहिए कि वह एक भारतीय है और उसे इस देश में हर अधिकार हैं पर कुछ जिम्मेदारियां भी हैं।.....कर्तव्यनिष्ठ पुरुष कभी निराश नहीं होता। अत: जब तक हम जीवित रहें और कर्तव्य करते रहें तो इसमें पूरा आनंद है।’’  सरदार वल्लभ भाई पटेल जब यह कह रहे होते थे तब उनकी आंखों में एक ऐसे भारत का सपना रचा-बसा था, जिसमें सामाजिक विकास और सामाजिक समरसता का हर लक्ष्य पूरा होता दिखता था। वे इस बात को बखूबी समझते थे कि यदि भारत के नागरिकों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक कर दिया जाए तो वे अपने देश को विकसित राष्ट्रों के समकक्ष लाने में तनिक भी देर नहीं लगाएंगे।


 


      सरदार पटेल अपने देश के नागरिकों को जैसा बनाना चाहते थे, वैसा बनकर स्वयं प्रस्तुत भी होते रहते थे। कथनी और करनी में किसी तरह का भेद रखना उनके आचार-व्यवहार में शामिल नहीं था। कर्तव्य को बरतने का अदम्य साहस और समर्पण का भाव उनकी रगों में प्रारम्भ से ही था। इस बात का आभास इस घटना से लगाया जा सकता है, जब 11 जनवरी 1909 में कोर्ट में एक मुकदमे की जिरह में शामिल थे, तभी उन्हें उनकी पत्नी की मृत्यु का तार मिला। उन्होंने बड़े ही शांत और सहज भाव से उसे पढ़ा। क्षण भर के लिए मौन हुए और फिर जिरह शुरू कर दी। दो घण्टे चली बहस के बाद वे मुकदमा जीत गए। बाद में जब जज को पता चला कि सरदार पटेल की पत्नी का निधन हो गया तो वे उनके पास गए और पूछा कि आप इतनी बड़ी दुख की खबर पाकर तनिक भी विचलित हुए बिना कैसे जिरह में शामिल रहे। सरदार साहब ने बस इतना ही कहा कि ‘उस समय भी मैं किसी को न्याय दिलाने के लिए अपना कर्तव्य निभा रहा था।’ इस तरह की कर्तव्यपरायणता और जिम्मेदारी को इमानदारी से निभाना सरदार पटेल का अनुसरण करके सीखा जा सकता है। 


 


      आज जब हम सब कोरोना महामारी के इस समय में जूझ रहे हैं तब सरदार पटेल के इन्हीं आदर्शों के साथ हमारे साथ हैं। बात 1917 की है, जब अहमदाबाद प्लेग महामारी की चपेट में आ गया था। सब कुछ बंद हो गया था और लोग शहर छोडक़र भाग रहे थे। तब की ब्रिटिश सरकार असहाय सी हो गई थी। महात्मा गांधी से प्रभावित हो चुके सरदार ने तय किया कि वे अहमदाबाद में डटे रहेंगे और लोगों की सेवा करेंगे। और, उन्होंने किया भी ऐसा ही। वे अहमदाबाद की गलियों में गए, सफाई करवाई, दवा का छिडक़ाव कराया। वे जब यह सब कर रहे थे तो महामारी की चपेट में आ जाने के भय से घरों में दुबके हुए थे। लोग जब उनसे उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा की बात करते तो वे खामोश रहते और अपने काम में लगे रहते। इसी तरह की उनकी कर्तव्यनिष्ठा तब दिखी जब खेड़ा में किसानों के आंदोलन की कमान उन्होंने सम्भाली। कई बार वह कह देते कि ‘जीवन की डोर तो ईश्वर के हाथ में है, इसलिए चिंता की कोई बात हो ही नहीं सकती।’ सच तो यह है कि सरदार पटेल ने अपने जीवन को देश के लिए समर्पित करके बिना किसी स्वार्थ के अपने देशवासियों के लिए काम करते रहे।


 


      सरदार पटेल सही अर्थों में अपने देशवासियों को बनाने और मांजने में योगदान दे रहे थे। वे अपने कथनों और कार्यों से लोगों को यह बताना-जताना चाहते थे कि तमाम दुरूहताओं से बिना घबराए देश, समाज और अपने परिवार के लिए कैसे जिया जा सकता है। वे कहा करते थे कि ‘बेशक कर्म पूजा है किन्तु हास्य जीवन है। जो कोई भी अपना जीवन बहुत गंभी रता से लेता है, उसे तुच्छ जीवन जीवन के लिए तैयार रहना चाहिए। जो कोई भी सुख-दुख का समान रूप से स्वागत करता है, वास्तव में वही सबसे अच्छी तरह से जीता है।’ आज की आपाधापी के बीच उनके ये अनमोल वचन हमें बहुत राहत देते हुए से मिलते हैं।


 


      सरदार पटेल ने बचपन में ही अपनी आंख के निकट हुए फोड़े को गर्म लोहे से भेदकर फोड़ दिया था और इसी के साथ स्वयं के  लौह पुरुष बनने का आभास दे दिया था। वे कहा करते थे कि ‘काम करने में तो मजा ही तब आता है, जब उसमें मुसीबत होती है। मुसीबत में काम करना बहादुरों का काम है, कायर तो मुसीबतों से डरते हैं। लेकिन, हम कायर नहीं हैं, हमें मुसीबतों से डरना नहीं चाहिए।’अपने इन्हीं विचारों के कारण वे अपने समय के एक सफल नेतृत्वकर्ता बने। यह अनायास नहीं था कि 1928 में गुजरात के बारडोली सत्याग्रह में किसानों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत को सबक सिखाने में वे सफल रहे। इसी आंदोलन के बाद सत्याग्रह में शामिल महिलाओं ने वल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि दी और फिर पूरे देश ने उन्हें अपना सरदार माना। वे आजीवन अपनी इस पदवी के अर्थ को चरितार्थ करते रहे और इसकी की शान बढ़ाते रहे। महात्मा गांधी भी उन्हें ‘मेरा सरदार’ कहकर पुकारते थे। वे सरदार साहब की सोच-समझ पर पूरा विश्वास रखते थे। 


 


      हम सब जानते हैं कि सरदार पटेल ने कर्तव्यनिष्ठा और देश की एकता के प्रति सर्मपण भाव के साथ सक्रियता न दिखाई होती तो भारत माता का वर्तमान स्वरूप दुर्लभ ही होता। ये सरदार साहब थे, जो अथक परिश्रम करके देश को जोडऩे में लगे थे। हैदराबाद हो या फिर जूनागढ़। त्रावणकोर हा या फिर लक्षद्वीप। लौह पुरष सरदार पटेल ने सभी को अपना लोहा मनवाया और भारत का हिस्सा बना लिया। स्वतंत्रता के बाद वे प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदार थे, लेकिन महात्मा गांधी की इच्छा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पण्डित नेहरू को प्रधानमंत्री बनने दिया। वे देश के पहले गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री बने। देश को लेकर उनके पास सार्थक सपने थे, जो जमीनी हकीकत से रू-ब-रू होकर बुने गए थे। वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी उन्हीं सपनों को आकार देने का काम कर रहे हैं। यह किसी से नहीं छिपा है कि सरदार पटेल पं. नेहरू की कश्मीर नीति से कतई सहमत नहीं थे। सरदार की बात मानी गई होती तो कश्मीर के विकास की दशा-दिशा ही कुछ और होती। अब जब जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 से आजादी देकर वर्तमान केन्द्र सरकार ने उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है, तब सरदार के सपनों को पूरा करने का अवसर है और देश इस दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है।


 


      वैश्विक महामारी के इस समय में सरदार साहब के जीवन को बार-बार दोहराना जरूरी लगता है। यह समय अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाने और देश के लिए अत्यंत समर्पण भाव से काम करने का है। सरदार साहब का जीवन और उनकी कही बातें हमें पग-पग पर सम्बल दे सकती हैं और लगातार आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित कर सकती है।


 


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(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे प्राध्यापक है । लेख मे व्यक्त विचार उनके निजी है)


 


 


 


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