आज़ादी और साझी विरासत के मसीहा : मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद

"हज़ारो साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है,

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।"


 

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद इस्लाम धर्म के प्रसिद्ध विद्वान, देशभक्त, सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जज़्बा रखने वाले  महत्वपूर्ण शख्सियत थे। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रगण्य नेता होने के साथ ही बहुभाषाविद्  अरबी,फ़ारसी, उर्दू व अंग्रेजी के जानकार और  कवि भी थे।  इन्हें लोग क़लम के सिपाही के नाम से भी जानते हैं। वर्ष 1923 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने तथा आज़ादी के बाद  भारत  के पहले शिक्षा मंत्री बने। उनका जन्मदिन 11 नवंबर "राष्ट्रीय शिक्षा दिवस" के रूप में मनाया जाता है।

 

मौलाना सैयद अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन  आजाद को पूरी दुनिया मौलाना आज़ाद के नाम से जानती है। मौलाना आज़ाद का जन्म 11 नवंबर, 1888 को मक्का में हुआ था। उनकी माता एक अरब महिला थीं और पिता मौलाना ख़ैरुद्दीन एक बंगाली मुसलमान थे।  जो कलकत्ता के सबसे काबिले एहतराम आलिम थे । आपकी शादी मक्का की एक खातून के साथ हुई थी और मौलाना खैरुद्दीन के मक्का में रहने के दौरान ही मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का जन्म हुआ। इस तरह अरबी इनकी मातृभाषा थी और मौलाना को इस पर महारत हासिल थी।

 

 मौलाना आज़ाद ने अपने परिवार की संस्कृति के मुताबिक पारम्परिक इस्लामी शिक्षा हासिल की। पहले उनको घर पर पढ़ाया गया और बाद में उनके पिता ने पढ़ाया। फिर उनके लिए शिक्षक रखे गए। आज़ाद का संबंध एक धार्मिक परिवार से था इसलिए शुरुआत में उन्होंने इस्लामी विषयों का ही अध्ययन किया, और इसके साथ ही पश्चिमी दर्शनशास्त्र, इतिहास और समकालीन राजनीति का भी अध्य्यन किया और अफगानिस्तान, इराक , मिस्र, सीरिया और तुर्की जैसे देशों का सफ़र किया।

 अपने छात्र जीवन में ही मौलाना आज़ाद ने एक पुस्तकालय चलाना शुरू कर दिया साथ ही एक 'डिबेटिंग सोसायटी' भी खोली।

 

 मौलाना आज़ाद पर  सर सैय्यद अहमद खान का गहरा प्रभाव  पड़ा था। उन्होंने उनके लेखन को बहुत रुचि के साथ पढ़ा। वे आधुनिकता और आधुनिक शिक्षा के बारे में सर् सय्यद अहमद खान के विचारों को स्वीकार करते थे।   

मौलाना आज़ाद पत्रकारिता में तब सक्रिय हुए जब वह अपनी किशोरावस्था में थे। उन्होंने 1912 में एक साप्ताहिक पत्रिका निकालना शुरू किया। उस पत्रिका का नाम 'अल हिलाल' था। 'अल हिलाल' के माध्यम से उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द और हिंदू मुस्लिम एकता को बढ़ावा देना शुरू किया और साथ ही ब्रिटिश शासन पर प्रहार भी किया। भला ब्रिटिश शासन को अपनी आलोचना और हिंदू-मुस्लिम एकता कैसे भाती, आखिरकार सरकार ने इस पत्रिका को प्रतिबंधित कर दिया। मौलाना आज़ाद भी कहां मानने वाले थे। उन्होंने 'अल-बलाग' नाम से एक और पत्रिका निकालना शुरू कर दिया। इसके माध्यम से भी उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद और हिंदू-मुस्लिम एकता के अपने मिशन को आगे बढ़ाना शुरू किया।

मौलाना आज़ाद ने कई किताबें भी लिखीं जिनमें उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध किया और भारत में स्वशासन की वकालत की। भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर मौलाना आज़ाद ने एक किताब भी लिखी है, 'इंडिया विंस फ्रीडम' जिसे 1957 में प्रकाशित किया गया। लेकिन  उन्हें मरणोपरांत प्रकाशित एक आत्मकथात्मक कथा के लिए भी जाना जाता है ।  उनकी अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों में शामिल हैं  गुबार-ए-खातिर ,  पाकिस्तान पर आज़ाद,  'तज़किरह' , हिज्र-ओ-वस्ल, ख़ुत्बात-उल-आज़ाद,  और 'हमारी आज़ादी' शामिल हैं।

 

साहित्य अकादमी द्वारा छ: संस्करणों में प्रकाशित क़ुरान का अरबी से उर्दू में अनुवाद और व्याख्या उनके शानदार लेखन को दर्शाता है। इसके बाद 'तर्जुमान-उल-क़ुरान' के कई संस्करण निकले हैं। मौलाना आज़ाद ने 'अंजुमन-ए-तरक्की-ए-हिन्द' को भी एक नया जीवन दिया।

 

मौलाना आज़ाद हिंदू-मुसलिम एकता के प्रबल पक्षधर थे और मुस्लिम युवकों को क्रांतिकारी आंदोलनों के प्रति प्रेरित करते थे। वे गांधी जी के  सिद्धांतों के प्रबल समर्थक थे। (1920 -1924) में जब 'ख़िलाफ़त आंदोलन' छेड़ा गया तो उसके सक्रिय प्रतिभगियों में से एक  मौलाना आजाद भी थे। ख़िलाफ़त आंदोलन के दौरान उनका महात्मा गांधी से सम्पर्क हुआ। इसी दौरान 

मौलाना आज़ाद ने 'अखिल भारतीय खिलाफत समिति' के अध्यक्ष का पद संभाला, और अहिंसक 'नागरिक अवज्ञा आंदोलन' में गांधीजी का खुलकर समर्थन किया। 1919 के रॉलट ऐक्ट के खिलाफ 'असहयोग आंदोलन' के आयोजन में भी  मौलाना आज़ाद ने अहम भूमिका निभाई। महात्मा गांधी उनको 'ज्ञान सम्राट' कहा करते थे।

 इसके बाद  मौलाना आजाद और गांधी जी करीब हो गए, और वे गांधी जी के नमक-मार्च (1930) सहित विभिन्न सविनय-अवज्ञा ( सत्याग्रह ) अभियानों में शामिल थे । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश विरोधी भारत अभियान में भाग लेने के लिए 1920 और 1945 के बीच उनको कई बार  जेल में कैद किया गया था । 1923  और 1940-46 में  मौलाना आज़ाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे। इस तरह वह बहुत छोटी उम्र से ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए, और 35 साल की उम्र में कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए, शायद वह कांग्रेस पार्टी के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष थे।  मौलाना आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय नेता थे।

 

मौलाना आज़ाद के लिए देशभक्ति इस्लामी दायित्व था। क्योंकि पैगम्बर (स.अ.व.) के बारे में रवायत है कि आप (स.अ.व.) ने फ़रमाया कि किसी का अपने देश से प्यार करना उसके ईमान का हिस्सा है। और देश से इस प्यार ने विदेशी गुलामी से आजादी की मांग की और इस तरह अपने देश को ब्रिटिश गुलामी से आज़ाद कराने को अपना फर्ज़ समझा। 

गांधी जी की तरह मौलाना आज़ाद का मानना ​​था कि देश की आज़ादी के लिए हिंदू मुस्लिम एकता जरूरी है। इस तरह जब वे कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में पार्टी के अध्यक्ष बन गए, तब  मौलाना आज़ाद ने अपने अध्यक्षीय सम्बोधन  को इन शब्दों के साथ समाप्त किया, "चाहे जन्नत से एक फरिश्ता अल्लाह की तरफ़ से हिंदुस्तान की आज़ादी का तोहफा लेकर आए, मैं उसे तब तक कुबूल नहीं करूंगा, जब तक कि हिंदू मुस्लिम एकता कायम न हो जाए, क्योंकि हिंदुस्तान की आज़ादी का नुकसान हिंदुस्तान का नुकसान है जबकि हिंदू मुस्लिम एकता को नुकसान पूरी मानवता का नुकसान होगा।"

ये बहुत अर्थपूर्ण शब्द हैं और मौलाना आज़ाद के लिए सिर्फ बयानबाजी नहीं थी लेकिन यह कुरान की  वास्तविकता की बुनियाद पर उनकी गहरी समझ थी। बीसवीं सदी की शुरूआत में मौलाना ने रांची में कैद के दौरान कुरान की जो व्याख्या की लिखी उसे भारतीय उपमहाद्वीप के साहित्य जगत  में महान योगदान माना जाता है।

 

मौलाना आज़ाद ने  हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए कार्य किया और वो अलग मुस्लिम राष्ट्र (पाकिस्तान) के सिद्धांत का विरोध करने वाले मुस्लिम नेताओ में से एक थे जो देश-विभाजन के सख्त खिलाफ थे। लेकिन विभाजन ने उनके एक-राष्ट्र के सपने को चकनाचूर कर दिया, जहाँ हिंदू और मुसलिम साथ-साथ रहकर तरक्की कर सकते थे। 

 

 पंडित नेहरू और मौलाना आजाद  एक दूसरे के बहुत करीब थे। वे केवल अच्छे दोस्त ही नहीं थे बल्कि एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। नेहरू ने कई भाषाओं पर मौलाना आज़ाद की महारत हासिल करने और उनकी इल्मी सलाहियत पर अपनी किताब 'डिसकवरी ऑफ़ इंडिया' में  काफी विस्तार से लिखा है। दूसरे धर्मों के बारे में भी मौलाना आज़ाद का ज्ञान बहुत गहन था। महिलाओं  की शिक्षा और अधिकारों के बारे में  उनके संकल्प आज ही जैसे थे। वह महिलाओं को आमतौर पर घर की चार दीवारी तक ही सीमित रखने का विरोध  करते थे। 

 

मौलाना आज़ाद हिंदुस्तान की आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले से 1952 में सांसद चुने गए और भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने।

मौलाना आज़ाद ने शिक्षा के क्षेत्र में कई अतुल्य कार्य किए। शिक्षा मंत्री बनने पर उन्होंने नि:शुल्क शिक्षा,उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना  की। मौलाना आजाद  ने ही 'भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान' (IIT) और 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' (UGC) की स्थापना की थी।

इसी के साथ मौलाना आज़ाद ने  शिक्षा और संस्कृति को विकसित करने के लिए उत्कृष्ट संस्थानों की स्थापना की थी, और संगीत नाटक अकादमी (1953), साहित्य अकादमी (1954) और ललित कला अकादमी (1954) की स्थापना की थी।

 

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) ने मौलाना आजाद के शिक्षा के क्षेत्र में किए गए योगदान के लिए उनके जन्मदिन पर साल 2015 में "राष्ट्रीय शिक्षा दिवस" (नेशनल एजुकेशन डे) मनाने का फैसला किया था।

आजादी के बाद,  एक पद जो  मौलाना आज़ाद ने 1958 तक पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में रखा था।  वह भारत और पूर्वी देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को सुरक्षित करने के लिए भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की स्थापना करने के लिए स्मारकीय था ।

 

 मौलाना आज़ाद एक महान राजनीतिज्ञ थे। वे उन भारतीय नेताओं में से एक थे जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के साथ भारतीय स्वतंत्रता के लिए बातचीत की। उन्होंने एक ऐसे भारत की पुरज़ोर वकालत की, जो स्वतंत्र भारत और पाकिस्तान में ब्रिटिश भारत के विभाजन का कड़ा विरोध करते हुए हिंदूऔर मुसलमान दोनों को गले लगाएगा ।  लेकिन मौलाना आज़ाद सफल नहीं हुए और देश को विभाजित होने से नहीं बचा सके।

 

 मौलाना आज़ाद ने22 फरवरी, 1958 को इस  दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, विद्वान और कवि के रूप में उनके प्रयासों की पहचान के लिए मरणोपरांत वर्ष 1992 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

मौलाना आज़ाद ने  हमेशा सादगी का जीवन पसंद किया। आपको जानकर हैरानी होगी जब उनका निधन हुआ था, उस समय भी उनके पास कोई संपत्ति नहीं थी और न ही कोई बैंक खाता था। उनकी निजी अलमारी में कुछ सूती अचकन, एक दर्जन खादी के कुर्ते पायजामें, दो जोड़ी सैंडल, एक पुराना ड्रैसिंग गाऊन और एक उपयोग किया हुआ ब्रुश मिला किंतु वहां अनेक दुर्लभ पुस्तकें थी जो अब राष्ट्र की सम्पत्ति हैं।


 

"लायी हयात आये, क़ज़ा ले चली, चले।

अपनी खुशी से आये, न अपनी खुशी चले।"

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