अब हर देहरी खतरे की जद में, खोल सको तो आंखें खोलो


अब हर देहरी खतरे की जद में है। अब भी आंख नही खुली तो हजारों वर्ष तक पश्चाताप ही करना होगा। बिहार के चुनाव परिणाम से सबक लीजिये। सनातन पर खतरा बहुत गंभीर हो चला है। आज बिहार में दिखा है, कल पूरे देश मे अवश्य दिखने और लागू होने वाला है। बहुत सेक्युलर और अनावश्यक सहानुभूति बांटने वालों, खोल लो अपनी आंखें। दृश्य देखो और वास्तविक जमीन की तलाश करो। यह तो केवल एक बानगी भर है। बिहार के सीमांचल इलाक़े में 24 सीटे हैं जिनमें से आधी से ज़्यादा सीटों पर मुसलमानों की आबादी आधी से ज़्यादा है असदुद्दीनओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम इनमें से पांच सीटों पर जीत हासिल की है। चुनाव नतीजे आने से पहले राजनीतिक विश्लेषक ये मान रहे थे कि सीमांचल के मुसलमान मतदाता ओवैसी की पार्टी की बजाय धर्मनिरपेक्ष छवि रखने वाली महागठबंधन की पार्टियों को तरजीह देंगे लेकिन मुसलमानों ने महागठबंधन को नकार कर ओवैसी की पार्टी के साथ जाना पसंद किया। बिहार में हुई एआईएमआईएम की यह जीत से बाबासाहब भीमराव अंबेडकर की भविष्यवाणी बिल्कुल सच होती दिख रही है।
 दरअसल यह इतिहास से सबक लेने का समय है। ज्यादा दिन नही बीते हैं। केवल 72 वर्ष बीते हैं। लेकिन हालात वहीं पहुच गए हैं जहां 1946 में सरदार पटेल ने इसे ठीक किया था। केवल एक बीज गलती से बच गया था। गलती के पीछे केवल मानवीयता थी वर्ना यह नौबत नही आती। भारत को अपने नागरिकों की सुरक्षा, संरक्षा और निर्धारण के खुद के फैसले के खिलाफ देश मे कोई मुखालफत नही देखनी पड़ती। अभी बीते दिनों में कोरोना संक्रमण से ठीक पहले पूर्वोत्तर से लेकर दिल्ली तक की आग ने भी यही संदेश दिया है  कि भारत की वास्तविक स्वाधीनता की लड़ाई अब शुरू हुई है। भारत के विरोध में खड़ी अभारतीय जमात को डॉ भीमराव अंबेडकर का वह व्याख्यान याद दिलाने की जरूरत है जिसमे भारत के विभाजन के प्रश्न पर उन्होंने कहा था कि यदि विभाजन हो तो पूरी जमात को उस देश मे भेजना होगा , नही तो यदि थोड़े भी राह जाएंगे तो भारत के लिए बहुत बड़े खतरे के रूप में उभरेंगे। डॉ आंबेडकर की आशंका झूठी या कोरी कल्पना तो नही थी। जिन्हें उनकी इस आशंका पर शक हो वे डॉ आंबेडकर की वह पुस्तक पढ़ लें जो विभाजन को केंद्र में रखकर लिखी गयी है। 
अब बात करते हैं उन हालात की जो 1946 में थे और आज बनाये जा रहे हैं। सरदार पटेल उस समय हैदराबाद के विलय की तैयारी में थे। उससे पहले ही 1927 में हैदराबाद के निजाम के समर्थन में एक राजनीतिक पार्टी बनाई गई थी जिसका नाम mim था। इस पार्टी को लखनऊ के एक सनातन भारत विरोधी सज्जन ने बनाया था जिनका नाम था कासिम राजवी। जब 1946 में सरदार पटेल सक्रिय हुए तो कासिम राजवी ही mim के अध्यक्ष थे। ये अपने सदस्यों को रजाकार कहते थे । 1946 में इसी कासिम राजवी के डेढ़ से दो लाख रजाकारों ने हैदराबाद विलय के विरोध में खूब उत्पात मचाया। हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार समेत उन पर बीभत्स किस्म के अत्याचार किये गए। mim की यह बर्बर सेना हिंदुओ को काट कर उनकी स्त्रियों और संपत्तियों पर कब्जे कर रही थी। बहुत अत्याचार हो रहे थे और बर्बरता की सारी हदें पार हो चुकी थीं। सरदार पटेल से जब यह बर्बरता नही देखी गयी तो उन्होंने आपरेशन पोलो की योजना बनाई । आपरेशन पोलो बेहद सफल रहा और हैदराबाद के विलय हो गया। चर्चित बीबीपुर मामले में  कासिम राजवी पर मुकदमा चला और अदालत ने कासिम राजवी को भारत छोड़ देने का आदेश दे दिया।
कासिम राजवी भारत छोड़ने से पहले कुछ कांग्रेसियों के सहयोग से जेल से बाहर आते ही पहले हैदराबाद गया। वहां पहुच कर उसने अपने रजाकारों को एकत्र किया। 1957 में आये इस फैसले में कासिम को केवल 48 घंटे का समय भारत से बाहर जाने के लिए दिया गया था लेकिन उसने ठीक ठाक समय लेकर आराम पहले अपनी पार्टी को असदुद्दीन ओबैसी के दादा अब्दुल वाहिद ओबैसी को सौप दिया और उनको रजाकारों का मुखिया बना दिया। यद्यपि रजाकारों पर अदालत ने प्रतिबंध लगा दिया था फिर भी रजाकारों का संगठन ओबैसी के दादा चलाते रहे। बाद में यही संगठन AIMIM के नाम से आगे बढ़ गया जिसके वर्तमान मुखिया असदुद्दीन ओबैसी हैं। 
आज आपको जानकर आश्चर्य भी होगा कि हैदराबाद की इस मुस्लिम पार्टी की जिला इकाइयां उत्तरप्रदेश , बिहार, बंगाल जैसे राज्यो में खूब सक्रिय हैं।
नागरिकता कानून के खिलाफ जो दृश्य बीते दिनों में पूरे भारत मे उपस्थित हुए उसको गहराई से समझने की आवश्यकता है। यह महज कोई दंगा या फसाद नही था। यह सीधे सनातनता को चुनौती है। 
क्रमशः


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