बड़े पर्दे पर दिखाने का मानो भूत सवार हो गया था- सुबोध गोविल

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जन्में सुबोध गोविल वनस्थली विद्यापीठ में प्राचार्य पद पर कार्यरत पिताजी स्वार्गीय जगदीश प्रसाद जी के साथ जयपुर आये और यहीं  साहित्य से सिनेमा तक उनका सफर न केवल प्रदेश के फिल्मकारों के लिए प्रेरणादायक  बने अपितु अपनी माटी की सोधी महक रूपी ब्रजभाषा को भी राजस्थान की फिल्म इण्डस्ट्री  में स्थान दिलाने का जतन किया।  उनकी पहली फिल्म ‘स्वर्ग आश्रम’ को  देशभर में खूब सराहा गया है। उत्तर प्रदेश में आगामी फिल्म की शूटिग करने का मन बना चुके फिल्मकार सुबोध गोविल से हुई बातचीत के मुख्य अंश-




 फिल्मों के प्रति पहला रूझान कैसे हुआ?



 यह महज संयोग ही था। जब मैं करीब 20 वर्ष का था तब मेरी मौसी श्रीमती रमा सिंघल अपने साथ मुझे जयपुर के पेलोविक्ट्री सिनेमाघर में मीनाकुमारी की फिल्म दिखाने ले गईं। तब मैने पहली बार किसी फिल्म का दीदार किया था।



 फिल्मो का प्यार के परवान कैसे चढ़ा?



 जहाँआरा देखने के बाद से ही मेरे मन के किसी कोने में छिपा कलाकार अंगड़ाई लेने लग गया था। लेकिन जब मानप्रकाश सिनेमाघर में जितेन्द्र की ‘फर्ज’ फिल्म देखी तो ऐसा लगा जैसे मैं इस दुनिया में केवल फिल्मों के लिए ही आया हूँ। मैं जितेन्द्र की अदाकारी से इतना मंत्रमुग्ध हो गया कि फर्ज को करीब 20 बार देख ली। उसके बाद शोले फिल्म में अमिताभ की एक्टिंग ने तो मानो जादू कर दिया। शोले भी कई बार देख ली। अब तो बस खुद को बड़े पर्दे पर दिखाने का मानो भूत सवार हो गया था। फिल्मकार बनने का जुनून ऐसा चढ़ा कि भाई प्रबोध व अनुरोध, बहिन रानी दीदी व पूर्णिमा सहित सभी दोस्त मेरी हंसी उढ़ाते थे, लेकिन मेरे चाचाजी एस.सी.गोविल और बढ़े भाई साहब स्व. विनोद कुमार गोविल ने सदैव मेरा उत्साहवर्धन किया। और फिर एक घटना ने तो मुझे अपने जुनून को रंगत लाने के लिए मजबूर कर दिया।



  सिनेमा की कोई यादगार घटना ?



 दोस्तों के साथ जयपुर के अंकुर सिनेमा में लगी अमिताभ की शान फिलम देखने गया था, हाउसफुल होने की वजह से चैकीदार सिनेमाघर से हमें जबरन बाहर निकालने पर उतारू हो गयां तब मैने पहली बार सबके सामने ऐलान कर दिया जिस व्यक्ति को तुम आज धक्का मार कर भगा रहे हो, उसका चेहरा इसी पर्दे पर दिखेगा। यह घोषणा सुनकर मेरे दोसत हंसने लग गए थे।
 - एक  लेखक  के फिल्मकार बनने वह भी उम्र के इस पडाव पर क्या कारण है?



 यह सही हे कि मैंने यातन, वकालात, पुत्र-वधु कृतानत, गहने, संत्रस्त गलियाँ जैसे उपन्यास और साहित्य लिखे। उपन्यास ‘प्रसव पीड़ा’ के लिए तात्कालीन मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर ने गणतंत्र दिवस पर सम्मानित भी किया। लेकिन शुरू से ही मेरा मन फिल्मी दुनिया के आस-पास भी भटकता रहा। यही वजह है कि इन सभी उपन्यासों के फिल्ममेकिंग के अधिकार मेरे पास सुरक्षित रखने की शत्र पर ही प्रकाशकों को उपन्यास प्रकाशित करने दिया। उपन्यासों ने मुझे विचारों की परिपक्वता को अर्जित करने का अनुभव दिया जिसकी बदौलत आज मैं खुद को अच्छी फिल्मों की पटकथा लिखने में सहज महसूस करता हूँ।



 फिल्म निर्माता निर्देशक का सफर कैसे शुरू हुआ?



 आत्मविश्वास से पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद 1995 को फिल्म लाइन में प्रवेश करने का निर्णय किया। ‘गोविल फिल्म’ नाम से एक फिल्म मेकिंग संस्था बनाकर ुिफल्मकार और अदाकार बनने के सपनों में रंग भरना शुरू कियां



 पहली फिल्म कौन सी थी?
  शुरू से ही मेरा मानना था कि फिल्में समाज की हकीकत को दिखाने वाला आईना और समाज को दिशा देने वाला कम्पास (दिशा सूचक) होता है। 1997 में मैंने इसी सोच को केन्द्रित कर समाज में महिलाओं के दोयम दर्जे को उजागर करने वाली टेलिफिलम ‘चाहत’ बनाई। जिसे दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। पहली बार फिल्मी हीरो के रूप में खुद को देखकर जो रोमांच की अनुभूति हुई थी उसका बयान नहीं किया जा सकता। और हाँ, (नटखटता के अंदाज में) उसके बाद तो बचपन में मेरे कलाकार बनने की बात की खिल्ली उड़ाने वाले भाई, बहिनों, दोस्तों सभी का मुंह मानों सिल गए हों।



 - वाह! बतौर निर्माता, निर्देशक, लेखक, कलाकार आदि लाईन की चहुमंखी विद्या के धनी सुबोध गोविल के आगे का सफर बतायें?



 सुबोध गोविल: उसके बाद टेलिफिल्म ‘जिद्दी8 और ‘वो कौन’ बनाई। यहीं नहीं ‘अंधेरी नगरी, चैपट राजा’, गइ्र भैंस पानी में’, ‘टुटपुंजिया मैरिज ब्यूरों’ जैसे टीवी धारावाहिकों में भी हाथ आजमाया। लेकिन.....।



 - लेकिन क्या.......



 सुबोध गोविल: (थोड़ा मायूस होकर) नियति भी कई बार बीच राह साथ छोड़ देती है। तब बेबस इंसान अपने जुनून को भी मारने को मजबूर हो जाता है। 2003 में इकलौते जवान बेटे पराग की असामयिक मृत्यु के बाद मैं हर इंसान की तरह टूट सा गया। फिल्मी मन यकायक बुझ गया।



 - ओह, बहुत दुखद घटना थी यह! (थोड़ा रुककर) फिल्मों में वापस लौटना कैसे हुआ?



 सुबोध गोविल: 2009 में सरकारी नौकरी से सेवानिवृत होने के बाद जीवन पूरी तरह नीरस होता जा रहा था। तब मित्रों ने फिर फिल्म बनाने के शौक को पुनः जीवित करने का जनत किया। धीरे-धीरे मेरे जहन में साहित्कार तथा फिल्मकार दोनों फिर अंगड़ाई लेने लगे और बन गई ‘स्वर्ग आश्रम’ के रूप में एक ऐतिहासिक फिल्म।


 



 - स्वर्ग आश्रम की परिकल्पना कैसे बनीं?



 सुबोध गोविल: 2010 की बात है। अजमेर के एक आश्रम में एक नामी संतक े दश्रन करने के दौरान उसके गिरे हुए चरित्र को देखकर समाज को ऐसे ढ़ोगी बाबाओं से बचने का संदेश देने का संकल्प किया। उधर उसी साल देशभर में एक के बाद एक ऐसे ढ़ोंगी बाबाओं के बदचलनी के मामले उजागर होने लगे। इधर मेरी कलम ने ‘स्वर्ग आश्रम’ की पटकथा लिख दी। प्रसंगवष यह बताना उचित हे कि स्वर्ग आश्रम फिल्म को कई दर्शक आशाराम बापू के मामले से जोड़कर देखते हैं।



 - स्वर्ग आश्रम को व्यस्क श्रेणी के अनुरूप् बनाने के पीछे क्या रणनीति रही?



 सुबोध गोविल: बिना किसी बड़े स्टारकास्ट की फिल्मों के लिए मध्यम वर्ग के दर्शक गारंटीड दर्शक होते हैं। मध्यम वर्ग को स्वर्ग आश्रम को देखने के लिए लालायित करने के लिए बोल्ड फ्लेवर देना था। अलबत्ता फिल्म के विषय की नजाकत को देखकर सेंसर बोर्ड ने पहले तो फिल्म प्रदर्शन की अनुमति देने से ही मना कर दिया। जब बोर्ड की अध्यक्ष शर्मिला टैगोर को फिल्म में छिपे संदेश से अवगत कराया तो वे ‘ए’ सार्टिफिकेट के साथ स्वर्ग आश्रम को प्रदर्शन कराने पर राजी हुई।



 - अच्छी फिल्म तो कई लोग बनाते है। लेकिन उससे व्यवसाय करना टेढ़ी खीर होता है। आपने क्या रणनीति बनायी?



 सुबोध गोविल: स्वर्ग आरम को सबसे पहले आफनलाइन वर्जन के यप् में ‘यू-ट्यूब’ पर वल्र्डवाइड रिलीज करने की अनोखी योजना बनायी गई। आपको यह जानकर ताज्जूब होगा कि आज तक ‘यू-ट्यूब’ पर दुनिया के कोने-कोने में 12 लाख लोगों ने स्वर्ग आश्रम को देख लिया है। आॅनलाइन फिल्म रिलीज करने की योजना की ऐतिहासिक सफलता से उत्साहित होकर राजस्थान में बनीं इस हिन्दी फिल्म का देशभर मे परचम फहराने का निर्णय लिया। शुरू से कुछ प्रदर्शक का राजस्थान की स्वर्ग आश्रम के प्रति आशंकित हुए दर्शकों के अनमोल प्यार की वजह से स्वर्ग आश्रम ने वो इतिहास रच दिया जिसकी राजस्थान की किसी फिल्म से उम्मीद नहीं की जाती थी। स्वर्ग आश्रम ने अभी तक राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, झारखण्ड़, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब राज्य के 160 सिनेमाघरों में करीब 4500 शो तक प्रदर्शित होकर एक अनोखा किर्तिमान बनाया। यही नहीं मालेगाँव के वैभव सिनेमाघर में तो यह लगातार पाँच सप्ताह तक दर्शकों को मोहित करती रही।



 - स्वर्ग आरम के बाद.........
 सुबोध गोविल: असली मायने में मेरा फिल्मी जीवन स्वर्ग आश्रम से शुय हुआ। स्वर्ग आश्रम की सफलता का यह सफर एक और वास्तविक घटना पर आधारित फिल्म ‘अस्थि कलश8 -एक अबला का’ तक पहुँच गया है। बड़े बजअ की इस फिल्म के लिए बाॅलीवुड कलाकार सोनाली बेन्द्रे, चंकी पाण्डे, सुरेश आॅबेराॅय, रजा मुराद से अभिनय कराने की बात चल रही है। अगले वर्श फरवरी माह में फिर देश के दर्शकों को नये संदेश के साथ ‘गोविल फिल्मस’ की इस फिल्म को देखने का मौका मिलेगा, यह मेरा वादा है।


 


 


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