"धार्मिक-सांस्कृतिक और आस्था का प्रतीक है रंगोली"*


 रंगोली यह हमारे भारत देश की सांस्कृतिक परंपरा और लोककला हैं | हमारे हिन्दू धर्म में रंगोली को विशेष महत्व दिया हैं | रंगोली पुरे देश में सबसे प्रसिद्ध हैं | हर एक राज्य में रंगोली अलग-अलग नामों से जानी जाती हैं | अलग-अलग राज्यों में रंगोली की भिन्न शैली होती हैं | हिन्दू धर्म में आँगन या द्वार पर बनाई गयी रंगोली को शुभ माना जाता हैं | त्योंहारों के अवसर पर इसका महत्व और बढ़ जाता हैं | दीपावली, दशहरा और मांगलिक अवसरों पर हर एक घर के द्वार पर रंगोली सजाई जाती हैं | रंगोली का अर्थ- रंगोली मूल्यतः दो शब्दों रंग+अवली शब्द से बना है यहाँ अवली का अर्थ रंगों की कतार है। रंगोली को अल्पना भी कहा जाता हैं | अल्पना यह शब्द संस्कृत के ‘अलेपना’ इस शब्द से बना हुआ हैं। जिसका अर्थ होता हैं- लेपना या लेपन करना | क्योंकि रंगोली बनाते समय रंगों का उपयोग दीवार या जमींन पर लेपन के रूप में किया जाता हैं | ऐसा माना जाता हैं कि रंगोली बनाने की शुरुवात मोहेंजो दड़ो और हड़प्पा संस्कृति से हुई हैं |

            धार्मिक-सांस्कृतिक और आस्था का प्रतीक है रंगोली। दीपावली में घर पर घर का जगमगाना तो बनता ही है, लेकिन इस दिन घर पर रंगोली बनाना बेहद शुभ माना जाता है। वास्तु के अनुसार घर में रंगोली बनाने से मां लक्ष्मी बेहद प्रसन्न होती हैं और उनकी कृपा हमेशा बनी रहती है।  दिवाली में रंगोली बनाने की परंपरा काफी पुरानी है। दिवाली पर मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए घर के दरवाजे पर अलग-अलग रंगों से रंगोली बनाई जाती है। वास्तु में भी रंगोली बनाने का अपना महत्व है। कहा जाता है कि दिवाली पर घर के दरवाजे पर रंगोली बनाने से घर में नकारात्मकता दूर होती है। रंगोली का हमारे सभ्यता में बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है भारतीय संस्कृति में सभी शुभ कामों में रंगोली बनाई जाती है रंगोली को सुख समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। रंगोली में विभिन्न रंग के डिजाइन बनाये जाते है जिनमें हमारी संस्कृति की झलक दिखाई देती है। दीवाली एक धार्मिक, विविध रंगों के प्रयोग से रंगोली सजाने, प्रकाश औऱ खुशी का त्यौहार है जिसे हम बड़ी धूम धाम से मनाते है।

              घर के दरवाजे से लेकर आँगन तक प्राकृतिक प्रतीकों के सहारे रंगोली सजाने की परंपरा का निर्वहन होता रहा है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम भारत का शायद ही कोई कोना इस परंपरा से वंचित रहा हो। समय और काल के अनुसार इसमें नाम आदि में परिवर्तन तो हुआ है परन्तु इसका मूल आज भी ज्यों का त्यों है। रंगोली की डिजाइनें मूल्यतः प्रकृति से ली जाती हैं। इनमें तोते, हंस, आम, फूल-पत्ते आदि प्रमुख हैं। इनके रंगों के प्रेरणा स्रोत भी प्रकृति ही है। यद्यपि आजकल रंगों में सिंथेटिक रंगों का प्रयोग किया जाता है। इससे इनकी चमक ब़ढ़ जाती है। रंगोली में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियाँ यथा रंगीन चावल, हल्दी, सूखी लाल मिर्च, रोड़ा सीधी सपाट रंगोली का आभास देती हैं जबकि धनिया, दाल कुछ अन्य अनाज से तैयार सामग्रियाँ अकेले या प्राकृतिक रंगों के साथ प्रयोग करने पर त्रि-आयामी(थ्री डी) चित्रांकन का आभास देते हैं। कुछ कलाकार केवल किनारों पर त्रि-आयामी चित्रांकन करते हैं जबकि कुछ अन्य अनाज और दानाओं के सहारे पूरी रंगोली सजाते हैं।


 

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