"दोहे शरद के"

"दोहे शरद के"


खूब नहायी है धरा,पावस का पा नेह।
कंचन कंचन हो गयी,मलिन श्याम सी देह।।


उजला निखरा रूप पा,आयी ऐसी लाज।
मुख उसने यो ढंक लिया,धुॅंध के घूॅंघट साज।।


निष्ठुर रवि को जब मिला,हिम का निश्छल प्यार।
मधुर रसीला हो गया,उसका कटु व्यवहार।।


नर्म-नर्म यों गुनगुना,भरा धूप में स्वाद।
आई मां की गोद की, सोंधी-सोंधी याद।।


कुहरे की अगवानियां,सपनीले दिन रात।
तरु तृण पत्र प्रसून पर,मुक्ता की बरसात।।


स्वर्ण अक्षरों से लिखा,खेतों में श्रम छन्द।
तीर नदी के डोलती,अमरूदी मधु गंध।।


खिली झूम कर बाग में,गेंदा की हर डाल।
बहकी बहकी लग रही,सेवन्ती की चाल।।


वसुंधरा के गात पर,झरा शीत का प्रीत।
शबनम शबनम रच रही,दूबों पर नवगीत।


सुधियों की सरगर्मियां,सपनों की बारात।
हिमवन से सब आ गये,नेह भरे सौगात।।


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