हमारी पावन भूमि बुन्देलखण्ड ‘ओरछा’ - एक सांस्कृतिक धरोहर


हमारा बुन्देलखन्ड वीरों और कवियो की खान है, इसमें न जाने कितने वीर पुरुष और दानी महाराजा हुये है। बुन्देलखन्ड का बहुत उत्थान एवं पतन हुआ हैं और इसकी राजनीति में अनेको आँधी और तूफान आये, फिर भी इसका इतिहास बहुत गौरवपूर्ण रहा है, इसमें कलिंजर, महोबा, ओरछा, पन्ना वीरों की वस्तु स्थिति को प्रकट करता है। अकबर का महान सेनापति अबुल फजल जब अपनी डेढ़ लाख सेना को लेकर बुन्देलखण्ड के ऊपर बढ़ा तो ओरछा के महाराजा वीर सिंह देव ने उसे खत्म कर दिया था। महाराजा छतत्रसाल के इतिहास के साथ-साथ लक्ष्मीबाई को दुर्गावती और बक्सर की महारानी को भारत में कौन नहीं जानता? आल्हा उदल की वीरता विश्व के इतिहास में अनुपम है।
 वैसे भारत प्राण बुन्देलखण्ड अपनी वीरता, पराक्रम एवं शौर्य के कारण विश्व विख्यात है। यहाँ के वीर शासकों ने केवल घोड़ो की टाप, तोपों की गर्जन एवं चूड़ियो की झंकार ही नहीं सुनी अपितु प्रजा के सुख की वेदिका में अपने राजसी ऐशोआराम को खोकर अपनी प्रजा भक्ति का परिचय दिया है।
‘ओरछा’ भी ऐसे ही स्थानों में से एक है, जिसका अपना सांस्कृतिक महत्व है, यहाँ की वीरता, त्याग एवं विद्वता की महानता के समक्ष सबको नतमस्तक होना पड़ता है। यहाँ कितनी ही संस्कृतियो का विकास व ह्रास हुआ। आदिकाल से लेकर मोर्यो, शकों, नाग, मालवी, भारशिवों, बाकाटकों, गुप्तो और चन्देलों के समय इसका अति वैभव था। भारतीय साहित्यक स्वं सांस्कृतिक उन्नयन में ओरछा के अनेक मनीषियों ने विपुल योगदान दिया। विद्वान मित्र मिश्र जी, महात्मा हरीराम व्यास, स्वनाम धन्य नृपति मधुकरशाह जी, महारानी गणेश कुॅवर जी, राय प्रवीण जी, लाला हरदौल जी, आचार्य केशवदास जी आदि ने अपनी महान कृतियों से ओरछा का नाम उज्जवल किया। बुन्देला शासक रुद्व प्रताप ने गुढ़कुण्डार के स्थान पर ओरछा को अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया। इन्हीं के द्वितीय पुत्र मधुकर शाह महाराज ने अड़तीस वर्ष राज किया, ओरछा का यह यौवनकाल था, इन्हीं के नाम से बुन्देलखण्ड में ‘मधुकर शाही तिलक’ बहुत प्रसिद्व हुआ, इस टीका से ही इन्हें बादशाह अकबर से ‘टीकमशाह’ की उपाधि मिली थी। परम भक्त कृष्ण उपासक महाराज मधुकर शाह ने अपनी विलक्षण भक्ति द्वारा भगवान से साक्षात्कार करके दर्शन प्राप्त किये थे। कहते हैं आनन्द में निम्गन उनके नृत्य मे प्रेम विभोर  होकर, उस अलौकिता को देखकर ओरछा में ‘सोने के फूल’ आकाश से बरसे थे। मधुकरशाह की महारानी ‘गणेश कुँवर देवी’ श्री काशी विश्वनाथ की कृपा और वरदान से श्री रामराजा भगवान की परम उपासक थी। एक दिन बातो ही बातो में वह महाराज से भक्ति पक्ष सम्बन्धी विवाद में यह जिद कर बैठी कि वह अयोध्यापुरी ही रहेंगी और ओरछा लौटेगी तो अपने इष्ट भगवान राम के साथ कहते है कि महारानी की भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान राम ने वरदान दिया कि वह अकेले बालक के रुप में ओरछा चलेगे। इस प्रकार अयोध्या जी से ‘पुख्य नक्षत्र’ में प्रस्थान करके आठ माह सत्ताईस दिन के बाद ओरछा में रामराजा भगवान महारानी गनेश कुँवर के महल में विराजमान हो गये। कहा जाता है, उसी समय से तुलसीदास ने रामायण लिखना शुरु कर दिया, इस प्रकार ओरछा ‘तीर्थ’ हो गया।


बुन्देलखण्ड के वीरो- वीरंगनाओ व महार्षियो का संक्षिप्त परिचय
 बुन्देलखण्ड का इतिहास वीरत्व से पूर्ण है, उसमें भी ओरछा के बुन्देला अग्रगन्य रहे हैं। इतिहास शब्द का अर्थ है ‘ऐसा था’ होता है अर्थात पूर्व में समाज की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति कैसी थी का चित्रण ही इतिहास है। इतिहास राष्ट्र की मशाल होती है जिसके प्रकाश में राष्ट्र के जागरुक व गतिशील रखा जाता है, साथ ही नये अन्वेषणों व विचारों से इसमें नवजीवन डाला जाता है।
 बुन्देलखण्ड की पवित्र माटी में अनेकों वीरो ने जन्म लेकर इस धरा को गौरवान्वित किया जिससे कुछ की जानकारी व परिचय निम्न है।
महाराज वीर सिंहजू देव (प्रथम) सन 1606 से 1627 तक 
महाराज मधुकरशाह के पुत्र वीरसिंह जू देव का नाम बुन्देलखण्ड के इतिहास में स्वर्णाक्षरो में अंकित रहेगा। इस काल में शिल्पकला, साहित्य, व्यापार चित्रकला आदि चरमोत्कर्ष पर थी। महराज वीरसिंह प्रतिभाशाली योद्वा साहसी पुरुष, कुशलनीतिज्ञ, महान दानी, ख्याति प्राप्त न्यायी बुन्देला स्थापत्य शैली के प्रणेता, साहित्यकारो कलाकारो के आश्रयदाता ऐसी ऐतिहासिक विभूति थे। इनके तीन विवाह हुये थे, जिनसे 12 पुत्र व एक पुत्री हुई।  दिमान हरदौल, जुझार सिंह इन्हीं के पुत्र थे महाराज ने मथुरा के विश्राम घाट पर इक्यासी मन सोने का तुलादान किया था, जिसकी कथा आज भी सुनी जाती है साथ ही इष्ट पूर्ति यज्ञ करके 52 इमारतों का निर्माण बुन्देलखण्ड  व ब्रज में कराया।


महाराजा छत्रसाल- सन 1649 से 1734 तक ‘बुन्देलखण्ड केशरी’ वीर छत्रसाल का जन्म घने जंगल के बीच मोर पहाड़ी के एक कन्दरा में हुआ था इसके पिता महाराजा चम्पत राय और माता उनकी तृतीय पत्नी वीरागना रानी सारन्धा थी। छत्रसाल का बचपन अपने मामा के यहाँ दैलवारा में बीता, शिक्षा महोबा में हुइ छत्रसाल का अधिकतर समय अपने पिता के साथ जंगल की लड़ाइयो के बीच वीभत्स दृश्य देखने में व्यतीत होता था जिससे यह किंचित मात्र भी भयभीत नही होते थे। इनकी तेज पूर्ण मुद्वा शब्दभेदी बाणो की टकरहाट युक्त कौटुकता जताती बाललीला उत्तम व्यवहार व जन्मजात गुण देखकर पिता को परम हर्ष व विस्मय होता था। इनके गुण देखकर माता सारन्धा ने इनका नाम छत्ता अथवा छत्रसाल रखा था। माता पिता की मृत्यु के पश्चात ये अपने बड़े भाई अंगदराय के पास देवगढ़ आ गये। वहां से दोनो भाइयो ने मिलकर अपने विरोधियो से बदला लेने का विचार किया और स्थिति को सुधारने और सुदृढ़ बनाने को कटिबध्य हो गये और भारत को यवन सत्ता से मुक्त कराने की ठानी। इसके बाद हर युद्व में मुगलो को छत्रसाल से मात खानी पड़ी, यहाँ तक कि पन्ना के युद्व में औरंगजेब ने माफी माँगी। छत्रसाल की 19 रानियाँ और 52 पुत्रों का वर्णन मिलता है जिसमें 40 (चालीस) पुत्रो को युद्व में वीगति प्राप्त हुई। छत्रसाल के नाम से ही ‘छतरपुर’ नगर बसा है। उनका राज्य चम्बल नदी से होकर दक्षिण में नर्मदा तक, पूर्व में टोस नदी तक और उत्तर में जमुना नदी तक था।
वीरोत्तमा रानी लक्ष्मीबाई- जन्म 1835 मृत्यु 1858, 
1857 का महायुद्व जो जनता द्वारा वीरांगना झाँसी रानी लक्ष्मीबाई के कुशल सेना नायकत्व में अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाने के लिये लड़ा गया था, जिसमें समाज के सभी वर्गो और जातियों की समान साझेदारी थी। झाँसी की रक्ष के लिये ओरछा के दीवान ‘नत्थेखाँ’ से युद्व’ जिसमे वह पराजित होकर इन्दौर भाग गया था। फिर रानी का अंग्रेजी सेनाओं से युद्वा हुआ और अंग्रेजो ने उनके महानायक अलौकिक व्यक्तित्व का लोहा माना था और प्रशंसा करते हुये कहा था ‘‘शत्रुदल की ओर का सबसे उत्तम पुरुष यदि कोई है तो झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई है।’’ ‘मै अपनी झाँसी नही दूँगी’ और ‘सुराज के लिये लड़िवो चाहिये’ की प्रेरक झाँसी रानी के जन्म से लेकर अन्त तक उनका उत्कृष्ट जीवन, वीरत्व, राष्ट्रीय भावनात्मक एकता, जनता के प्रति अगान्ध प्रेम, देश स्वतन्त्रता की आकृष्ट भावना की प्रेरणादायिनी, समरांगन में अपनी तलवार से अंग्रेजो में दहशत पैदा कर भीरुओं मे शक्ति पैदा कर स्त्री समाज का भाल ऊँचा करने वाली, काशीबाई, सुन्दस्मुन्दर  की प्राणप्रिय सहेली, आन-बान और शान की न मिटने वाली ज्योति की चमक थी- झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई।
रानी दुर्गावती- विवाह सन् 1543
माना जाता है कि रानी दुर्गावती, शौर्य, पराक्रम, जनहित चिन्तन कठिनाइयों के सामने सिर न झुकाना, सशक्त मनोबल की धनी थी। वे अकबर की एक बड़ी सेना के साथ लड़ी थी और कई बार उनकी सेना के दाँत खट्टे किये थे। मांडू के राजबहादुर को सभी लड़ाईयो में हराया था। सभी युद्वा का नायकत्व अत्यन्त वीरता से करते हुये उन्होने अपने प्राण त्याग दिये, पर अपने स्वाभिमान और संस्कृति पर छीटा नही पड़ने दिया। दुर्गावती का जन्म महोबा में हुआ था, इनके पिता का नाम कीर्ति सिंह था, जो कलिंजर के राजा थे। कलिंजर के युद्व में ही शेरशाह सूरी के द्वारा कीर्तिसिंह का वध हुआ और फिर खुद भी मारा गया। दुर्गावती अति सुन्दर थी, उसने गोंडवाने के दलपतिशाह से विवाह किया था, जो राजगोंड जाति का था। दुर्गावती के तीर और बंदूक का निशाना अचूक था, वह शेर के शिकार की शौकीन थी। दुर्गावती चन्देलो की बेटी थी। दुर्गावती से विवाह होने के चार वर्ष के उपरान्त ही दलपति शाह का देहान्त हुआ, तब उनका पुत्र वीर नरायण तीन वर्ष का था। पति के देहान्त के बाद दुर्गावती ने गोंडवाना राज्य को सुव्यवस्थित किया, बाजबहादुर को हराया और विदेशी शासकों से लोहा लेती रही। मालवा के सुल्तान बहादुर को कई बार हराया। रानी दुर्गावती ने जनहित में अनेको तालो का निर्माण कराया।
 दुर्गावती की समाधि एक उज्जवल कीर्ति का स्मारक है। वही निकट दुर्गावती के हाथी ‘सरमन’ और महावत ‘गनू’ की भी भूमिगत समाधि है, दोनो अमर हो गये। धन्य है देवी दुर्गावती की दृढ़ता। 
श्री मित्र मिश्र - सन्ः 1609 से सन्ः 1694 तक
उनके पिता का नाम दामोदर दास मिश्र था, जो आचार्य केशवदास के पिता के सहोदर भ्राता थे। इस प्रकार मिश्र एवं आचार्य एक ही वृक्ष के दो सुमन थे। इनका जन्म मिथिला में हुआ था। अतः मिथिलापुर के महाराजा उदयजीत सिंह बुन्देला के दरबार में तत्पश्चात महाराज  वीर सिंह जू देव (प्रथम) ओरछा के दरबार में रहे। यह चैखम्भा बनारस में स्वर्गवासी हुये। इन्होने ‘वीर मित्रोदय’ नामक संस्कृति ग्रन्थ विश्व कोण की रचना की जिसमें पाँच लाख श्लोक हैं।
आचार्य कवीन्द्र केशव- सन् 1555 से सन् 1617 तक 
कवीन्द्र केशव की कवित्त शक्ति इतनी अनूठी और उपज इतनी उत्तम और समयानुसार होती थी कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे। आप संस्कृत साहित्य के पूर्ण मर्मज्ञ थे। कविता की उत्तमता के कारण जितना मान केशव का हुआ उतना किसी और कवि का नहीं। पुरातन विचारों की छटा, प्राचीन संस्कृत कवियों के भाव केशव की कविता में ही दिखाई पड़ते है, अन्य भाषा के कवियो में नही। ओरछाधीश महाराज मधुकरशाह की मैत्री अकबर से थी, जिसके कारण राज्य पन्डित होते हुये भी बहुधा अकबर की राज्यसभा में जाना-आना केशव का होता था। केशवदास की रचनायें निम्न है- सर्वप्रथम ग्रन्थ ‘रसिक प्रिया’, दूसरा ‘रामचन्द्रिका’ जो सम्पूर्ण रामायण स्वरुप है, फिर कविप्रिया , विज्ञान गीता, वीरसिंह देव चरित, रतन वावनी, नखशिख छन्दमाला, बारहमासी, बटुक सप्तक आदि। कविवर बिहारी दास जी आपके ही सुपुत्र थे, जिन्होने ‘बिहारी सतसई’ ग्रन्थ की रचना की।
 कहते है अकबर का सूरदासजी से विशेष सम्बन्ध था क्योकि उनके पिता बाबा रामदासजी अकबर के प्रधान पुरुष खानखाना की मैत्री से प्रेरित होकर महात्मा तुलसीदास ने भी अकबर को दर्शन दिये थे। कहते है कि एक समय मणिकर्णिका घाट के निकट काव्य साहित्य के आचार्य के संगम से सजीव त्रिवेणी का दृश्य दिखाई दिया अकबर को त्रिवेणी तरंगित होकर काव्य हिलोरे लेने लगी, अभूतपूर्व आनन्द बरस उठा। अनायास सम्राट बोले तीन महान कवियो (सूरदास, तुलसीदास, केशवदास) में निश्चय करना है कि वास्तव में कवि कौन है ? केशव ने तीन बार उत्तर दिया ‘मै’। अकबर को दुख हुआ कि यह प्रश्न करके मैने दोनों महात्माओं का अपमान किया। उनके खिन्न देखकर केशवदास जी ने समझाया कि ये दोनो   देव कोटि के पुरुष अवतारी महात्मा है। सूरदास जी भगवान श्री कृष्ण के बाल सखा उद्ववजी के अवतार है और तुलसीदास जी रामचन्द्र से भी पूजित महर्षि बाल्मीकि के अवतार है। मैं केवल ‘कविमात्र’ हूँ, ये तो पूज्नीय देवता हैं, मैं इनकी प्रतिष्ठा कम नही कर सकता। केशव की इस अनूठी युक्ति और समाधान को सुनकर सम्राट गद्गद् हो गये ।केशव का वास्तव में काव्य पर जन्मसिद्व अधिकार था।
वीर बुन्देला दिमान हरदौल जी - सन्ः 1665 से सन्ः 1688 तक
इतिहास साक्षी है कि जब जब किसी दुष्ट शासक ने हिन्दू समाज और धर्म पर अत्याचार किया है, उसका प्रबल विरोध हुआ है। देव तुल्य अमर शहीद महान क्रान्तिकारी, स्वतन्त्रता सेनानी, स्वतन्त्रता अभिलाषी वीर हरदौल ने मुगलो की इस चुनौती को स्वीकार किया। उनके महान त्याग और वीरता के कारण ही उस संकट काल में हिन्दूसमाज और धर्म की रक्षा हो सकी। उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व दुर्लभ गुणो से युक्त, निष्कलंक, निर्मल चरित्र प्रशंसनीय और अनुकरणीय था। वह कुशल योद्वा, सेनानायक और उदार होते हुये भी दृढ़ व्यक्ति थे। एक बार जंगल में शेर का शिकार करने गये थे, शेर ने आक्रमण कर दिया, तो शेर को मार डाला था। हरदौल की सेना में प्रवेश पाने के लिये किसी जाति धर्म पर रोक नही थी। कहते है उनके बड़े भाई जुझार सिंह ने अपनी रानी चम्पावती पर झूठा कलंक लगाकर रानी द्वारा भोजन में जहर देकर मरवा डाला था, उस अकाल मृत्यु के समय हरदौल की उम्र 23 वर्ष की थी। अपनी बहन कुन्जावती की पुत्री की शादी में हरदौल ने मृत्यु के पश्चात भी देवतुल्य रुप धारण कर भात दिया था।  इसी से आज भी बुन्देलखण्ड में सभी लोग हरदौल को निमन्त्रण देते है। हरदौल की शादी हिमांचल कुँवरि के साथ हुई थी, जिससे एक पुत्र पैदा हुआ था, जिनका नाम विजय सिंह था, वह चार माह का था, जब हरदौल की मृत्यु हुयी। इसके बाद विजय सिंह अपने चाचा अर्थात हरदौल के बड़े भ्राता भगवानराम दतिया के महाराज के पास रहे।
राय प्रवीन सन्ः 1685 से 1744 तक 
महाराजा इन्द्रजीत के यहाँ छः नर्तकी थी, जिसमें रायप्रवीन बड़ी ही सुन्दरी और कविता में निपुण थी। उसकी सुन्दरता की प्रशंसा सुनकर एक बार सम्राट अकबर ने बुला भेजा। कहते है कि जब रायप्रवीन ने जाने से मना कर दिया तो बादशाह ने इन्द्रजीत  पर एक करोड़ का जुर्माना कर दिया, जिसे केशवदास जी ने आगरे जाकर बीरबल द्वारा जुर्माना माफ करवाया। 
 जब अकबर ने पुनः आगरा बुलाने का आदेश दिया तो इन्द्रजीत की सहमति से रायप्रवीन दरबार में उपस्थित हुई और अकबर को फटकारते हुये कहा कि ‘झूठी पत्तल नीच ही स्वीकार करते है।’ मुगल सम्राट ने उसके पतिव्रत से प्रसन्न होकर अपनी जननी जन्म भूमि के सम्मान के प्रति दृढ़ आस्था रखने वाली इस कवियत्री रायप्रवीन के आदर सहित ओरछा भेजना मंजूर किया। 


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