जिसने कभी न झुकना सीखा उसका नाम मुलायम है


जिसने कभी न झुकना सीखा उसका नाम मुलायम है। यह नारा आकाश में गूजता है तो उत्तर प्रदेश के ठेठ गाँव सेफई के धूल भरे अखाड़े में पहलवानी करते-करते दिल्ली मंें दमदारी के साथ आम आदमी की बात करने का साहस दिखाने वाले माननीय श्री मुलायम सिंह यादव कहते है कि ताकत और साहस समाजवादियों के अलावा किसी के पास शेष नही है। यह बात उस दौर को याद दिलाती है जब भारत में आपतकाल लगा हुआ था। पूरे देश में लोकनायक जयप्रकाश के आवाहन पर सम्पूर्ण क्रान्ति के सिद्धान्त ने देश का मन बदल दिया था। उस दौर में युवा, तेजस्वी, धरती से जुड़े व्यक्ति के रूप में तेजी के साथ उभर रहे युवा नेता के रूप में नेता जी से अनेक अवसरों पर मुलाकात का सिलसिला शुरू हुआ था। जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आदरणीय श्री चन्द्रशेखर जी के साथ कदम से कदम मिलाते गांधी और लोहिया की धर्मनिपेक्षता के साथ उत्तर प्रदेश में जनजागरण के अभियान की कमान संभाल रखे थे। समाजवादी पार्टी ने महँगाई रोकने के लिए डा0 राम मनोहर लोहिया की दाम बाधों नीति पर अमल लाने। युवाओं से साम्प्रदायिक शक्तियों को मुंहतोड़ जवाब देने जैसे नारो के साथ संघर्ष की राह चुनी थी। 4-5 नवम्बर 1992 को लखनऊ में श्री मुलायम सिंह यादव का अध्यक्षीय भाषण गौरतलब है- समाजवादी साथियों, लखनऊ की इस सर जमीन पर जो सदियों से भाईचारा, आपसी सहयोग, एक साथ मिलकर रहने की परम्पा तथा आजदी, आत्म सम्मान और इन्साफ के लिए मर मिटने की तबीयत के लिए इतिहास में मशहूर रही है, भारत के कोने-कोने से आये समाजवादी साथियों का स्वागत करते हुए मुझे खुशी हो रही है। 
मर्यादा पुरूषोत्तम राम की अयोध्या से मिला यह शहर राम राज्य की कल्पना को हमेशा साकार करता रहा है जहां आदमी को आदमी की शक्ल में देखा जाता रहा है। अवध के नवाबों ने भी वही कल्चर अपना कर यह साबित कर दिया था कि भारत का यह हिस्सा, उन संस्कुचित विचारधाराओं से बहुत आगे है जो सजहबों उन्माद या अलगाववाद के प्रतीक है। 
यही कारण था कि साहित्य, कला, संगीत, नाटक और चिन्तन का यही लगातार विकास होता रहा जिसके फलस्वरूप जो गंगा, जमुनी जो गंगा, जमुनी तहजीब यही पनपी वह आज भी सारे देश में, उस काले माहौल को काटने छांटने का प्रयास कर रही है जो आदमी को छोटा और संकीर्ण बनाना चाहता है।
1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में, हिन्दू और मुसलमानों द्वारा एक साथ, एक जुट हो कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की दास्तान को पढ़कर रोमांच हो आता है, तांत्या टोपे, बेगम हजरत महल और झंासी की रानी, भारत के उस दिल की धड़कन की गुनगुनाहट है जिन्हें राष्ट्रीयता, आजादी और आत्म सम्मान के लिए श्हादत देने के लिए सदैव याद किया जायगा। 
ऐसी धरती पर आज भार के समाजवादी लगभी 20 वर्ष बाद समाजवाद के नाम पर एक फिर इकट्ठे हुए है। यह गुजरे हुए 15-20 साल भरत के इतिहास के बड़े ही खट्टे मीठे साल थे। 1977 में लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आवाहन पर जनता पार्टी बनी थी। हमने उस लाल झण्डे को, जिसको लेकर हमारे नेता जय प्रकाश, नरेन्द्र देव, डा0 राम मनोहर लोहिया, यूसुफ मेहर अली जैसे लोगों ने समता वाले समाज की रचना के लिये जन आन्दोलन चलाये थे, जनता पार्टी को सौप दिया था। हम राजनीति सिर्फ सत्ताा प्राप्त करने के लिये नही करते हैं। हमारा लक्ष्य है, सत्ता हासिल करके जनहित में उस व्यवस्था को बदलें जिससे गरीब को रोटी, बेकार का काम और राष्ट्र को सम्मान हासिल हो। 
जनता पार्टी जब बनी थी हमारा मन साफ था। हमने बड़ी ईमानदारी से इस पार्टी को जन जन तक पहुचाने का काम किया। सोशलिस्टों का जनहित में लगातार संघर्ष और डा0 लोहिया के विचार ही जन मानस को बदलने की भूमिका रही है। हमें याद है जब 1962 में डा0 लोहिया भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से फूलपुर के संसदीय क्षेत्र के चुनाव में जाकर टकराये  थे, उस समदेश में एक नई लहर का आगमन हुआ था। लोहिया ने उस चुनाव में कहा था कि मैं एक चट्टान से टकरा रहा हूॅ। मैं जनता हूॅ चट्टान को तोड़ नही पाऊंगा लेकिन उसको चटका जरूर दूंगा। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार, कांग्रेस को हरा कर बनी थी, वह लोहिया के उस अभियन का नतीजा था जो 1962 मे उन्होंने शुरू किया था। जनता पार्टी जब बनी थी उस समय उसमें ऐसे दल भी थे जो सोशलिस्ट पार्टी को छोड़कर कांगे्रस में जा मिले थे। एक ऐसा दल भी जनता पार्टी में आकर मिल गया था जिसके सोच का नतीजा, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या थी। हमने उन पर भी यकीन किया था, क्योंकि हमारा मानना रहा है कि भूल आदमी ही करता है और उसे सुधरने और अपने को सुधारने का मौका मिलना चाहिये। नेता जी हमेशा डा0 लोहिया की इन पंक्तियों को कोड करते हैं- ‘‘ इतिहास अतीत का बोध है। अगर हमने अपने अतीत को ठीक से जाना और पहचाना नहीं तो हमारा देश कभी भी एक अच्छा और सुखी राष्ट्र नहीं हो पायेगा। हमारे विश्व विद्यालयों समेत शिक्षण संस्थानों में इतिहास के पठन-पाठन में महत्वपूर्ण सुधार लाने की कोशिश की जानी चाहिए।’’  इस कथन के प्रति श्रद्धानत नेता जी ने सदैव मानवीय मूल्यों और लोकतंत्रीय परम्पराओं का पालन करने हेतु सजग और सचेन युवा नेतृत्व को तैयार करने में रूचि ली है। उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य से लेकर समाजवादी पार्टी में आने के सफर के दौरान मुझे अनेको बार समाजवादी सोच के प्रज्ञा पुरूष श्री मुलायम सिंह यादव के साथ कार्य करने का अवसर मिला। सामाजिक संतुलन, वंचित वर्गो को उनकी सामाजिक व आर्थिक प्रगति का पर्याप्त अवसर कैसे मिले इस दिशा में हमेशा चिन्तनशील आज भी बने रहते है। किसानों को खाद, बिजली और पानी की उपलब्धता समय पर सुनिश्चित हो रही है इस की जानकारी गाहे बगाहे लेते रहते है। नया मुहावरा गढ़ने बाले अजातशत्रु मुलायम सिंह यादव के 82वें जन्म दिवस पर शत् शत् अभिनन्दन करते है।


लेखक- उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष है।


यह आलेख शतरंग टाइम्स के नवंबर 2014 अंक में प्रकाशित हो चुका है।


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