कार्तिक मास के कृष्‍ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ मनाए जाने की परंपरा

कोविड-19 के बावजूद बाजारों में लौटी रौनक



ललितपुर।
करवा चौथ को लेकर बाजार में रौनक़ दिखने लगी है। करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण होता है इस व्रत का महिलाओं को साल भर इंतजार रहता है। इस साल करवा चौथ का व्रत 17 अक्‍टूबर को मनाए जाने की तैयारी है। कार्तिक मास के कृष्‍ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ के रूप में मनाए जाने की परंपरा है। महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखकर पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। यह व्रत सुबह सूर्योदय से शुरू होता है और शाम को चांद निकलने तक रखा जाता है। शाम को चांद का दीदार करके अर्ध्य अर्पित करने के बाद पति के हाथ से पानी पीकर महिलाएं अपना व्रत तोड़ती हैं। इस दिन चतुर्थी माता और गणेशजी की भी पूजा की जाती है। आइए जानते हैं इस व्रत से जुड़ी अन्‍य खास बातें कुछ इस प्रकार हैं।


करवा चौथ के ब्रत का महाभारत काल से है संबंध है। करवाचौथ की सबसे पहले शुरुआत प्राचीन काल में सावित्री की पतिव्रता धर्म से हुई। सावित्री ने अपने पति मृत्‍यु हो जाने पर भी यमराज को उन्‍हें अपने साथ नहीं ले जाने दिया और अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा से पति को फिर से प्राप्‍त किया। दूसरी कहानी पांडवों की पत्‍नी द्रौपदी की है। वनवास काल में अर्जुन तपस्‍या करने नीलगिरि के पर्वत पर चले गए थे। द्रौपदी ने अुर्जन की जान बचाने के लिए अपने भाई भगवान कृष्‍ण से मदद मांगी। उन्‍होंने पति की रक्षा के लिए द्रौपदी से वैसा ही उपवास रखने को कहा जैसा माता पार्वती ने भगवान शिव की रक्षा के लिए रखा था। द्रौपदी ने ऐसा ही किया और कुछ ही समय के पश्‍चात अर्जुन वापस सुरक्षित लौट आए।
करवा चौथ का त्‍योहार कार्तिक मास के कृष्‍ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। करवा का अर्थ है मिट्टी का पात्र और चौथ का अर्थ चतुर्थी का दिन। इस महिलाएं नया करवा खरीदकर लाती हैं उसे और उसे सुंदर तरीके से सजाती हैं। करवा चौथ के दिन इसे व्रती महिलाएं अन्‍य महिलाओं के साथ बदलती हैं।
करवा चौथ का शुभ महुर्त 4 नवम्बर 2020 को 3 बजकर 24 मिनट से करवाचौथ व्रत का शुभ मूहूर्त प्रारम्भ हो जाता है। शाम 5 बजकर 29 मिनट से 6 बजकर 48 मिनट के बीच पूजा का विशेष महत्व है। चन्द्रोदय 8 बजकर 16 मिनट पर चन्द्रमा का उदय होगा। इसी समय चन्द्रमा का दर्शन करके पति के हाथों निवाला करके पति के चरणों को स्पर्श करके आशीर्वाद लेना चाहिए। चन्द्रमा के सामने यह प्रक्रिया पूरी होने से चन्द्र देव का भी  आशीर्वाद मिल जाता हैं।
करवा चौथ के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले जागकर सरगी खाकर व्रत की शुरुआत करती हैं। मिठाई, फल और मेवे होते हैं, जो उनकी सास उन्‍हें देती हैं। उसके बाद महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं। उसके बाद शाम को छलनी से चांद देखकर और पति की आरती उतारकर अपना व्रत खोलती हैं। अधिकांश घरों में पति अपनी पत्‍नी को पानी पिलाकर उनका व्रत तोड़वाते हैं।


व्रत की कथा- प्राचीन काल में एक ब्राह्मण के चार बेटे और एक बेटी थी। चारों भाई अपनी बहन को बहुत प्रेम करते थे और उसका छोटा-सा कष्ट भी उन्हें बहुत बड़ा लगता था। ब्राह्मण की बेटी का विवाह होने पर एक बार वह जब मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी।भाइयों से बहन को भूखा-प्यासा देखकर रहा ना गया और उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया। एक भाई पीपल के पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी छितरा दी। तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दी- देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण कर लो। बहन ने ऐसा ही किया। भोजन करते ही उसे पति की मृत्यु का समाचार मिला। अब वह दुःखी हो विलाप करने लगी। उस समय वहां से रानी इंद्राणी निकल रही थीं! उनसे उसका दुःख न देखा गया! वह विलाप करती हुई ब्राह्मण कन्या के पास गई। तब ब्राह्मण कन्या ने अपने इस दुःख कर्म पूछा, तब इंद्राणी ने कहा ! तुमने बिना चंद्रदर्शन किए ही करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसीलिए यह कष्ट मिला। अब तुम वर्षभर में आनेवाली चतुर्थी तिथि का व्रत नियमपूर्वक करने का संकल्प लो तो तुम्हारे पति जीवित हो जाएंगे! ब्रहामण कन्या ने रानी इंद्राणी के कहे अनुसार चौथ के व्रत का संकल्प किया। इस पर उसका पति जीवित हो उठा और वह पुनः सौभाग्यवती हो गई। इसलिए प्रत्येक स्त्री को अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करना चाहिए।


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