कठिन दौर मे बुन्देली की अलख जगाने वाला नौजवान

कठिन दौर मे बुन्देली की अलख जगाने वाला नौजवान 

शीषर्क पढ़ने के बाद पाठको को थोड़ी देर के लिए अटपटा लगा हो लेकिन सच यही है कि कैलाश मडवैया जी के लिए नौजवान निरूपित किए बिना मनाकूल अभीष्ट पूरा नहीं हो सकता है ।जिस शख्स के साथ आपका कई दशको का करीबी रिश्ता रहा हो, उसके बारे में लिखना सचमुच कठिन होता है ।

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बुन्देली की खुलती  खिड़की को देखो तो ये सब तुमसे कह डालूँ,इसके पीछे एक व्यक्ति, एक योद्धा, एक सिपाही साधक के रूप मे पिछले कई दशको से सतत सृजन से लेकर विस्तार आयोजन तक डूबा है । वे है हम सबके स्नेही अग्रज कैलाश मडवैया जी जिन्होंने   हम सब की मातृ भाषा बुन्देली के संरक्षण, संर्वधन एवं अनुरक्षण का कठिन कार्य में अपने जीवन की सारी उर्जा लगा डाली, मातृ भाषा बुन्देली    को सदानीरा बनाने के लिए चरणबद्व कार्य योजना तैयार कर ऐसी लगन लगाई कि  कभी बुन्देलखण्ड के राज्य की भाषा को उसके अतीत के गौरव को हासिल कर ले।भोपाल ,लखनऊ, दिल्ली, मुंबई में रहवासी बुन्देली जनो को न्यौत -न्यौत कर मातृभाषा के प्रेम से ऐसा बाधा,  बिन बाँधे बुन्देली भाषा के बंधन में सब  बधते  चले गये अनुराग  में । इस  अनुराग के  शिल्पकार को अनदेखा नहीं किया जा सकता है ।सौभाग्य से मेरी जन्मभूमि ललितपुर  को गौरवान्वित करने वाले मडवैया जी को पहली बार वर्णी जयन्ती पर घंटाघर पर होने वाले कवि सम्मेलन में 1857 की क्रान्ति की नायिका रानी लक्ष्मीबाई के अनन सहयोगी बने बानपुर नरेश महाराज मर्दन सिंह की वीरगाथा सुनाई तो मुझसे रहा नहीं गया और मडवैया जी से मिलने मंच पर पहुंच गया ।बिना लाग लपैट ऐसे लिपटा की मोहपााश में बध गया । बनावटी जीवन के प्रति चेताते कवि  कैलाश मडवैया   की वाणी  ने सर्व प्रथम  उन दिनों की यादों को साझा किया जब  ललितपुर हवा  में कायम कविता बेला की लड़ी इस तरह पिरोदी गयी थी जिसकी कल्पना आज करना कठिन  हरि,जलज,तन्मय, विरही न जाने कविता की कितनी तिरही   कविता की तुरही बजा रही थी  । उन दिनो  बुन्देली बोलने बाले को दुत्कार डाला जाता था  तब मेरे मन में आया कि आज नहीं तो कल बुन्देली के सामने भी संस्कृत जैसा खतरा उत्पन्न हो जाएगा। बुन्देली  हमारे भविष्य की सबसे बेहतरीन पथ प्रदर्शक है।    उन्होंने करीबी रिश्तों की उधेड़बुन और जिंदगी जीने की भरपूर चाह के बीच उलझते बुन्देली भाषा के बारीक रेशों को सुलझाने और उन्हें परस्पर जोड़ने का सार्थक प्रयास किया है। लोग कहते हैं कि होनहार बिरबान के होत चिकने पात, वे शायद इन्हीं कवि  कैलाश मडवैया के लिए कहा गया है।

 हिन्दी के विकास के लिए काम करने की अनंत संभावनाएं हैं, जिस पर काम होना अभी शेष है। सिर्फ संस्था खोलने से काम नहीं चलेगा बल्कि उस संस्था को मजबूती देने के विजन के साथ काम करना होगा। महात्मा गांधी भी हिन्दी के प्रबल समर्थक थे लेकिन उनका मानना था कि हिन्दी का उद्देश्य यह नहीं है कि वो प्रांतीय भाषाओं की जगह ले ले। वह अतिरिक्त भाषा होगी और अंतरप्रांतीय संपर्क के काम आएगी। लेकिन आजादी के दशकों बाद तक ऐसा हो नहीं पाया और ऐसा माहौल बना दिया कि हिन्दी अगर हमारे देश की भाषा बन गई तो अन्य भारतीय भाषाएं खत्म हो जाएंगी।   बुन्देली भाषा के सम्मेलन इस बात के गवाह हैं।   सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।     वक़्त सबको मिलता है जिंदगी बदलने के लिये, पर जिंदगी दोबारा नहीं मिलती वक़्त बदलने के लिये।






चंद दास्तानें हो तो उनमें से एक दो रख दिया सबके सामने पर यहां तो सबसे बड़ी बात यह है कि एक करवट के भीतर झांककर उस वक्त के सांस्कृतिक ब्यौरों और लोक सेवा की खोज तक ही सीमित है ।बुन्देली के प्रथम यात्रावृत्त साहित्यकार कैलाश मडवैया की गति बाहरी तथ्य और निजी सत्य की कसौटी पर कसना मेरा कर्म नही अपितु बुन्देली भाषा के सर्जनात्मक रूप की उपेक्षा और अनदेखी पर जिन्दादिली के साथ अतीत के गौरवशाली इतिहास को पुर्नस्थापन है ।

 

 

 


 



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