लोकतंत्र की भाषा- जनभाषा

भारत में भाषा का विवाद बड़ा गंभीर रहा है। भाषा विवाद ने वास्तविक रूप से एक देश के रूप में हमें सदैव ही कमजोर किया है। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय देशभक्ति के ज्वार के आगे भाषा विवाद नहीं उभरा उसका कारण यह था कि उस समय एक ही ध्येय था- स्वतंत्रता प्राप्त करना। यदि उस समय यह विवाद उभरा होता तो निसन्देह हम स्वतंत्र नहीं होते। अंग्रेजी के प्रयोग से भारत की जनता को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना संभव नहीं हो पाता। उस समय के सभी नेता जनता को जनता की भाषा में ही संबोधित करते थे। उस समय के सभी प्रमुख नेता हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के समर्थक थे। वे जानते थे कि लोकतंत्र का मूल यह है कि देश का शासकीय कामकाज बहुसंख्यकों द्वारा बोली व समझी जाने वाली भाषा में हो। यही देश के विकास के लिए आवश्यक भी है। लोकतंत्र का आशय केवल मताधिकार का प्रयोग करके राजनीतिक सत्ता का चुनाव कर देना मात्र नहीं होता। लोकतंत्र एक जीवन पद्धति है जो समस्त राष्ट्र को संचालित व अनुप्राणित करती है। लोकतंत्र जनता का शासन होता है, जनता के लिए होता है और जनता द्वारा होता है। अतः निसन्देह उसे जनभाषा में ही होना चाहिए।
 जनतंत्र का आशय जनता के द्वारा निर्मित तंत्र से लिया जाता है। जनता अपने तंत्र का निर्माण अपनी भाषा में ही करेगी ना। जनता द्वारा बनाये गये तंत्र को तो जनभाषा में ही कार्य करना चाहिए। बात जब जनभाषा की आती है तो भारत के बहुभाषा-भाषी देश होने के कारण यह बात उठती है कि भारत की कौन सी भाषा को जनभाषा के रूप में राजभाषा का दर्जा मिले? निःसन्देह यह विचार-विमर्श का गंभीर विषय है। इस पर वाद-विवाद व मत विभिन्नता भी हो सकती है किंतु यह सर्वस्वीकृत व विवाद रहित विषय है कि अंग्रेजी भारत के किसी भी प्रदेश के किसी भी समुदाय की मातृभाषा नहीं है। अंग्रेजी भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं में भी नहीं है। अतः अंग्रेजी भारत के किसी भी प्रदेश की जनभाषा नहीं हो सकती। इसके बाबजूद अंग्रेजी मेघालय, मिजोरम व नागालैण्ड की राजभाषा बनाई गयी है। यद्यपि यह इन राज्यों के किसी भी समुदाय की मातृभाषा नहीं है। किसी भी समुदाय की मातृभाषा न होने के बाबजूद अंग्रेजी को राजभाषा घोषित करना? क्या कहा जाय, समझ से बाहर है। इस प्रकार अंग्रेजी का राजभाषा होने का आशय है कि भारत अभी भी अंग्रेजों की श्रेष्ठता की मानसिक गुलामी से आजाद नहीं हो सका है। अंग्रेजी किसी भी भारतीय प्रदेश की जनभाषा नहीं है। अतः अंग्रेजी का राजभाषा के रूप में कार्य करने का आशय जनतंत्र को नकारना है, क्योंकि जनतंत्र का मूल आधार ही जनता के लिए जनता द्वारा जनता के बनाये हुए तंत्र द्वारा जनभाषा में व्यवस्था का संचालन है।
 जब हम जनभाषा की बात करते हैं। हमें ध्यान में रखना होगा कि भारत जैसे बहुभाषा-भाषी देश में किसी भी भाषा पर सर्व-सम्मति बनना, मुश्किल ही नहीं असम्भव कार्य है। ऐसी स्थिति में हमें बहुसंख्यक जनता की सुविधा व सहूलियत का ही नहीं समस्त जनता के हितों का ध्यान रखना होगा। समस्त जनता के की सहूलियत का ध्यान रखने के लिए जनता की भाषा में ही राजकाज का संचालन होना चाहिए। केन्द्रीय सत्ता को निर्विवाद रूप से हिंदी को राजकाज की भाषा बना लेना चाहिए क्योंकि हिंदी ही भारत के बहुसंख्यक समुदाय की भाषा है। हाँ! जनता की सुविधानुसार हिंदी भाषा-भाषी राज्यों से इतर प्रदेशों में वहाँ की जनता को राजभाषा हिंदी को समझने व कामकाज करने में समर्थ व सक्षम बनाने के प्रयत्न करते रहने की भी आवश्यकता है किंतु जनता को भाषा के कारण किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। अतः उनकी स्थानीय भाषा में भी आवेदन पत्र व प्रार्थना पत्र स्वीकार किए जाने चाहिए। आवश्यकतानुसार उन्हें उनकी भाषा में ही अभिलेख प्रदान करने की सुविधा प्रदान करने की व्यवस्था करना भी जनतंत्र की आवश्यकता है। 
 जब हम भारत के प्रदेशों की बात करते हैं तो भारत में 29 राज्य व 7 संघ शासित क्षेत्र हैं। भारत के बहुसंख्यक राज्यों में हिंदी बोली जाती है। हिंदी को समझने वाले प्रदेशों की संख्या इससे भी अधिक है। हिंदी भाषी राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, अरूणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड, झारखण्ड, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, अण्डमान व निकोबार द्वीप समूह, चंडीगढ़ की जनसंख्या को ही ध्यान में रखें तो बहुसंख्यक जनता की भाषा होने के कारण हिंदी ही भारत की जनभाषा है। हिंदी भाषी राज्यों के अतिरिक्त अनेक राज्यों की द्वितीय राजभाषा के रूप में भी हिंदी को स्वीकार किया जाता है। गुजराती, मराठी और पंजाबी जैसी भाषाएं हिंदी के निकट हैं और इनके बोलने वाले हिंदी को भी आसानी से समझते हैं। अतः हिंदी में राजकाज का संचालन करके हम लोकतंत्र की भाषा में राजकाज करने के गौरव से गौरवान्वित हो सकते हैं। इसके बाबजूद प्रदेश की सरकारों को अपने-अपने प्रदेश की जनता की सुविधा को ध्यान में रखकर ही अपने प्रदेश की राजभाषा स्वीकार करनी चाहिए। हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देते हुए भी हिंदीतर भाषी राज्यों में राजकाज उन प्रदेशों की जनभाषा में ही चलाया जाना चाहिए। भारतीय संविधान भी सभी राज्यों को पृथक-पृथम राजभाषा घोषित करने का अधिकार प्रदान करता है।  
 लोकतंत्र में प्रभुसत्ता सरकार के पास नहीं होती, वरन् जनता के पास होती है। यह बात भारतीय संविधान की प्रस्तावना से भी स्पष्ट होती है। प्रस्तावना का प्रारंभ ही ‘‘हम भारत के लोग....’’ से होती है जिसका आशय है कि संविधान को भारत की जनता की ओर से भारत की जनता के लिए स्वीकार किया है। क्या अच्छा होता यदि उसका मूल स्वरूप भी भारत की जनता की भाषा में ही लिखा गया होता। खैर जो हो गया, वो हो गया। हमें यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि जनता ही सम्प्रभु है। अतः शासन के समस्त कार्य जनभाषा में ही होने चाहिए। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने राज-काज की भाषा के लिए कुछ पूर्वापेक्षा प्रस्तुत की थीं, जो अधोलिखित हैं-
1. अमलदारों  के लिए यह भाषा सरल होनी चाहिए।
2. उस भाषा के द्वारा देश का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवहार सुगमता से चल सकना चाहिए।
3. वह भाषा बहुसंख्यकों द्वारा बोली व समझी जाती हो।
4. राष्ट्र के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।
5. उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्प स्थायी स्थिति पर जोर नहीं देना चाहिए।


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का राष्ट्रीय भाषा के सम्बन्ध में स्पष्ट मत था कि भारत की राष्ट्रीय भाषा हिंदी ही हो सकती है। निसन्देह गांधीजी के विचार में हिंदी राष्ट्रीय भाषा के लिए की गयीं पूर्वापेक्षाओं को पूरा करती थी। राष्ट्रीय भाषा से उनका आशय राजभाषा से ही था। गुजराती के महान कवि श्री नर्मद, श्री केशवचन्द सेन, स्वामी दयानन्द सरस्वती ही नहीं मराठी भाषी लोकमान्य बालगंगाधर तिलक भी हिंदी को राजभाषा बनाये जाने के पक्ष में थे। उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से घोषणा की थी कि हिंदी भारत की राजभाषा होगी। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने तो मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री की हैसियत से 1935 में ही हिन्दी की शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था। सुभाष चन्द्र बोस हिन्दी को राजभाषा बनाये जाने के पक्षधर थे। उनके अनुसार प्रांतीय ईष्र्या-द्वेष को दूर करने में जितनी सहायता हिंदी के प्रचार से मिलेगी, उतनी दूसरी चीजों से संभव नहीं। आजाद हिंद सरकार के समय राजभाषा के रूप में उन्होंने हिंदी को ही चुना था। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को उठाकर देखने से पता चलेगा कि हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों में भाषा को लेकर किसी प्रकार की दुविधा की स्थिति नहीं थी। सभी हिंदी को राजभाषा बनाने पर सहमत थे। परिणामस्वरूप 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया, किंतु वहाँ भी एक सूराख छोड़ दिया गया और अंग्रेजी को अगले 15 वर्ष तक राजभाषा के रूप में कार्य करने की छूट दे दी गई। यह छूट ही भाषागत राजनीति का कारण बनी और अंग्रेजी स्थायी रूप से राजभाषा के स्थान पर कब्जा जमाकर बैठ गई। भाषा की राजनीति स्वतंत्रता के बाद शुरू हुई और अंग्रेजीदां नेताओं के हाथ में सत्ता आने के कारण हिंदी वास्तविक रूप से राजभाषा न बन सकी और हम आज भी अंग्रेजी को ढो रहे हैं और अंग्रेजी पढ़ने के अनावश्यक दबाब से हमारी भावी पीढ़ियाँ हलकान हो रही हैं।
हमारे कुछ बंधु अंग्रेजी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा कहकर उसकी वकालत करते हैं। अरे भाई! अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है तो ठीक है। अंतर्राष्ट्रीय कार्य-व्यवहार के लिए जिन लोगों को अंग्रेजी की आवश्यकता पड़ेगी वे आवश्यकतानुसार सीख लेंगे किंतु हम सभी पर उसका भार क्यों डालें। अन्तर्राष्ट्रीयता के नाम पर राष्ट्रीय विकास और गौरव को नजरअन्दाज करना कहाँ की बुद्धिमानी है? अंग्रेजी सिखाने के बोझ तले बच्चों को दबाकर हम उनकी सीखने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को बाधित करना तो किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। हम उनमें अपने देश व अपनी भाषा के प्रति गौरव की भावना का विकास क्यों नहीं होने देते? उनके विकास की गति को बाधित क्यों करते हैं? वास्तविक रूप से किसी भी राष्ट्र का विकास उसकी मूल भाषा में ही हो सकता है। विदेशी भाषा को सीखने के लिए जाया करने वाले संसाधनों को हम ज्ञान-विज्ञान के सीखने व ज्ञान के विकास पर लगा सकते हैं। मूल भाषा में अभिव्यक्ति ही हमें वास्तविक संतुष्टि दे सकती है। राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किए गये विभिन्न अनुसंधानों से यह स्थापित हो चुका है कि प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर बच्चे के स्वाभाविक विकास के लिए माध्यम के रूप में मातृभाषा का होना अनिवार्य है। उसके बाबजूद हम भारतीय भाषाओं को नजरअन्दाज कर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को ही प्रतिष्ठा की नजरों से देखते हैं। हिंदी के प्रसिद्ध कवि भारतेंदु के अनुसार भी हिंदी ही सभी प्रकार की उन्नति का मूल है और बिना अपनी भाषा के ज्ञान के हमारी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है-
निज भाषा  उन्नति अहे, सब  उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को शूल।।


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