महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से ‘रोगों के कारण, उपचार तथा रोकथाम पर समग्र दृष्टिकोण’ विषय पर अमेरिका में हुई अंतरराष्ट्रीय परिषद में शोधनिबंध प्रस्तुत !


मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करनेवाले आध्यात्मिक सूत्रों को आधुनिक चिकित्सा शास्त्र नकारता है; परन्तु आयुर्वेद रोग का निदान एवं उपचार इन दोनों स्तरों पर आध्यात्मिक तथा सूक्ष्म अंगों का विचार करता है । ‘अध्यात्म एवं चिकित्सा शास्त्र को जोडनेवाला सेतु क्या है, इसपर अध्ययन किया जाए, तो क्या रोग निदान, उपचार एवं रोकथाम अधिक प्रभाकारी हो सकती है ?’, इस संदर्भ में श्री. सोमनाथ परमशेट्टी ने अमेरिका में संपन्न हुई अंतरराष्ट्रीय परिषद में शोधनिबंध प्रस्तुत किया । इसमें उन्होंने बताया कि, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय ने पारंपरिक (वैज्ञानिक) तथा अपारंपरिक (सूक्ष्म-ज्ञान) पद्धतियों से किए शोध कार्य से यह स्पष्ट हुआ है कि, अध्यात्म तथा चिकित्सा शास्त्र में सीधा संबंध है ।

    13 से 15 अप्रैल 2018 के बीच सेंट लुई, मिजोरी, अमेरिका में ‘चिकित्सा शास्त्र एवं धर्म’ इस विषय पर हुई अंतरराष्ट्रीय परिषद को हार्वर्ड विश्‍वविद्यालय ने विशेष परिषद का स्थान दिया है । इस परिषद का आयोजन ‘इन्स्टिट्यूट फार स्पिरिच्युएलिटी एन्ड हैल्थ’, टेक्सास मेडिकल सेंटर, ह्युस्टन, अमेरिका’ ने किया था । इस परिषद में ज्यू, ईसाई, मुसलमान, सूफी, बौद्ध एवं हिन्दू धर्म का तत्त्वज्ञान, साधना तथा चमत्कार पर आधारित शोधनिबंध प्रस्तुत किए गए । 14.4.2018 को महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से ‘रोग के कारण, उपचार तथा रोकथाम पर समग्र दृष्टिकोण’ विषय पर महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के प्रणेता परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले और इस विश्‍वविद्यालय के अमेरिका स्थित प्रतिनिधि श्री. सोमनाथ परमशेट्टी द्वारा लिखा शोधनिबंध श्री. सोमनाथ परमशेट्टी ने प्रस्तुत किया ।  


    रोग का निदान एवं उपचार होने हेतु उसकी जड तक जाना अनिवार्य होता है । इस शोध से ज्ञात हुआ है कि रोग होने के शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक ये ३ संभावित कारण हो सकते हैं । कोई भी रोग इनमें से एक अथवा अधिक कारणों से होता है । रोग तथा जीवन की अधिकांश समस्याआें का मूलभूत कारण प्रारब्ध ही होता है । साथ ही अनिष्ट शक्तियां, पूर्वजों के सूक्ष्म देह इत्यादि आध्यात्मिक कारणों से भी त्वचारोग जैसे शारीरिक अथवा व्यसनाधीनता जैसे मानसिक रोग हो सकते हैं । इसलिए डाक्टर को चाहिए कि वे रोगों का निदान करते समय तीनों मूलभूत कारणों को ध्यान में रखे और उसके अनुसार उपचार करें । उदाहरणार्थ किसी रोग का मूल कारण प्रारब्ध अथवा अनिष्ट शक्ति का कष्ट हो, तो शारीरिक एवं मानसिक उपचारों के साथ ही आध्यात्मिक उपचार करना आवश्यक होता है । तभी रोग का पूर्ण निवारण होता है । इसके विपरीत मात्र शारीरिक एवं मानसिक उपचार करने पर रोग के केवल लक्षण दूर होते हैं, ऐसा शोध के अन्त में पाया गया । 

    आध्यात्मिक स्तर पर किए गए उपचारों के अंतर्गत ‘साधना’ अर्थात ‘नित्य उपासना’ सर्वात्तम उपाय है । साधना करने से प्रारब्ध पर विजय प्राप्त करना संभव होता है अथवा उसे सहने की क्षमता व्यक्ति में निर्माण होती है । श्री. परमशेट्टी ने यह भी बताया कि, आध्यात्मिक कारणों से हुए रोगों का आध्यात्मिक उपचार करने से, रोगनिवारण  के सहस्रों उदाहरण महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के शोध विभाग के पास उपलब्ध हैं ।

यह समाचार पुनः प्रकाशित किया गया है दिनांक : 19.4.2018

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