आलेख: बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना•

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  • बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना


-जितेन्द्र जौहर

बचपन से लेकर आज तक मैं जब भी किसी को किसी के लिए किसी भी संदर्भ-प्रसंग में यहकहते हुए सुनता हूँ कि- 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना', तो पता नहीं क्यों मेरा मन, मेरी सोच और मेरी भावना सहसा उस अनदेखे-अनजाने-अनसुने 'अब्दुल्ला' के साथ जाकर जुड़ जाती है- उसकी पक्षधर बनकर, पैरोकार बनकर, पूरी सह-अनुभूति के साथ! 

बचपन में समझ उतनी नहीं थी, तथा पिमन यह सोचने पर मजबूर हो जाता था कि आख़िर यह 'अब्दुल्ला' कौन और कैसा बंदा रहा होगा? उसे अपने मानसिक पटल पर विजुअलाइज़ करने की तमाम कोशिशें करता था।मेरे मन में उसके रूप-स्वरूप, मन-मंशा, नीति-नीयत और आचार-व्यवहार को लेकर तरह-तरह के चित्र बनते-बिगड़ते रहते थे। 

आज एक बार फिर, बातचीत के क्रम में मेरे एक बेहद अज़ीज़ दोस्त ने ख़ुद के लिए यह जुमला/मुहावरा प्रयोग किया, तो पुन: अब्दुल्ला की वो अधबनी-अनबनी मानसिक तस्वीरें मेरे दृष्टि-पटल पर कौंध गयीं।मैं सोचने लगा कि वाकई 'अब्दुल्ला' आला दर्जे की फ़कीराना तबियत का कोई बड़ा मस्त इंसान रहा होगा, ख़ुद में निहायत ख़ुश ! साथ ही, औरों की ख़ुशी में शरीक होने को तत्पर, आहूत-अनाहूत दूसरों के जश्न और जल से में शामिल होने कोब-मसर्रतमौजूद, हरक़िस्मकीछद्मभरीव्यावहारिकबनावटसेदूर, किसीभीओढ़ीहुईअथवाथोपितकृत्रिमतासेपरे, एकदमसीधा-सादा, सहज-सरलऔरअन्दरसेपूरीतरहतरलइंसान, जोकथितरूपसेकिसी "बेगानीशादी" मेंझूम-झूमकर "दीवाना" होगयाहोगायायूँकहेंकिबारहाहोतारहाहोगा।उसकीवो 'दीवानगी' (जोसंभवतःउसकेलिएसर्वथा 'स्वाभाविक' रहीहोगी) लोगोंकोइतनी 'अस्वाभाविक' लगीहोगीकिवहअनचाहेरूपसेअपनेसमयऔरसमाजमेंप्रचंडबहुमतसे, मौनजनस्वीकृतिसेहँसीऔरउपहासका, ग़ैरज़रूरीउत्साहका (बल्कि 'अति-उत्साह' का) एकअजीबउदाहरणबनगया। 

आज जब सोचता हूँ कि अपनी और अपनों की शादी में तोहर कोई 'दीवाना' हो सकताहै, बल्किहोताहीहै, लेकिन अपने इस 'अब्दुल्ला' कामनमौजीपन, उसकीविशाल-हृदयतातोग़ज़बकीहै, कमालकीहै, बेमिसालहै, बेनज़ीरहै, लासानी है, जिसनेउसे "बेगानीशादी" में 'दीवाना' होनेकीमानसिकसुकूनवालीऊँचीभाव-स्थिति प्रदान कर दी।आज सोचता हूँ, तो पाता हूँ किएकतरफ़ 'बेगानीशादी' में 'दीवानगी' कीमस्तीभरी 'भाव-दशा' कोप्राप्तअपनायहहृदयजीवी 'अब्दुल्ला' है, जोबेगानेसुखमेंभीझूमताहै, नाचताहै, गाताहै।दूसरीतरफ़हमऔरहमारेयथाकथितबुद्धिजीवीलोगहैं, जोकईबारख़ुदकेसम्मुखउपलब्धख़ुदकेहीहिस्सेकासुखऔरआनन्दभोगपानेमेंनाकामहोजातेहैं।वस्तुतःयेजो 'हृदयजीवीअब्दुल्ला' हैन, वोअन्दरसेमस्तहै, और 'बुद्धिजीवीदुनिया' अन्दरसेत्रस्तहै।अनुभवयहबताताहैकिख़ुशीअन्दरसेआतीहै।ख़ुशीयाप्रसन्नताकोईबाह्यजगतकाउत्पादनहींहै, यहतोमूलतःअन्तसकीसर्जनाहै, अन्दरसेहीउपजतीहै।यहअलगबातहैकिइंसानउम्रभरख़ुशीऔरसुकूनकीतलाशकरतेहुएबाह्यजीवनकीमृग-मरीचिकामेंभटकतारहजाताहै- 'कस्तूरीकुंडलबसै, मृगढूँढ़ेवनमाँहि' जैसीस्थिति !

आजअगरग़ौरसेदेखाजाये, तोदूसरोंकीशादीयाकिसीभीशुभकार्यमेंशामिलहोकर 'रंगमेंभंग' करनेसेलेकरबिनाशामिलहुएही 'टाँगअड़ाने', दूरबैठकर 'ख़ललडालने' औरबीचमेंआकर 'लकड़ीलगाने' वालोंकीकमीनहींहै।ऐसेमें, अपनावोअनदेखा-अनजानाअब्दुल्लाकितनाबढ़ियाऔरमस्तमौलाइंसानलगनेलगताहै! आजजबमैंउसकेमन-मूडऔरशख़्सियतकोसमझनेकीकोशिशमेंमन-ही-मनउसकीछविको, इमेजको, विजुअलाइज़करनेचलताहूँ, तो '60 केदशकमेंरिलीज़हुईंफ़िल्म'जिसदेशमेंगंगाबहतीहै'काएकशैलेन्द्र-कृतगीतअनायासहीज़ुबानपरआजाताहै, जिसकेअन्तिमअन्तरेमेंअपनाबदनामऔरउपहसित 'अब्दुल्ला' (राजकपूर) एकदार्शिकानाअंदाज़मेंगम्भीरचिंतनकोकुरेदनेवालीप्रश्नात्मकताकेसाथजवाबदेतेहुएएकबड़े 'पतेकीबात' कहताहैकि-

"अपना-बेगानाकौन, जाना-अनजानाकौन
अपनेदिलसेपूछो, दिलकोपहचानाकौन
पलमेंलुटजाताहै, यूँहीबहजाताहै।
शादीकिसीकीहो, अपनादिलगाताहै। 
बेगानीशादीमेंअब्दुल्लादीवाना!"

फ़िल्मकेगानेमेंअपनेअब्दुल्लाभाईकायहजवाबजिससवालपरकेन्द्रितहै, एकनज़रउसपरभीडाललेनाकोईकमदिलचस्पनहींहोगा।वजहयहीकिजिस 'वजह' सेबेचाराअब्दुल्लाकिसीबेगानीशादीमें 'दीवाना' होकरहँसीकापात्रबनाहोगा, उपहसितहुआहोगा, उसकेबारेमेंबराती-घरातीसहितसारेचश्मदीदहीनहीं, बल्किस्वयंदुल्हनभीदुनियाबीदायरेमेंरहकर, सोचकीसामान्यपरिधिमेंघिरकर, कमोवेशयहीकुछसोचतीरहीहोगीकि-



"दुल्हनबनूँगीमैं, डोलीचढ़ूँगीमैं।
दूरकहींबालमके, दिलमेंरहूँगीमैं।
तुमतोपरायेहो, यूँहीललचायेहो।
जानेकिसदुनियासे, जानेक्यूँआयेहो?"

यहा ये सवाल कोई ख़ास अहमियत नहीं रखते कि 'अब्दुल्ला' कौन था? कहाँ से आया किस दुनिया से आया था? किस 'बेगानीशादी' में शरीक हुआ था? अहमियत तो इस बात की है कि 'अब्दुल्ला' फ़ितरतन मनमौज़ी है, मस्तमौला है, बड़ेदिलकाआदमक़दबंदाहै।अनमनेसमाजकाएकमनमनाइंसानहै! वोबाहरीदुनियासेछोटा-सातराना (यायूँकहेंकि- 'ख़ुशहोनेकाएकख़ूबसूरतबहाना') किसीउत्प्रेरककीतरहउठाकरअपनीख़ुशीख़ुदकेअन्दरसेउगानेकाहुनरजानताहै।क्याहर्जहैकिवोयथाकथितसभ्यसमाजकेमानकनहींजानता, ख़ुदकीमस्तीमेंजीताहै, झूमताहै, गाताहै!? औरनि:संदेह- 'ऐसेमनमौजीकोमुश्किलहैसमझाना।' शायदइसीलिए- 'बेगानीशादीमेंअब्दुल्लादीवाना!' 




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