लधु कथा- जागरण का शंखनाद

जागरण अपने साथियों के साथ ,प्रतिदिन मिलन उद्यान में खेलने जाता है /वह कई दिनों से एक बुजुर्ग दादाजी को देख रहा है /दादा जी कभी किसी बेंच पर उदास बैठे हैं ,कभी मायूस टहल रहे हैं /तो कभी कांति हीन ,दीन हीन से ,टुकुर-टुकुर इस बेदर्द दुनिया को देख रहे हैं /जागरण ने सोचा आज खेल के बाद दादाजी से मिलूंगा ,पर ऐसा हो ना सका /जागरण घर पहुंचा तो अपने दादू का कमरा खाली था /मां दादू कहां है ? बेटा ,दादू अपने मित्रों से मिलने बाहर गए है /मैंने तो उनका कोई मित्र आज तक नहीं देखा ,होता तो मिलने नहीं आता /मां तुम सच बताओ दादू कहां है ? नहीं तो मैं  भोजन नहीं करूंगा /मां सन्न रह गई /क्या कहें ,इतने में जागरण के पापा अपने पिता को ,वृद्ध आश्रम छोड़ कर आ गए /मन में संतोष था एक झंझट टली , रोज-रोज की किच -किच  मिटी /जागरण ने पूछा पापा दादू कहां है ?बेटा किसी से मिलने कुछ दिनों के लिए बाहर गए हैं ,आ जाएंगे /तू तैयार होकर स्कूल जा /

जागरण उदास हो गया ,स्कूल में उसने अपने मित्रों से चर्चा की ,आज मेरे दादू कहीं चले गए ,मुझे अच्छा नहीं लग रहा है /तभी मित्र मंडली में उछलता कूंदता हुआ उल्लास आ गया /जागरण भाई आज उदास क्यों ?जागरण ने पूरा हाल सुना दिया /उल्लास बोला मुझे लगता है ,तेरे पापा दादू को किसी वृद्ध आश्रम में छोड़ आए है /जागरण हतप्रभ रह गया , उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा ,कोई पुत्र अपने पिता की ऐसे भी अपेक्षा कर सकता है /इतना गहरा दर्द दे सकता है /कुछ करना पड़ेगा /स्कूल के बाद सांझ उद्यान में खेलने गया /

आज  सौभाग्य से  दादा जी  मिल गए /  दादा जी एक बात पूछूं ,आप उदास क्यों रहते हैं ?तुझ जैसा प्यारा बच्चा , मेरे पास जो नहीं है /तुम्हारा कोई नहीं  है दादू /सब है ,अपनी दुनिया में /मेरे चार बेटे हैं ,सब मुझसे दूर रहते हैं /मैं अकेले ही अपनी जिंदगी का बोझ ढोता हूं /जागरण ने सोचा ,समस्या  गंभीर  है, कुछ करना पड़ेगा /दादा जी चिंता ना करो मैं तुमसे रोज मिलूगा , बातें करूंगा /

जागरण गहरी सोच में पड़ गया /क्या करूं ,कैसे अपने दादू का पता करु /तभी उसके स्कूल में ,वार्षिक उत्सव की तैयारी होने लगी /जागरण ने अपने  सभी मित्रों से  सलाहे की  और एक नाटक तैयार किया / स्कूल प्रबंधन ने अपने भूतपूर्व शिक्षकों ,एवं प्रिंसिपल का सम्मान भी रखा /उद्यान वाले दादाजी भी इस स्कूल के प्रिंसिपल थे /वार्षिक उत्सव मंगलाचरण स्वागत गान के साथ प्रारंभ हुआ / मंच संचालिका राधिका जी ने उद्घोषणा की ,शांति से बैठे रहे ,

अब प्रस्तुत है नाटक ,बुड्ढा बिकाऊ है /हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया /

 प्रथम दृश्य में एक वृक्ष के नीचे धीर गंभीर मुद्रा में ,संत  ज्ञान सागर जी  महाराज विराजमान है /भक्त  प्रतीक्षारत है , संत मोन की गहराई से निकलकर कुछ  हितोपदेश दे /संत श्री ने  मोन की  अतुल गहराई से  निकल कर ,धीर गंभीर  बानी में  कहा , संसार में मां बाप की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है /गुरु जी एक प्रश्न है ,पूछो पुत्र, महाराज श्री क्या  उन  मां बाप की  सेवा भी  धर्म है ?जो  अपने  मां बाप को  वृद्ध आश्रम  में  छोड़ आए हैं , उन्हें अपमान उपेक्षा के  दंश दे रहे हैं / क्या  उन मां-बाप की  सेवा भी  धर्म है  जो अपने मां बाप को  अलग अलग रखते हैं / सर्वेंट क्वार्टर में रखते हैं / उनसे नौकरों जैसा काम लेते हैं /उन्हें पुराने वस्त्र पहनने को देते हैं / उनका सम्मान नहीं करते , उन्हें  बचा खुचा  भोजन देते हैं / उन्हें बोझ समझते है / नहीं नहीं नहीं ऐसे मां बाप की सेवा मैं तो नहीं करूंगा / संत श्री वोले,शांत हो बच्चा , आप सबको ऐसे मां बाप की सेवा भी करना चाहिए, वरना माता पिता पर अत्याचार का यह सिलसिला कभी नहीं रुकेगा /तुम अपने मां बाप के साथ दुर्व्यवहार करोगे ,फिर तुम्हारी संतान तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करेगी /यदि हमारा व्यवहार दूसरे के व्यवहार के अनुसार ही होगा ,तो हम कभी भी अच्छा नहीं बन पाएंगे /

 सभी दर्शक गहरी सोच में पड़ गए ,संत मोन हो गए / मंच पर पर्दा गिर गया ,पर दर्शकों के दिमाग से भी एक पर्दा उठ गया / कई दर्शक तो बोल पड़े , जैसी करनी वैसी भरनी /भाई वाह ,बच्चों ने तो कमाल कर दिया / मंच संचालिका ने घोषणा की , आप सभी  पैरंट्स  आज उपस्थित हैं  और आपने  अपने  बच्चों की अभिनय क्षमता को  देखा / उनकी कला इतनी जीवंत होकर प्रस्तुत हुई कि आप गहरे विचार में खो गये  और ताली बजाना भी भूल गए /अब प्रस्तुत है नाटक बुड्ढा बिकाऊ का अंतिम दृश्य /

दर्शक टकटकी लगाए विचार मग्न है ,अब क्या होता है ,किस चीज से पर्दा उठता है /मंच से पर्दा उठते ही आवाज गूंजती है , बुड्ढा बिकाऊ है माल यह टिकाऊ है ,खाता दो रोटी है ,घर का पहरेदार यह सदाबहार है /बच्चों के लिए यह घोड़ा है ,मनोरंजन का साधन है /आईए मेहरबान कदरदान बुड्ढा बिकाऊ है /क्या कहते हो बुड्ढा बिकाऊ है ,ऐसा भी कभी होता है ,बुजुर्ग के अपनी कहां है /बुजुर्ग के जो अपने हैं इसी जहां में हैं ,पर उनका अव अपना जहां है ,जिसमें मां-बाप की खांसी छींक ,रोक टोक, रात विरात पुकारना उन्हें स्वीकार नहीं है /भीड़ में से दयाल चाचा बोले ,हरे राम राम राम ,क्या जमाना आ गया है /यही बात बच्चे जब छोटे थे, मां बाप ने सोची होती ,तो बच्चे आज बड़े ही नही हो पाते / इनके लिए कई कई रात जागे हैं मां-बाप /घोर कलयुग /ऐसा क्या पाप किया था मां बाप ने ,कि यह  दुर्दिन देखना पड़ रहे हैं /इतना सुनते ही दयाल का साथी प्रकाश बोला ,इसका सबसे बड़ा पाप है इसने गुरु की बात नहीं मानी , गुरुदेव ने कहा था बच्चा संसार में अपनी आत्मा को छोड़ कोई अपना नहीं ,पर इसने पुत्र को अपना माना /उसके लिए  धर्म छोड़ा , पाप किया ,अपने भाई से  भेदभाव किया ,तीसरा साथी  कहां चुप रहता उसने कहा  मुझ बुद्धू लाल की बात ध्यान से सुनो /  पुत्र के लिए मां बाप यह सब करते ही हैं यह कोई पाप नहीं है / इसका सबसे बड़ा पाप है ,इसने बेटी पैदा नहीं की / यदि  इसकी  बेटी होती  तो  इसकी  यह  दुर्दशा  नहीं होती / बेटी अपने मां-बाप का  जितना ख्याल रखती है ,उतना  बेटे नहीं रख पाते /क्या कहते हो भाई ,इसकी बहू भी तो किसी की बेटी है /अरे भाई हर स्त्री चाहती है उसका बेटा श्रवण कुमार बन उसकी सेवा करें ,पर वह अपने पति को अपने मां-बाप के प्रति श्रवण कुमार बनता नहीं देख सकती / इसी विडंबना के चलते घर घर में कलह हैं / बुड्ढा बेचने वाला अभी भी आवाज लगा रहा था , बुड्ढा बिकाऊ है / भीड़ में से किसी ने पूछा ,भाई इसकी कीमत क्या है / कीमत , कीमत का क्या है भाई ,बुड्ढे से ही पूछ लो /

दादाजी आप ही वोलो ,क्या है आपकी कीमत /दादा जी ने  काँपते लरजते होठों से ,धीरे से कहा ,थोड़ी सी घर के किसी कोने में ,और  थोड़ी सी  दिल में  जगह /  दो जोड़ी कपड़े ,दो रोटी ,और दो मीठे बोल /इससे ज्यादा नहीं है मेरा मोल / भीड़ में से किसी ने फिर कहा ,इससे हमें क्या फायदा होगा / बुजुर्ग दादा जी ने कहा मेरे घर में होने के कई फायदे हैं /बुजुर्गों के रहते घर में बुराइयां आसानी से प्रवेश नहीं कर सकती /मेरी खांसी से चोर डरते हैं / बुजुर्ग  आदमी के चेहरे की एक -एक झुर्री पर हजार हजार अनुभव लिखे होते हैं /बूढ़ा आदमी इस धरती का चलता फिरता सबसे बड़ा शिक्षालय होता है / बुजुर्ग के  कांपते हुए हाथ  कहते हैं , जो करना है  आज कर लो  कल नहीं कर पाओगे / बुजुर्ग के डगमगाते  पैर कहते हैं ,जितनी तीर्थ यात्राएं करनी है ,अभी कर लो ,बुढ़ापे में  नहीं कर पाओगे /बुजुर्गों के प्रति  अपनों की  उपेक्षा कहती है  ,बच्चों का कर्तव्य मानकर लालन पालन करो   नाता तो  उस परम पिता परमात्मा से जोड़ो /बुजुर्गों की झुकी हुई  कमर कहती है , ज्यादा अकड़ कर मत चलो ,  एक दिन  खुद अपना बोझ नहीं उठा पाओगे / और सबसे बड़ी बात बुजुर्गों की दुआ दुआओं का कोई रंग नहीं होता लेकिन जब वो रंग लाती है तो जीवन में सुख शांति का सतरंगी इंद्रधनुष बन जाता है

थोड़ी सी सेवा से प्रसन्न हो बुजुर्ग दुआओं का ,आशीर्वादो का खजाना लुटा देते हैं /जिस घर में बुजुर्गों का आदर होता है ,उस घर से सुख शांति कभी नहीं रूठती / और सबसे बड़ी बात आज जो तुम्हारे बच्चे हैं वह जब अपने माता-पिता के द्वारा घर के बुजुर्गों की सेवा होते देखते हैं तो उनके अंदर भी सेवा करने का संस्कार पैदा होता है / भीड़ में से  एक युवक  रोता हुआ  आया  और बुजुर्गों के चरणों में  नमन कर  कहने लगा  दादाजी  मैं  अज्ञान बस , अपने पिता की उपेक्षा करता रहा / उनकी सेवा नहीं कर पाया  /वो हताश  निराश  दुखी मन के साथ ,इस दुनिया से चले गए /  आप मेरे साथ  मेरे घर चलो  शायद  आपकी सेवा से  मेरे कुछ पाप धुल जाए /  दर्शकों को पता ही ना चला कि मंच से पर्दा कब गिर गया , कब उनकी आंखों से आंसू बह निकले ,महिलाएं तो सिसक सिसक कर रो रही थी /कुछ लोग गहरे सन्नाटे में थे ,और टकटकी लगाए मंच की ओर देख रहे थे ,कि शायद अभी कुछ दृश्य और बाकी है /तभी जागरण का शंखनाद  करने वाला , नाटक का  डायरेक्टर  "जागरण " अपने साथी कलाकारों के साथ  मंच पर आया , सब को प्रणाम करके बोला ,हमारे इस छोटे प्रयास से  यदि आपके मन में  करुणा भाव जगा है  ,तो आज से  अपने माता-पिता की तो  सेवा करना ही  , तुम्हारे आसपास  कोई और बुजुर्ग भी  उपेक्षित हैं  उनकी भी सेवा करना / बुजुर्ग तो अंधेरे घर में , रोशनदान की तरह होते हैं ,जो रोशनी ही लुटाते हैं /जागरण के  माता-पिता उठे और जागरण को गले से लगा कर बोले ,चल बेटा तेरी दादू को वृद्ध आश्रम से घर ले आए /तू कितना बड़ा हो गया है /आज हमारी आंखों से अज्ञान का  पर्दा हटा दिया / उद्यान वाले दादू के बच्चों ने भी दादू के पैर पड़ कर क्षमा मांगी और उन्हें अपने साथ ले गए / 

मात-पिता की करो ना उपेक्षा ,

यही इस कहानी की शिक्षा /

"त्रिलोकी"धरती के भगवान यही है ,

कभी ना करें इनकी उपेक्षा //

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन : विहंगम दृष्टि

सरकारी पद पर कोई भर्ती नहीं होगी केंद्र सरकार ने नोटिस जारी कर दिया

शौंच को गई शिक्षिका की दुष्कर्म के बाद हत्या