थैंक्यू गुलाब[कहानी]

थैंक्यू  गुलाब

 

 एक वक्त आता है जब एक दूसरे के लिए तड़प की मौजूदगी महसूस होती है वही मुहब्बत की असली पाकीजगी होती है । लेकिन ........वही मुहब्बत कभी स्वार्थ की दहलीज पर आकर कितनी बदसूरत हो उठती है ।

स्कूल से आते समय दीपाली की नजर एक बार फिर  फूलों की दुकान पर चली गयी।  तरह तरह के पुष्प अपनें मनोहारी रूप और कृत्रिम सौंदर्य से लदे फंदे लक दक हो मेकप पुते चेहरे की तरह आकर्षण की पराकाष्ठा तक मोहित कर रहे थे।  कुछ अकेले खड़े गुलाब भी अलग अलग डंडियों में खडे़ अपनें एकाकी पन का सबूत अपनें आप ही दे रहे थे।  डंडियों से छील कर कांटे निकाल दिए गये थे......सिर्फ सजावटीपन  न कोई खुशबू न ही सुरक्षा न  सुगंध.... सिर्फ और सिर्फ अल्हड़ रंग और सूनापन..... दीपाली नें अपनी दृष्टि  वापस सामनें राह की तरफ डाली और तेजी से स्कूटी बढा ली। कितनी बेबस और आजाद हो गयी है लाइफ,  कोई रोक टोक नहीं। कोई अवरोध नहीं  , क्या खाया, कब सोई , कब आई कब गई कोई भी पूछनें वाला नहीं था। नई नौकरी और पहली बार घर से दूर अकेली , न माँ की घूरती आँखें न ही पापा का डर । जब दिल में कुछ खानें का मन किया बनाया या फिर स्कूल से लौटते में ही कहीं से कुछ पैक करा लिया ।फ्लैट का दरवाजा खोल पर्स बेड पर फेंक पैर की चप्पल  पहनें ही बिस्तर पर लुढ़क गयी। लेटे लेटे ही झटक कर चप्पलें यहाँ वहाँ झटक पड़ रही.... यादें कब पीछा छोड़तीं हैं।  कितना मनना पडा़ था यहाँ आनें के पहले मम्मी को ।

अकेली कैसे रहेगी , जमाना बहुत खराब है चिंकू को साथ लेती जा , साथ रहेगा तो समय से बनाएगी खाएगी ।

उफ्फ़ मम्मी अब मैं बच्ची तो हूँ नहीं और ये चला जाएगा फिर आप लोग अकेले हो जाएंगे । 

हम रह लेंगे ....अकेली ...ठीक नहीं ।कुछ ऊँच नीच हो जाएगी ......

झुंझला कर बोली थी दीपाली ....मम्मी ये दकियानूसी बातों से बाहर निकलो , युग बदल गया लोग बदल गये और तुम अभी भी जस की तस हो ।मैं जान रही हूँ तुम क्या सोच रही हो , तुम्हें अपनी बेटी और दिए गये संस्कारों पर भरोसा नहीं है क्या ।

दीपू तू समझती नहीं , बेटा ये मर्दों की जात बडी़ कमीनी होती है , लड़की अकेली देखी नहीं कि ......

मम्मी सोच बदलो सोच .....भरोसा रखो 

अच्छा किसी पुरुष से ज्यादा निकटता .....

देखो न आ गयी न दिल की बात जुबान पर , माँ सब एक जैसे नहीं होते और स्त्री पुरुष अच्छे मित्र भी होते हैं ।

मम्मी चुप हो गयी थी और मैं .....यादों के भंवर में डूबते उतराते कितनी देर तक सोती रही ।

 देव नित्य ही दीपाली के लिए एक गुलाब की अधखिली गुलाब की कली उसे भेंट करता और दीपाली कभी जूडे़ में लगा कर दर्पण में खुद को देखती और मुस्करा उठती। 

उस दिन  स्कूल के वार्षिकोत्सव के लिए  दीपाली कुछ बुके और फूलों की टहनियाँ  लेनें रुकी थी यहाँ। देव यहीं मिला लंबा सुदर्शन युवक भरपूर आकर्षित कररनें वाली झुकी झुकी सी आँखें। शर्मीला सा युवक लगा था लेकिन था नहीं  , जो दिखता था वैसा सिर्फ दिखता था ये बात काफी दिनों बाद समझ सकी वो। अक्सर आते जाते दिखना और नजरें झुकी हुई होना इत्तफ़ाक हो सकता था न।  लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ जब एक दिन  उसनें आवाज दी..... सुनिए 

आश्चर्य से उसकी तरफ देखते हुए वहम में पड़ गयी कि शायद मेरे कान बज रहे हैं।  स्कूटी स्टार्ट ही कर रही थी कि पुनः सुनिए..... जी आपनें मुझसे कुछ कहा.... जी मैं ये कह रहा था..... दर असल मेरा नाम देव है मैं यहीं पास में रहता हूँ। (दीपाली आश्चर्य मिश्रित मुस्कराते हुए सोचे जा रही थी ये बोलता भी है और देखता भी है )  कभी कोई आवश्यकता पडे़ तो बंदा हाजिर है।  मुझे पता है कि आप अकले रहती हैं।  (अच्छा  तो साहब नें मेरे बारे में जानकारी भी इकट्टठी कर रखी है)  वैसे आपका नाम जान सकता हूँ।  

जब आपनें इतनी जानकारी इकट्टठी कर ली है तो नाम भी पता कर लीजिए ।पीछा छुडा़ने जैसी अभिव्यक्ति के साथ बोली ...थैंक्यू  ...... 

देव देव देव जितना झटक कर निकालना चाहती बार बार ये नाम खिड़की पर लटके विंडचाइम की टिन टिन्न की तरह बेसाख्ता दस्तक दिए जा रहा था। तकरीबन हफ्ते भर बाद फूल की दुकान पर फिर मुलाकात  हुई...  दीपाली फूलों का एक गुच्छा पसंद कर रही थी तभी देव ने आकर अधखिले गुलाब की एक टहनी उसकी तरफ बढाते हुए कहा दीपाली सिंह ये आपके लिए..... विस्मय से आँखें फाड़ते हुए उसने टहनी पकड़ तो ली ये सोच कर कि दुकान वाला कुछ सोचे न लेकिन  इसे नाम कैसे पता चला  । .......थैंक्यू  .....हाँ थैंक्यू ही बोल सकी थी ।

उस दिन सब्जीमंडी में सब्जियां खरीदते समय फिर मिला था वो ....यूं बगल से गुजर गया । शायद भीड़ में अनावश्यक लोगों के बीच से अलग हो कर स्कूटी से कुछ दूर इंतजार कर रहा था । 

ये क्यूं करता है ऐसा ..... मैं तो कुछ .... कुछ अजीब नहीं है यह .... पागल .... हां अच्छा लगता है लेकिन ऐसा तो नहीं कि इंतजार करें .....सोचती हुई स्कूटी की तरफ बढ़ रही थी तभी एक छुट्टा सांड़ नुकीली सींग घुमाते स्कूटी में तेजी से टक्कर मार गया और स्कूटी गिर गई । देव झट से आगे बढ़ कर सांड़ महाशय को एक दुकान से डंडा लेकर भगा दिया और स्कूटी उठा कर बोला आप ठीक तो हैं न । जी शुक्रिया मैं बिल्कुल ठीक हूं । 

ये छुट्टा पशु आज कल बहुतायत हो रहें हैं खास तौर पर सब्जी मंडी में , जरा सी चूक हुई कि दुर्घटना हुई ।....जी 

उंह ...छुट्टा पशु ही नहीं छुट्टा मर्द भी घूमते हैं जैसे तुम ...

.......दो चार तकरारें ... मुलाकातें और बढ़ती हुई बातचीत नें परिचय को मित्रता और फिर ... कब इतनी आत्मीयता भर दी कि देव नाम का नशा दिल दिमाग पर यूं छाया कि कभी कभी तो समय बीतने का एहसास ही नहीं होता था । कभी काफी सेंटर और रेस्टोरेंट और पार्क .....मुलाकातें बाहर से कब घर तक पहुंच गई पता ही नहीं चला । देव अक्सर फ्लैट पर आनें लगा , घंटों गपशप , चाय नाश्ता हंसी-मजाक आम बात हो गई । बातों का विषय भी फार्मल से आत्मीय हो उठा था ..अक्सर देर हो जाती । मित्रता प्रगाढ़ होती जा रही थी । अब देव न हो तो दिन खाली और उदास सा लगता । जैसे दिनचर्या में मम्मी से बात करना वैसे ही देव का बेसब्री से शाम की चाय पर इंतजार करना ।घंटो यहाँ वहाँ की मसखरी भरी बातें करके दोनों खूब हँसते । दीपाली नें मन ही मन उसे जीवन साथी के साचे में ढालना शुरू कर दिया था । उसे देव की नजरों में दुनियाँ भर का प्यार और हिफाजत दिखती ।

उस दिन शाम होते ही मौसम खुशनुमा हो उठा था बादल के साथ ठंडी-ठंडी हवा और बातें ....देव को मानों जानें की जल्दी भी नहीं थी । 

देव , मौसम बिगड़ रहा है अब जाओ तुम 

क्यूं ...मौसम से डरती हो 

नहीं मौसम से नहीं डरती मैं 

फिर .....आँखों में शरारत और चेहरे पर चंचल मुस्कान 

खुद से डरती हूं .....

क्यूं , तुम्हें खुद पे भरोसा नहीं है ।

है , बहुत है लेकिन ..... ठीक नहीं है देव , अब तुम जाओ ।

नहीं जाता .. मुस्कराते हुए देव ने आगे बढ़ कर दीपाली को बांहों में भर लिया । बाँहोंं की गर्माहट और हृदय की धड़कनें मदहोश किए जा रही थी ।होठ थरथरा उठे और आँखों में नशा तारी हो उठा था ।दीपाली ने खुद को छुड़ाने का प्रयत्न भी नहीं किया । बस चुपचाप देखती रही देव की शरारती आंखों में । देव नें उसकी आंखों में झांकते हुए अपने होंठ उसकी तरफ बढ़ाया ही था कि दीपाली ने अपनीं हंथेली बीच में रख दी ...... नहीं देव ...मत करो ऐसा ।

क्यूं ....रोको मत ...मत रोको ...आज मत ....

बाँहों का कसाव बढ़ता जा रहा था। देव हद पार करता उसके पहले .... 

हटो ....कह कर दीपाली नें खुद को उसकी बाहुपाश से खुद को मुक्त करने की कोशिश की लेकिन देव तो जैसे पागल हो उठा था । बंधन और कठोर होता गया ।मौसम ने अजीब खेल खेलना शुरू कर दिया था । दीपाली की ये सोच कि स्त्रियां कमजोर नहीं होतीं ...... स्त्री पुरुष सिर्फ मित्र रह सकते हैं ....देव बिल्कुल अलग है ....सारी बातें ढेर होती जा रही थी । ऐसा क्षण जब कुछ भी सोचने समझने की क्षमता समाप्त हो जाती है । दीपाली के समक्ष माता पिता के सामने किए गए विश्वास भरे वादे और उम्र की बंदिश टूटती सी लगी । 

छोड़ो .....जोर से धक्का दिया उसने और अलग हो अपनी अनियंत्रित सांसों को नियंत्रित करते हुए धम्म से कुर्सी पर बैठ गई । 

देव , क्या कर रहे थे तुम । हम ऐसा नहीं कर सकते ... दोस्त हैं यार हम ।

तो ... दोस्त हैं तभी तो ...शरीर की भी कोई जरूरत  होती है और हम कब तुमसे ज्यादा कुछ मांग रहे हैं , हमारे तन की डिमांड है ये । कुछ नहीं होता ... यदि हम थोड़ा ....

 नहीं हमें सीमा नहीं पार करना और शादी के पहले तो बिल्कुल नहीं ।

किस जमानें की लड़की हो यार ...सब होता है ...कुछ फर्क नहीं पड़ता ।

दीपाली को मम्मी की बातें याद आ रही थी । पापा का विश्वास और मम्मी को दिया वचन टूटता नजर आ रहा था , प्रेम और विश्वास का सतरंगी इंद्रधनुष धुंधला कर बादलों के रंग में घुल गया था ।

बकवास मत करो , निकलो यहां से अभी तुरंत ....तुम जो दिखते हो वो हो नहीं । 

दीपू सुन .... मैं तुझे बहुत चाहता हूं यार , एक बार ...

......तो जाओ पहले अपने माता-पिता से इजाजत लेकर आओ और ले चलो ब्याह कर मुझे । 

ये शादी ब्याह की बात छोड़ यार माता-पिता को क्यूं ला रही है बीच में । हम पसंद करते हैं एक-दूसरे को । समय की मांग है पूरी कर दो न .....

अच्छा? ...पसंद ?...ओह .... तो तुम्हारी पसंद सिर्फ देह तक है ! 

हां , हम एक-दूसरे पर बोझ नहीं बनेंगे , तुम भी फ्री और मैं भी फ्री , आ जाओ बांहों में तुम्हें आनंद के सागर में ले चलूं  किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा । आओ ....आ जाओ कहते हुए देव‌आगे बढ़ा ,आंखों में वासना के डोरे चमक रहे थे खूबसूरत चेहरा कितना वीभत्स और घिनौना लगने लगा था ।

देव किसी भी समय बाहों में दबोच कर .....

उफ़ ......क्या करूं , कैसे निकालूं इसे , ये तो .

अचानक बिजली कड़की और लाइट चली गई । दीपाली धीरे से सरकती दरवाजे से बाहर हो कर बगल वाले घर में घुस गई जो अभी-अभी लाइट जानें पर खुला था। 

चाहे जितना प्यार करो पुरुष के लिए स्त्री  सिर्फ स्त्री होती है प्यार कभी नहीं ,कभी प्यार उमडा़ भी तो जिस्म तक आकर मर गया और बच गई  सिर्फ स्त्री । मन कसैला होता चला गया । कितना सम्मान करती थी इस देव का और ये 

याद आ रहा था जब उसने कहा था , जानती हो दोस्त क्या होता है , दोस्त हर सुख-दुख बांट लेता है ।

सचमुच गुलाब हो , तुम्हारा सौंदर्य पवित्रता की मिसाल है...

मैं हूं तो तुम निश्चिन्त होकर रहो ,तुम मुझमें एक दोस्त एक भाई एक पिता और एक संरक्षक पा सकती हो ।

उफ़ ..सोचते हुए दरवाजे पर ही दुबकी रही काफी देर तक , कुछ समय पश्चात लाइट आ गई । लाइट आते ही सामने पड़ोसन को देख कर बोली "भाभी जी वो लाइट कट गई थी , ऐसा लगा कि घर में अजीब सी आवाजें आ रही हैं मैं डर गई थी , जरा मेरे साथ चलिए ।

हां हां चलो , डरने की कोई जरूरत नहीं है हम सब हैं न‌। 

अंदर आने पर देखा देव जा चुका था । और देखा उसकी लाई हुई ताजी टहनी में अधखिला गुलाब जो अपने मासूम सौंदर्य को लेकर ड्रेसिंग टेबल के कार्नर पर पड़ा मुस्करा रहा था । 

स्त्रियां क्यों किसी पुरुष में कभी अपने पिता को कभी भाई को तलाशने लगती हैं । अनजाने ही यकीन भी कर बैठती हैं । लेकिन जब उनका यह यकीन टूटता है तो टूटे हुए आईने के हर टुकड़े में अपना ही चेहरा खंड खंड हो लहूलुहान नज़र आता है । दीपाली ने वार्डरोब से कपड़े और जरूरी सामान बैग में डाल रिस्टवाच पर नजर डाली सुबह होने में अभी काफी समय था ।

सुबह कमरे से निकलते हुए एक बार फिर नजर गुलाब पर पड़ी ,वैसा ही मुस्करा रहा था बिना किसी कांटे के आजाद ....पूरी तामझाम के साथ  चमकीला जैसे मेकप पुता सजीला बना ठना मासूम किंतु बाजारू चेहरा बिल्कुल देव जैसा। उसे घर के देशी गुलाब याद आ गये छोटे ,कांटों से घिरे ,खुशबू से घर आंगन गमकाते ।कितनी सीख दे जाते हैं ये तरह तरह के गुलाब भी 

मोबाइल पर ,मम्मी..मम्मी मैं आ रही हूँ ।

....   ....

नहीं छुट्टी तो नहीं है बस आपकी याद आ रही है ।मैं सोच रही थी की चिकू को ले ही आऊँ , बहुत ज्यादा समय रहता है बोर होती हूँ ।

 दरवाजे पर ताला बंद करती हुई मन ही मन बुदबुदा उठी .....उफ्फ़ गुलाब ... थैंक्यू गुलाब ।

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