गोबर बना कमाई का जरिया कही लट्टू तो कही चप्पल कलाकर दे रहे नया आयाम खोल रहे धन का द्वार

प्रताप सिंह 1 गोबर से फूट्वियर अहमदाबाद के रहने वाले दिव्यकांत दुबे. दुबे 55 साल के हैं और पिछले 8-10 साल से गोबर पर काम कर रहे हैं. महज दसवीं पास दिव्यकांत पेशे से एक पेंटर हैं. साइन बोर्ड पेंट करके, मूर्तियां बनाकर अपनी आजीविका चलाते हैं लेकिन गोबर पर काम करके उन्हें खुशी मिलती है. इन्होंने गोबर से कई उत्पाद बनाए हैं. गोबर का नाम सुनते ही अधिकांश लोग नाक-मुंह सिकोडऩे लगते हैं. वहीं जब कोई कहे कि वह गोबर पर रिसर्च कर रहा है तो न केवल लोग उस पर हंसेंगे, बल्कि उसको गोबर गणेश जैसे तमाम ताने भी दे देंगे. लेकिन एक ऐसे भी शख्स हैं जो न केवल गाय के गोबर पर रिसर्च कर रहे हैं, बल्कि गोबर से ऐसे-ऐसे उत्पाद भी बना रहे हैं, जिन्हें देखकर हर कोई अचंभित हो जाएगा. यह काम कर रहे हैं दिव्यकांत दुबे , हाल ही में इन्होंने गाय के गोबर से चप्पलें बनाई हैं. मजबूत, टिकाऊ और स्वास्थ्य के लिए उपयोगी इन चप्पलों को बहुत ज्यादा पसंद किया जा रहा है. गाय के गोबर से बनी इन चप्पलों को आधा घंटे पानी में रखने से भी ये खराब नहींं होतीं. दिव्यकांत दुबे द्वारा गोबर की बनी ये मूर्तियां न केवल ईको फ्रेंडली हैं बल्कि विसर्जन के बाद जमीन को फायदा पहुंचाती हैं. इनके अलावा जो सबसे जरूरी और लाभदायक चीज इन्होंने बनाई है वह है मोबाइल फोन के पीछे लगाई जाने वाली एंटी रेडिएशन डिवाइस. बेहद छोटी गाय के गोबर से बनी इस डिवाइस को फोन के पीछे चिपकाने से मोबाइल से निकलने वाला रेडिएशन प्रभावहीन हो जाता है. इसकी कीमत भी सिर्फ 10 रुपये रखी है. दुबे बताते हैं कि एंटी रेडिएशन को गुजरात यूनिवर्सिटी ने भी प्रभावशाली माना है. साथ ही इस रिसर्च को मंजूरी दे दी है. दुबे कहते हैं कि उन्हें गायों से प्रेम है. दूध न देने वाली गायों को बेकार समझकर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. इसलिए उन्होंने गोबर पर काम करना शुरू किया कि गाय को कम से कम गोबर के लिए ही लोग पाल लें और उसे लावारिस न छोड़ें. वे कहते हैं कि कुछ सरकारें गाय को लेकर नीतियां बना रही हैं लेकिन अभी इन नीतियों को लोगों तक पहुंचाने और आगे बढ़ाने की जरूरत है. दुबे कहते हैं कि गोबर को सब कचरा समझते हैं लेकिन ये उतनी ही कीमती चीज है. उन्हें उम्मीद है कि धीरे-धीरे ही सही लोग गाय के गोबर के महत्व को समझेंगे और इसकी बनी चीजों का लाभ लेंगे. दुबे कहते हैं कि इस रिसर्च के लिए उन्हें बहुत पढ़ाई की भी जरूरत नहीं पड़ी. अब जब सोशल मीडिया पर वे गोबर से बनी चीजें डालते हैं तो लोग काफी पसंद करते हैं. हालांकि अन्य चीजों की तरह अभी गोबर उत्?पादों की डिमांड बनने में समय लगेगा. 2 गोबर से बने लट्टू उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर में गो संरक्षण को लेकर काम करने वाले एक स्वयं सहायता समूह ने शव दाह की हिंदू परंपरा में एक महत्वपूर्ण और सार्थक दखल दिया है। समूह की महिलाओं ने गाय के गोबर से ऐसा लट्ठ तैयार किया है, जिसकी मदद से हिंदू रीति से शवों को मुखाग्नि दी जा सकेगी। बता दें कि हिंदू धर्म में गाय के मल (गोबर) को काफी पवित्र माना गया है। पूजा-पाठ से लेकर शवों को मुखाग्नि देने तक में इससे बने उपलों का इस्तेमाल होता रहा है। अब तक हाथ से पाथे गए उपलों से शवों को मुखाग्नि दी जाती थी। विकास विभाग के सहयोग से तैयार की गयी है मशीन सुलतानपुर में महिलाओं के एक स्वयं सहायता समूह ने विकास विभाग के सहयोग से ऐसी मशीन तैयार की है जो गोबर, कोयला और धान की डंठल के कतरन से लट्ठ तैयार करेगी। इसका बाजार में अलाव और तंदूर में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होगा। शव के अंतिम संस्कार में परम पवित्र गोबर की यह लकड़ी भी इस्तेमाल की जाएगी। आधिकारिक तौर पर बताया गया है कि, इसमें विषाणु और जीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमता तक दर्शायी गई है। गोबर-कोयला और पैरा के संयुक्त मिश्रण से बनाया जा रहा लट्ठ प्रधान पति हलियापुर अखंड प्रताप सिंह उर्फ गब्बर सिंह ने बताया कि स्वयं सहायता समूह की महिलाओं की ओर से गोबर की लकड़ी तैयार की जाती है। मशीन में गोबर कोयला और पैरा के संयुक्त मिश्रण से लट्ठ बनाया जाता है। इससे महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है। उन्होंने बताया कि हमारे यहां 700 से अधिक गौशाला में गायें हैं। इनके गोबर का इस्तेमाल किया जा रहा है। सुल्तानपुर-अयोध्या जिले की सीमा पर स्थित हलियापुर ग्राम पंचायत की इस गौशाला में अब तक केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी समेत कई राज्यमंत्री आ चुके हैं। इस गौशाला की वे तारीफ भी कर चुके हैं। इनसे प्रेरित होकर महिलाओं ने रोजगार का ये रास्ता अख्तियार किया है। सीडीओ अतुल वत्स ने बताया कि हलियापुर गौशाला में संत रविदास स्वयं सहायता समूह की महिलाओं की ये पहल है। यहां करीब साढ़े 7 सौ गाय पंजीकृत रूप से रखी गई हैं। जागरूकता के लिए शेयर अवश्य करें

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