रात भर बंद कमरे में रोता हूं.........!

जिंदगी जैसे ठहर सी गई है
निया की आंख में आंसू उदास है।
अब तो खाना भी नहीं मांगती है
देने पर खाना नहीं खाती खास हैं।
घर कुछ- कुछ खामोश लगता है
चहचहाना छोड नहीं आती पास है।
निया खोजती अपने बच्चेे प्यारे
जो उसकी की आंखे के तारे ।
घर खामोश मेरी आखे नम है
उसके दुख का मुझे भी गम है।
चाह कर भी नहीं रख सका दिया दर्द
निया की नजर में कैसे बनू हमदर्द।
गम और दर्द के आंसू पीता हूं
रात भर बंद कमरे में रोता हूं।
सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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