भारतीय सम्वत् 2078 के प्रथम दिवस पर विशेष- भारतीय कलैण्डर (कालगणना) विश्व की एकमात्र कालगणना है

कालगणना को प्रभु श्री राम के नाम से जाना जाता रहा है जिसका प्रारम्भ प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक से हुआ था
सुरेन्द्र गुप्ता, एडवोकेट
अंग्रेजी कलैण्डर सहित विश्व में अनेक कलैण्डर (कालगणना) प्रचलित हैं जिसमें चीन, इजराइल और सऊदी अरब जैसे देशों का अपना अलग कलैण्डर है लेकिन भारतीय कलैण्डर (कालगणना) विश्व की एकमात्र कालगणना है, जिसका वैज्ञानिक आधार है। आज से लाखों वर्ष पहले हमारे ऋषि, मुनियों (उस समय के वैज्ञानिक) ने कालगणना के वैज्ञानिक आधार का इस प्रकार से अनुसंधान किया कि कोई भी आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सकता है।
वैसे तो भारतीय कालगणना लाखों वर्ष पुरानी है लेकिन वर्तमान में इसे सम्वत् के नाम से जाना जाता है, जिसका प्रारम्भ सम्राट विक्रमादित्य के समय से हुआ है। इसी कालगणना को युगाब्द के नाम से जाना जाता है, जिसका प्रारम्भ महाभारत के महाराज युधिष्ठिर के राज्याभिषेक से हुआ था। ‘इससे पूर्व इसी कालगणना को प्रभु श्री राम के नाम से जाना जाता रहा है जिसका प्रारम्भ प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक से हुआ था। इसी कालगणना को प्रभु श्रीराम से पूर्व उनके पूर्वज महाराज प्रथु के नाम से जाना जाता रहा है।’ ग्रह, नक्षत्र, उनकी गति और उनसे निकलने वाली तरंगों का पृथ्वी पर रहने वाले मानव और अन्य जीव जन्तुओं पर पड़ने वाले प्रभावों को आज का विज्ञान भी स्वीकार करता है। इन्हीं आधारों पर ही भारतीय कालगणना का निर्धारण किया गया है। यह जानकर आज के वैज्ञानिक भी आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि लाखों वर्ष पहले भारत के वैज्ञानिकों ने किस प्रकार से वर्तमान दूरबीन आदि जैसे यन्त्रों के न होते हुए भी सटीक खोजें की है जिसमें आज तक कोई संशोधन नहीं हुआ है, जबकि अंग्रेजी कलैण्डर में मात्र दो हजार वर्ष की अवधि के दौरान चार बार संशोधन हो चुका है। हैरानी की बात तो यह है कि विज्ञान में अपने आपको सर्वोच्च मानने वाला पश्चिमी जगत आज तक वैज्ञानिक आधार पर कोई कलैण्डर नहीं बना पाया है।
लाखों वर्ष पूर्व भारत के ऋषि, मुनियों (वैज्ञानिकों) द्वारा यह अविष्कार किया गया था कि सूर्य ग्रह और चन्द्र ग्रह ब्रहमाण्ड के ऐसे ग्रह हैं, जिनसे निकलने वाली किरणों का मानव जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। आज का विज्ञान इसको काॅस्मिक रेज के रूप में स्वीकार करने लगा है। लाखों वर्ष पहले भारत में ही यह खोज हुई थी कि सूर्य ग्रह किसी ग्रह की परिक्रमा नहीं लगाता है और पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा लगाती है। धुरी पर घूमते हुए पृथ्वी का जो हिस्सा सूर्य की ओर होता है, उस ओर प्रकाश होने के कारण दिन होता है और जो हिस्सा पीछे की ओर होता है, वहाँ अन्धकार होने के कारण रात्रि होती है। एक दिन और एक रात्रि को मिलाकर एक दिनमान कहा जाता है। लगभग 365 दिनमान में पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा पूरी कर लेती है। इसी को एक वर्ष कहा जाता है।
चन्द्रमा पृथ्वी का भ्रमण करता है। जिस अवधि में रात्रि में चन्द्रमा का प्रकाश पृथ्वी के जिस हिस्से पर पड़ता है उस अवधि को हमारे वैज्ञानिकों ने शुक्ल पक्ष कहा है और भ्रमण करते हुए पृथ्वी के जिस हिस्से पर चन्द्रमा की किरणे नहीं पड़ती है उस अवधि को हमारे वैज्ञानिकों ने कृष्ण पक्ष कहा है। कालगणना के अन्तर्गत इस प्रकार का अनुसंधान भारत की सनातनी संस्कृति के अलावा विश्व के किसी भी कोने में नहीं हुआ है। भारत में लाखों वर्ष पूर्व से ही प्रत्येक वर्ष को बारह भागों में विभाजित किया गया है जिसे मास (महीना) कहा जाता है। चन्द्रमा एक वर्ष की अवधि में पृथ्वी के लगभग बारह चक्कर लगा लेता है और इसी आधार पर भारतीय कालगणना में मास का निर्धारण किया गया है। प्रत्येक मास का नाम उस नक्षत्र के नाम से है जिससे मास प्रारम्भ होता है जैसे चित्रा नक्षत्र से चैत्र मास, विशाखा नक्षत्र से वैशाख मास। इससे यह स्पष्ट है कि भारत में लाखों वर्ष पूर्व यह खोज की जा चुकी थी कि पृथ्वी को प्रभावित करने वाले मुख्यतः सत्ताईस नक्षत्र हैं। प्रत्येक मास में लगभग ढाई नक्षत्र का सम्बन्ध आता है, यानी उस समय ग्रहों तथा नक्षत्रों की चाल का भी अनुसंधान किया गया था जबकि यह हकीकत है कि अंग्रेजी कलैण्डर वर्ष में प्रारम्भ में मात्र दस महीने होते थे इसमें संशोधन करते हुए भारतीय कलैण्डर के आधार पर ही बारह माह निर्धारित किये गये। लैटिन शब्दावली के अनुसार सितम्बर को सातवाँ, अक्टूबर को आठवाँ, नवम्बर को नौवाँ व दिसम्बर को दसवाँ माना जाता है लेकिन अंग्रेजी कलैण्डर में सितम्बर से दिसम्बर तक को क्रमशः नौवाँ से बारहवाँ महीना माना जाता है। स्पष्ट है कि अंग्रेजी कलैण्डर विज्ञान व शब्दावली दोनों के आधार पर पूर्णतः अर्थहीन है।
भारतीय कलैण्डर में पूर्णिमा और अमावस्या का भी महत्व होता है। आज का विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि मानव शरीर का 70 प्रतिशत भाग जल तत्व से सम्बन्धित है। हम सभी यह जानते हैं कि पूर्णिमा के दिन समुद्र में ज्वार भाटा आता है, कहने का आशय है कि चन्द्रमा की किरणें जब अपने पूर्ण रूप में होती हैं तो मानव शरीर का जल तत्व प्रभावित होता है जिसका सीधा प्रभाव मानव की गतिविधियों पर पड़ता है। भारतीय कालगणना में विचार करते हुए हमारे वैज्ञानिकों द्वारा यहाँ तक खोज की गयी कि मानव को अपने जीवन में किस कार्य को कब महत्व देना चाहिए। भारतीय कालगणना में पल और क्षण तक की खोज की गयी और यहाँ तक खोज हुई है कि किस नक्षत्र व किस ग्रह का कितना अंश किस समय तक रहता है। सूर्य व चन्द्र ग्रह के अलावा अन्य ग्रहों की गति तथा उनके पड़ने वाले प्रभाव की खोज भी भारत की देन है जिसका समावेश भारतीय कलैण्डर में किया गया है। भारत में जितने भी त्यौहार हैं वे सभी ग्रहों व नक्षत्रों पर आधारित हैं और उस अवधि में ग्रहों तथा नक्षत्रों की तरंगें साधना और आराधना करने के लिए सहायक होती हैं जिससे मानव सुखी व आनन्दमय जीवन जी सके। आखिरकार कलैण्डर बनाते समय हमारे वैज्ञानिकों के केन्द्र में मानव जीवन ही था। अंग्रेजी कलैण्डर का प्रथम दिन मौज मस्ती के रूप में मनाया जाता है जबकि भारत में नौ दिनों तक ईश्वर की आराधना करते हुए जीवन की साधना की जाती है। इन दिनों माँ दुर्गा का पूजन महिलाओं के प्रति सम्मान और सशक्तीकरण का एक ऐसा उदाहरण है जो दुनिया के किसी भी कोने में नहीं मिल सकता है। भारतीय कलैण्डर के प्रथम दिन को संस्कृत दिवस तथा ज्योतिष दिवस के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय कालगणना ग्रहों तथा नक्षत्रों पर आधारित होनेके कारण ज्योतिष से भी गहन रूप से सम्बन्धित है। भारतीय कालगणना का उल्लेख ऋगवेद और अथर्ववेद जैसे विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थों में काल चक्र के रूप में मिलता है। अंग्रेजी नववर्ष चीन, इजराइल, सऊदी अरब जैसे देशों में नहीं मनाया जाता है, लेकिन दुर्भाग्य है कि गुलामी की मानसिकता में जी रहे भारतीयों के मन मस्तिष्क में अंग्रेजी कलैण्डर का जूनून आज भी हावी है। भारतीय नव वर्ष के प्रथम दिन का अन्य कारणों से भी विशेष महत्व है। इसी दिन महान सन्त झूलेलाल जयन्ती, भारत के स्वाधीनता सेनानियों को प्रेरणा श्रोत आर्य समाज की स्थापना तथा विश्व के सर्वाधिक विराट स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक व प्रथम सरसंघचालक डा0 केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिन भी है। आज यक्ष प्रश्न तो यह है कि कब भारत के लोग अपनी इस अद्भुत वैज्ञानिक कालगणना पर गर्व करेंगे? और कब मानसिक गुलामी से अपने आपको मुक्त कर पायेंगे? वक्त को इन्तजार है भारत के लोगों का अपनी सनातनी संस्कृति की जड़ों की ओर लौटने का । (लेखक स्वतन्त्र चिन्तक व विचारक हैं।)

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