व्‍यंग्‍य:हिंदी साहित्यकार से ठलुआ मिलन कथा

व्‍यंग्‍य:हिंदी साहित्यकार से ठलुआ मिलन कथा
- अरविन्द मिश्र
लेखक, कवि, साहित्य प्रेमियों की बड़ी बेकार-सी आदत होती है । वे कहीं नई-पुरानी जगह जाने के पहले वहाँ मुलाकात करने योग्य परिचित-अपरिचित रचनाकारों को खंगाल लेते हैं। इसी प्रक्रिया के तहत मैंने एक दिन पूर्व ऐसा ही किया । पत्रिका का एक अंक निकालकर गणमान्य पत्रिका सम्पादक का पता और फोन नम्बर नोट कर लिया फिर बच्चों से फोन नम्बर अपने मोबाइल में फीड करा लिया । चूंकि अकल से घिसे-पिटे साहित्यानुरागी होने के कारण सारी आधुनिक तकनीकी सुविधाओं का उपभोग बखूबी करने की आदत नहीं है । आगे का वाक्या यूँ घटित हुआ कि मुझे अपने दसवें नम्‍बर के बच्‍चे को बैंक की परीक्षा दिलाने जाना था । उसी शहर में उसका परीक्षा केंद्र था । मैंने बच्‍चे को निर्धारित समय पर योजनानुसार उसके गंतव्य परीक्षा केन्द्र पर छोड़ दिया । अब मेरे पास कुल जमा ढाई घंटे का खाली यानि फुरसतिया समय था । मैंने तुरन्त वरिष्‍ठ लेखक/सम्पादक श्रेष्ठ को फोन लगाया । जबाव आया- ‘यह फोन नम्बर मौजूद नहीं है ।’ सोचा चलो घर तो अपनी जगह पर मौजूद होगा ही ! मैं आसपास पूछते हुए निर्धारित पते पर पहुँच गया । शरीर को जलाने वाली धूप सेंकते हुए गणमान्‍य के दरवाजे के सामने आवाज़ लगाकर जोर की साँस ली । भीतर से भौंह चढ़ाए लेखक की इकलौती पत्नी श्री बाहर आयीं और बोलीं-‘‘ घर पर नहीं हैं ।’’ हमने पूछा कहाँ गए हैं -‘‘ वह बोलीं बाजार तक गए हैं ।’’ मैंने फिर पूछा ? कब तक आयेंगे ? ‘‘वह बोली- ‘आधा घंटा में आ जायेंगे ’ चूंकि मैं गर्मी में पैदल चलकर उनके घर तक पहुँचा था लिहाजा मैं चाहता था वे कह दें कि आइए बैठ लीजिए, ये भी अभी थोड़ी देर में आते ही होंगे । लेकिन, मेरा सोचना मेरे ही दिमाग़ में घूमता रहा । बहुत बार हमारा सोचा हुआ दूसरे के सोचने पर निर्भर करता है । परंतु निष्‍ठुर प्रवृत्ति की गृह स्‍वामिनी होने के वशीभूत उन्‍होंने अपने मन में ऐसा कुछ नहीं सोचा न ही उन्‍हें मेरे चिलचिलाती गरमी में झुलसने की तात्‍कालिक परिस्थिति पर किसी प्रकार का तरस आया न ही संवेदनाओं का कोई संचार हुआ । भला इस अमानवीय होते समय की वह साक्षात् प्रतिमूर्ति जो थीं मैं लगातार भले मानुष की इस व्‍यथा पर तरस खा रहा था कि यह ग़रीब इस मँहगाई के समय में अपने पंचर रिश्‍तों को जोड़ लगा-लगा कर गर्व से निर्वाहता चला आ रहा है । उनकी पत्नी श्री ने ऐसा कुछ नहीं सोचा । बल्कि वे पूरी तरह से मुझे दरवज्‍़ज़े से अलविदा करने पर आमादा लग रहीं थीं । मैंने कहा-‘आप कृपाकर उनका नया मोबाइल नम्बर दे दीजिएगा’ । वह उच्‍च स्‍वर में बोलीं -‘‘आज मोबाइल लेकर नहीं गए।’’ मैं घोर निराशा महसूस करने लगा । वह पूरी तरह मुझे टिरकाने पर तुली हुईं थी ? वे बड़े आश्‍वस्त भाव से बोली- ‘आप जिस मोड़ से कालोनी के भीतर मुड़े होंगे वही एक साइकिल की दुकान है जाकर वहाँ देख लीजिए, वहीं खड़े होंगे ।’ यह सुनकर, मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकने लगी फिर अपने आप को हालातों से समझौता करते हुए स्थिर किया । कि वाह रे ! पत्रिका की नाममात्र सम्पादक महोदया और वाह रे ! हिन्दी साहित्य सृजक व सरकारी स्कूल के हिन्‍दी शिक्षक । हाय रे ! तू आज भी चाय की दुकान पर खड़े-खड़े चाय सँरूटते हुए, किसी छोटी से टपरानुमा पान की गुमठी पर मुँह में पान की गुलेरी चबाते हुए । किसी आम आदमी से बतियाते हुए दिखाई देता है । गली के किसी मोड़ की साइकिल दुकान पर पंचर सुदरवाने, हवा भरवाने के नाम पर घंटों यूँ ही खड़ा रहता है । इतनी देर में भले मानुष तू दिन भर हाथ फेरने वाली अपनी आठ दिन पुरानी खुरदरी दाड़ी बना सकता था । अपने पोपले चेहरे पर बेसन, हल्‍दी का लेप पोत सकता था । गमले में उगाए मुफ्त के एलोवेरा की मसाज़ कर सकता था । तीन दिन से पहने हुए बदबूदार कपड़ों को सस्‍ते वाशिंग घोल में धोकर धूप में सूखने डाल सकता था । उन पर कड़क इस्त्री (प्रेस) करके पहन सकता था । खैर, यह सब हिन्दी साहित्यकार नहीं कर सकता । क्योंकि वह यह सब करने लग जायेगा तो फिर हिन्दी साहित्यकार प्रेमचंद, निराला, नागार्जुन नहीं बन पाएगा ? इस बेतरतीबी जीवन शैली से लेखन का कुछ गहरा नाता है । इसी को तरतीब से समझ कर कलमबद्ध करते रहने में जीवन गुज़र जाता है । मैंने मुँह लटकाए उनके घर से साइकिल दुकान तलाशने की मुद्रा अख़्तियार की । थोड़ी दूर चलकर वहीं चिर- परिचित गली के मोड़ पर रखी गुमठी नुमा साइकिल की दुकान पर पैरों में साधारण-सी स्‍पंज़ की घिसी चप्पलें, बिखरे से गिनती के बाल सिर पर धारण किए, एक मिली मीटर बड़ी हुई दाड़ी के बाल युक्त रूखा-सूखा चेहरा देखकर मुझे उनको चिन्हित कर उपनाम के साथ पुकारने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई । उन्होंने भी सहज मुस्कान के साथ मुखातिब होते हुए कहा- ‘क्या आप घर गए थे’ ? मैंने कहा- जी हाँ ! ‘घर पर मेडम ने बताया कि आप गली के अगले मोड़ के बाँये से चाय की दुकान के बगल में पीपल के पेड़ के समीप वाली साइकिल की दुकान पर पंचर बनवा रहे होंगे । तो पूछते हुए यहाँ चला आया ।’ वे बोले-‘ आपने पहचाना कैसे ?’ तो मैंने कहा-‘अब इतना तो समझ में आ ही जाता है । फिर आप सदृश महान व्‍यक्तित्त्व को लाखों में खोजा जा सकता है । वे खिलखिला कर बोले- ‘आप भी कैसी बात करते हैं ‘ मैंने उत्तर दिया – ‘नहीं मैं सच कह रहा हूँ ’। उन्होंने झट से आगे बढ़कर साइकिल सुधारने वाले को भरपूर रौब के साथ बटुआ से छाँटकर बीस का पुराना-सा नोट निकालकर दिया । साइकिल वाले ने नोट को जेब में रखकर पानी के टप में हाथ घुमाते हुए खोज बीन कर, उन्हें कुछ सिक्के वापिस किए । वे ओठों को दोनों ओर से फैलाए हुए आगे बढ़े । उनकी हँसी में मुँह में पुरा सम्‍पदा की तरह अवशेष बत्तीसी के मसूड़ों को और मात्र चार दाँतों को स्‍पष्‍टत: देखा जा सकता था । वैसे वे भी बंधन मुक्‍त होने को बेताब से लग रहे थे । खैर, दाँतों के बारे में हम क्‍या कहें ? हमारे पोपले होते मूँह में भी तो कुल आठ दंत ही अपने भरपूर पीलेपन के साथ सुशोभित हैं । मैं भी उनके साथ हो लिया । मैंने फिर से कहा- ‘आप पहचान गए मैं फलाँ हूँ ।’ उन्होंने दिमाग़ पर विशेष ज़ोर दिए बिना कहा- ‘आप तो फलाँ जगह रहते हैं ।’ मैंने कहा- ‘नहीं अब भोपाल आ गए हैं ।’ थोड़ी दूर चलने पर नरश्रेष्ठ का घर आ गया । उन्होंने गेट खोला और भीतर बरामदे में दाखिल हुए । मुझसे आइए कहते हुए वे बिना देरी किए अंदर कमरे में चले गए । मुझे लगा कि ये सज्‍जन पुरुष लोगों से मिलने-जुलने को कितने आतुर हैं यदि मैं नाम, ग्राम से पूर्व परिचित नहीं भी होता तो उन्‍हें कोई अंतर पड़ने वाला नहीं था । ऐसा लगा कि उन्‍हें तो गपियाने से मतलब था अपरिचित भी हो तो क्‍या अंतर पड़ता है, इंसान तो है इसी धरा का ‍। ‘’बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ, आदमी हूँ आदमी से प्‍यार करता हूँ... हाथ खाली है मगर व्‍यापार करता हूँ वाह ऐसा गीत नीरज ही लिख सकते हैं... ‘’ मैं समझ गया कि वे भीतर मालकिन जी से दोनों हाथ जोड़कर अनुनय विनय करने गए होंगे ? कि देखो - ‘चिल्लाना मत, ना ही गाली बकना । ये बड़ा साहित्यकार है । दूर से आया है । मुझे कभी किसी पुरस्कार बग़ैरह में मददगार हो सकता है । फिर बड़े शहर में रहता है, कभी भूल से पहुँच गए तो एक-दो दिन ठहरने का जुगाड़ भी हो सकता है । ऐसे ही तो संबंध बनते हैं । देखो थोड़ा नमकीन पड़ा हो तो रख देना और एक कप अच्छी- सी चाय ले आना । मुझे चाहो तो बिल्कुल थोड़ी-सी दे देना । मैं तुम्हारा परिचय करा दूँगा। तुम नमस्ते कह देना । चाहो तो खाना खाकर जाइएगा कह देना । वह तो अपने बच्‍चे के साथ प्रतियोगी परीक्षा दिलाने आया है, रुकेगा वैसे भी नहीं । कहने में भला तुम्हारा क्या बिगड़ जाएगा ? किसी को घर आया देखकर, तुम तो बे-वज़ह नाक-भौं सिकोड़ने लगती हो ।’ इस बीच मैंने अपने धूल-धूसरित जूते उतारे और कवि ज्‍येष्‍ठ, सम्पादक श्रेष्ठ के ड्राइंगरूम में जा बैठा और अन्दर ही अन्दर प्रसन्नता महसूस करने लगा कि साहित्य भी बड़े काम की चीज़ है । जिसकी वज़ह से दूसरे शहर में जाकर किसी के घर में बैठने-उठने की गुंजाइश तो बन ही जाती है । भीतर घुसी साहित्यकारिन पत्नी ने मन ही मन गरियाया और कहा -‘साला निखट्टू आखिर आ ही गया !’

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