सूरदास के गुरु बल्लभाचार्य / प्राकट्य दिवस विशेष

शुद्धाद्वैतवाद के प्रवर्तक आचार्य बल्लभ संसार को दुखों का सागर नहीं मानते बल्कि धरती के एक एक इंसान में आनंदकंद कृष्ण के दर्शन करते हैं
ललितपुर। जगतगुरु बल्लभाचार्य की जयंती पर आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए नेहरू महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो. भगवत नारायण शर्मा ने कहा कि आचार्य गुरुदेव बल्लभाचार्य जी का जन्म रायपुर के चम्पारण्य स्थान पर संवत 1535 में हुआ था। इनके पिता आचार्य लक्ष्मण भट्ट और माता गोपालस्वरूप भगवान कृष्ण के उपासक थे। परन्तु पिता का साया जल्दी उठ गया तथापि इन्होंने आचार्य माध्व, शंकर, रामानुज, निम्बार्क आदि दार्शनिकों के विचारों का बड़ी गहराई से मंथन किया। दक्षिण भारत विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय अपने युग का महान विद्यानुरागी था, जिसके यहां आचार्य शंकर के अद्वैतवादी एवं द्वैतवादी दार्शनिक विद्वानों में प्राय शास्त्रार्थ चलता रहता था। ऐसे ही भव्य आयोजन में सदगृहस्थ आचार्य बल्लभ को अंत में अपने विचार व्यक्त करने का मौका मिला। उन्होंने अपनी मान्यताओं को शुद्धाशुद्ध अद्वैत के रूप में पूरी तार्किकता के साथ जब व्यक्त किया तो सारी सभा मंत्रमुग्ध हो गई। प्रतापी राजा कृष्णदेव राय ने उनकी अलौकिक प्रतिभा के सम्मानस्वरूप जब उन्हें मनों सोना दान करने की घोषणा की तो गृहस्थ होते हुए भी उन्होंने विनम्रतापूर्वक लेने से इन्कार कर दिया। तदुपरान्त आचार्य बल्लभ जब बृजभूमि में भगवान श्रीनाथ जी के गोवर्धन पर्वत पर स्थित मंदिर में आये तो वहाँ के साधु समाज ने महान जन्मांध कवि सूरदास से उनकी भेंट करायी। बल्लभाचार्य के अनुरोध पर उन्होंने अपनी विनयपूर्ण भक्ति से ओतप्रोत वैराग्यपरक प्रसिद्ध भजन सुनाया अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल, सूरदास की सबै अविद्या दूर करो नंदलाल। इस भजन को सुनकर महाप्रभु ने सूरदास जी को मीठे गुस्से से तमतमाते हुए फटकार लगायी कि शूर (वीर) होकर आराध्य के सामने ऐसे काहे को घिघियात ? आनंदकंद श्रीकृष्ण की लीलाओं का गायन उन्हें अपना सखा साथी-संगी मानकर क्यों नहीं करते? फलस्वरूप सूर की काव्यधारा ही बदल गयी और उन्होंने बालकृष्ण की लीलाओं के साथ वे ऐसे एकमेक हो गये कि उनके आराध्य को खेल के मैदान में सहखिलाडिय़ों द्वारा कितनी जली-कटी बातों को सहना पड़ रहा है खेलत में को काको गोसैयां, हरि हारे, जीते श्रीदामा, बरबस ही कत करत रिसैयां, जाति पांति हम तें कछु नाहीं, नाहिन बसत तुम्हारी छैयां, अति अधिकार जनावत यातें, अधिक तुम्हारे हैं कछु गैयां। आज से 6 हजार वर्ष पहले द्वापर में भी खेल के वही नियम थे जो आज की भाषा में स्पोर्ट्समैन स्प्रिट कहलाते हैं ,चाहे रंक का लडक़ा हो या राजा का, दांव तो देना ही पड़ेगा। खेल में रिच्याना उनके गुईंयाँ (मित्र)जरा भी बर्दाश्त करने को राजी नहीं होते और वे खेल बन्द करके कान्हा के खिलाफ सत्याग्रह कर देते हैं। परिणामत: उन्हें रोते हुए माता यशोदा और नन्द के पास मिथ्या- फरियाद लेकर जाना पड़ता है। इस प्रकार बल्लभाचार्य द्वारा पुरुषोत्तम भगवान में सत, चित और आनंद में तीनों का आविर्भाव रहता है और जीवात्मा भी उसी आनंदस्वरूप के साथ एकाकार हो जाती है। यह मार्ग प्रत्येक मनुष्य को यह याद दिलाता है कि संसार में उसकी आमद प्यार पाने और प्यार करने के लिए ही हुई है। ईश्वर ही प्रेम है और प्रेम ही ईश्वर है।

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