असंवेदनशीलता की हार - कोरोना जीत गया- डॉ. पुनीत द्विवेदी

‘विश्व हास्य दिवस’ के उपलक्ष्य में पश्चिम बंगाल एवं अन्य प्रांतों, केन्द्रशासित प्रदेशों के विधान सभा चुनाव, उपचुनाव परिणामों ने कईयों को रूला दिया। बड़ी-बड़ी डींगें हाँकने वाले कुछ अति-उत्साही, आत्मकेंद्रित, हवाबाज़ नेता चारों-खाने चित्त पड़े हुये हैं। दरअसल, यह संवेदनशील जनता की जीत है। कुछ हद तक यह कोरोना की भी जीत है। जनता को अब यह लगने लगा है कि नेता अपने स्वार्थ सिद्धि हेतु अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। कोरोना महामारी के इस संकटकाल में जब चुनावों की आवश्यकता बिलकुल ही नहीं थी, अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु चुनाव करवाना, बड़ी-बड़ी रैलियों में अनावश्यक भीड़ एकत्रित करना, कोरोना गाईडलाईंस की धज्जियाँ उड़ा देना, ये सब उस वोट देने वाली जनता के समझ में आ गया है। जनता की नज़र में इनके लिये हमारे जीवन का मूल्य कितना है? यह प्रश्न भी अब विचारणीय एवं प्रासंगिक हो गया। जब दोनों ही असंवेदनशील हों तो जिसका पहले से अनुभव है, का चुनाव करना ही ठीक रहता है।पता नहीं नया वाला असंवेदनशील कितनी चोट करे। जो पूरे देश के नेता हैं, उनसे जनता की यह अव्यक्त अपेक्षा थी कि चुनाव स्थगित हो जाएँ। जनता अंत तक उस पल की प्रतीक्षा करती मतदान केंद्र तक पहुँच गयी। और उन्हें यह लग गया कि उनकी सुरक्षा-आरोग्य की चिंता करने वाला कोई नहीं है। क्योंकि वो आम जनता हैं, मत के अलावा उनके जीवन का कोई विशेष महत्व नहीं। अंदर से उद्वेलित जनता मजबूरन वोट देने तो गई परंतु उस तथाकथित, संवेदनाहीन, शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा कोरोना संक्रमण काल में मतदान कराने के तुगलकी निर्णय को पचा नहीं पाई। चुनाव में लगे अनेक अधिकारी संक्रमित हुये। कई तो काल के गाल में समा गये।रैलियों में जमावड़ों के दुष्प्रभाववश जनहानि होती ही जा रही है।असल में जनता के हृदय पर आघात हुआ है जो अत्यंत पीड़ादायक एवं लंबे समय तक अविस्मरणीय रहेगा, ऐसा प्रतीत होता है। यह तर्क कि शीर्ष नेतृत्व पर बैठा व्यक्ति बहुत बड़ा त्यागी है, कोई मायने नहीं रखता; अगर वह अपनी जनता के प्राणों से अधिक प्रिय चुनाव को मानता है। जनता से चुनाव है, चुनाव से जनता नहीं। यह चुनाव आगे-पीछे भी हो सकते थे। शीर्ष नेतृत्व को महान तब माना जाता जब वह कोरोना संक्रमण से हो रही त्रासदी, मृत्यु के तांडव को दृष्टिगत करते हुये देश-समाज की रक्षा हेतु चुनाव स्थगित कराने के लिये चुनाव आयोग, अन्य अधिकृत शासकीय एजेंसियों से बात करता। ना कि जनता से अपील करता कि घर से बाहर निकलें। मतदान अवश्य करें। ज्ञातव्य है कि कोरोना गाईडलाईंस घर से बाहर जाने से रोकती है। स्टे होम की बातें करती है। ये चुनाव परिणाम आश्चर्य जनक नहीं हैं। परंतु हॉ ,जनता को यह समझ में आ गया है कि हम मात्र कठपुतली हैं। हमारा दुरुपयोग, उपयोग हमारे नेता अपने लाभ के लिये कभी भी कर सकते हैं। हमारे जीवन में आये संकट, हमारे परिवार में उठी लाशों से उनको कोई मतलब नहीं। वो कहने को तो हमारे सरकार हैं पर उन्हें असल में हमारे जीवन-मृत्यु से कोई सर्वकार नहीं। किसी कवि की एक पंक्ति प्रासंगिक हो जाती है...’किसी लीडर को दिल के टूटने का डर नहीं होता, अगर सीने में दिल होता तो वो लीडर नहीं होता’। जनता-जनार्दन अपनी शक्ति को पहचाने। भारतीय संस्कृति के मूल में असंवेदनशीलता का सदा तिरस्कार रहा है।
[ लेखक डॉ. पुनीत कुमार द्विवेदी, मॉडर्न ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूट्स इंदौर में प्रोफ़ेसर एवं समूह निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।]

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