जीवन के इस चौराहे पर

खड़ा बताशे बांट रहा मैं
जीवन के इस चौराहे पर
आकर मुर्दे मांग रहे बस
थोड़ा मुझको थोड़ा मुझको
था कौतूहल ओढ़े दिन भर
रात बीती भोर भी आई
देदी आंख हाथ ह्रदय सब
जिन्दा ना मिल सका एक भी
धू धू कर जल रही चिताएं
अनेकों लदी कुछ हैं खाली
जीवित कतारें तोड़ लड़ रहे
यह मेरी है यह मेरी है
करूं करूं क्या कैसे कुछ भी
हो श्रापित ले कटे अंगूठे
दिख रहे द्रोण परशुराम बस
जीवन के इस चौराहे पर
डॉ एम डी सिंह
( 6 अगस्त सन 2008 को लिखी कविता की आज के हालात में प्रासंगिकता )

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