सच में आप बहुत याद आएंगे सुभाष जी -रतिभान त्रिपाठी

सच में आप बहुत याद आएंगे सुभाष जी
-रतिभान त्रिपाठी
सुभाष मिश्र, राजधानी लखनऊ के पत्रकारिता जगत का एक जाना पहचाना नाम। एक सर्वगुण संपन्न पत्रकार जिनमें संवेदना थी, त्वरा थी और मुद्दों की समझ के साथ उसे प्रस्तुत करने की कला भी। एक पत्रकार में ये सारे गुण आमतौर पर एक साथ दुर्लभ होते हैं लेकिन सुभाष मिश्र में थे। वह द्विभाषी पत्रकार भी थे, जो हिंदी और अंग्रेजी में समान रूप से पकड़ रखते थे। मेरा उनका संपर्क अब से तकरीबन बीस साल पहले हुआ था। उन दिनों भी वह लखनऊ ही क्या, उत्तर प्रदेश भर में अपनी पहचान बना चुके थे। वह इंडिया टुडे के लखनऊ ब्यूरो हेड थे। एक दिन सुभाष जी का फोन मेरे पास आया। बोले रतिभान जी, बधाई। आपने "जागरण उदय" में अच्छी स्टोरी लिखी है। मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और बहुत खुश भी हुआ कि चलो राजधानी के एक अच्छे पत्रकार ने मेरी लिखी स्टोरी की तारीफ तो की। दरअसल, उन्हीं दिनों दैनिक जागरण समूह ने एक राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका शुरू की थी। नाम था "जागरण उदय", जिसके संपादक थे संजय गुप्त जी। तब मैं दैनिक जागरण इलाहाबाद में काम करता था लेकिन राजीव सचान जी ने कहा कि जागरण उदय के लिए आपको लिखना है। संजय भइया ऐसा चाहते हैं। मैंने उसमें स्टोरी लिखनी शुरू की। एक अंक में जागरण उदय में एक स्टोरी छपी और वैसी ही मिलती जुलती स्टोरी इंडिया टुडे में सुभाष जी ने लिखी। सुभाष जी को मेरी स्टोरी अच्छी लगी। मैं उनसे प्रत्यक्ष परिचित नहीं था। उन्होंने कहीं से मेरा नंबर खोजकर मुझे फोन किया था। यह उनकी संवेदनशीलता थी और किसी पत्रकार साथी के प्रति उदार भाव भी। मैं 2010 में इलाहाबाद दैनिक जागरण से ट्रांसफर होकर लखनऊ दैनिक जागरण आया तो सबसे पहले सुभाष जी से ही मिला। इसलिए कि वह मेरे पूर्व परिचित भी थे और सन् 2001 से लगातार संपर्क में भी थे। हम लोग लखनऊ में अक्सर मिलते रहे, कभी किसी ब्यूरोक्रेट के दफ्तर में तो कभी सड़क या चौराहे पर। कैपिटल सिनेमा के पास की चाय की दुकान पर अंशुमान शुक्ल के साथ उनसे मेरी मुलाकात होती तो बातचीत प्रपंच के बजाए खबरों पर ही केंद्रित होती। समाचार और उनके एंगिल की बेजोड़ समझ रखते थे सुभाष जी। मुझे देखते ही मुस्कुराते हुए हाथ हिलाते। उनकी आत्मीयता ऐसी थी। अभी तीन बरस पहले की बात है। मेरे बेटे शुभम ने अपनी पढ़ाई के दौरान लखनऊ में कुछ बड़े मुद्दों पर केंद्रित कांफ्रेंसेज की। अपने कार्यक्रम के सिलसिले में वह सुभाष मिश्र से मिलने टाइम्स ऑफ इंडिया के दफ्तर गया। सुभाष जी ने उससे परिचय पूछा। जब उसने मेरा नाम बताया तो उन्होंने मुझे फौरन फोन कर इस बात की बधाई दी कि आपका बेटा तो बहुत अच्छा काम कर रहा है। ख़बरें लिखने पर हम एक दूसरे ह्वाट्सैप पर भेजते और उन पर डिस्कशन भी करते थे। पत्रकारिता में आ रहे बदलाव और सरकारों के तौर-तरीके भी कई बार जब चर्चा में आते तो सुभाष जी बहुत खुलकर बात करते थे। अभी पिछले हफ्ते रामदत्त त्रिपाठी जी ने मुझसे पूछा कि सुभाष मिश्र की सेहत कैसी है तो मैंने कहा, पीजीआई में शिफ्ट होने के बाद कुछ सुधार बताया गया है लेकिन आज सुबह आशीष मिश्र (इंडिया टुडे) का मेसेज देख कलेजा धक कर गया। सुभाष मिश्र हम लोगों के बीच नहीं रहे। सहसा विश्वास नहीं हुआ। आखिरकार सच को कैसे झुठलाया जा सकता है। कल्पनाओं में ही सही लेकिन पता नहीं क्यों लग रहा है कि हम लोग फिर किसी दिन कैपिटल सिनेमा के सामने चाय का गिलास लिए हुए सुभाष जी के साथ किसी गहरे मुद्दे पर डिस्कशन करते खड़े होंगे। काश यह सच हो सकता। सच में आप बहुत याद आएंगे सुभाष जी।

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