महाकवि भवभूति के उत्तर रामचरित का एक एक शब्द सीता मैया के आँसुओं से भीगा है

सीता नवमी विशेष
ललितपुर। सीता नवमी के पावन अवसर पर आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए नेहरू महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो.भगवत नारायण शर्मा ने कहा कि अनकूल जलवृष्टि की मनोकामना से विदेह के राजा जनक जब स्वयं हलधर बन कर कृष्यभूमि जोत रहे थे, तब निष्काम कर्मयोग के महान साधक को धरतीमाता ने सहसा उन्हें हल की नोंक के समान एक तीक्ष्ण बुद्धिशीला, मिट्टी में लिपटी तेजस्वी कन्या उपहार रूप में प्राप्त हुई। अपनी रानी सुनयना से उन्होंने कहा देखो कैसा अनमोल रत्न हमें मिला। राजा-रानी ने बड़े जतन से और प्यार से इस कन्या का पालन -पोषण किया। गुरु विश्वामित्र से आज्ञा लेकर जब राम लक्ष्मण पूजा के लिए फूल चुनने राजा जनक की वाटिका में पहुंचे तो वहां अकस्मात सखियों सहित गौरी पूजन करते समय सीता और राम दोनों ने एक दूसरे को देखा और अनुरक्त होकर नेत्रों के रास्ते से परस्पर अपने हृदय में बसा लिया। रामकथा के माधुर्य का चरमोत्कर्ष यहां दिखाई देता है लोचन रामहि उर आनि, दीन्हें पलक कपाट सयानी, राम सीता विवाह तात्विक दृष्टि से तो चिरंतन है, किन्तु लौकिक दृष्टि से प्रत्येक घर की अंगनईयां विवाह के समय राजा जनक के विवाह मंडप में रूपान्तरित हो जाती है। घर के बन्ना-बन्नी रामसीता बन जाते है। विवाह मंडप में बैठी तन्मय सीता को देख तुलसी गा उठते है राम कौ रूप निहारत जानकी, कंगन के नग की परछाहिं, में मर्यादित श्रंगार की कैसी अनूठी कल्पना तुलसी ने की है। पाणिग्रहण के समय महर्षि वाल्मीकि ने राजा जनक के कुलपुरोहित सतानन्द महाराज ने जिन वैवाहिक मंत्रों को त्रेता युग में पढ़ा था वे आजतक दक्षिण और उत्तर भारत में वैवाहिक बंधन में बंधते समय आज तक दोहराये जाते है इयं सीता मम सुता, सहधर्मचरी तव, प्रतीच्छ चैनांभद्रं, गृहणीष्व पाणिना, पतिव्रता महाभागा, छायेवानुगतासदा। अर्थात मेरी यह कन्या तुम्हारे साथ धर्म मार्ग में सदा साथी बनकर चलेगी। इसका पाणि (हाथ) ग्रहण करो। तुलसीदास जी भी कहते है रामसीय सिर सेंदुर देंही कहकर चतुर राम ने स्वयं अपने को चिरंजीवी बना लिया। वनगमन के समय राम लक्ष्मण और सीता को देखकर तुलसीदास जी को ऐसा लगता है सानुज सीय समेत प्रभु, राजत पर्णकुटीर, भगति ग्यान वैराग्य जनु, सोहत धरें शरीर, वस्तुत भक्ति की शक्ति से विरागी ब्रह्म में भी प्राणीमात्र के राग के प्रति अटूट बंधन में बाँध दिया। महर्षि बाल्मीकि कहते हैं कि कुश कंटकों को रौंधती हुई सीता मैया राम से भी आगे चलने का साहस रखती हैं। जब रावण अशोक वाटिका में माता सीता के प्रति आक्रोशित होकर दुर्वचन बोलता है तब एक तिनका उठाकर वे कहतीं हैं मैं तुझे इस तिनके से भी तुच्छ समझती हूँ, तृणधरि ओट कहत वैदेही। महाकवि भवभूति ने सीता के पुनर्वनवास को इतना करुण बना दिया है कि जैसे उनका सम्पूर्ण काव्य सीताजी के आँसुओं से भीग उठा हो। महाकवि भवभूति इसीलिए श्रंगार के रसराजत्व को अस्वीकार करके एकोरसा करुण एवं यानि अन्य सभी आठों रस एकमात्र करुण रस के ही अनुगामी हैं।

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