गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जयंती विशेष

टैगोर का जीवन से इनकार करने वाले वैराग्य में विश्वास नहीं था
ललितपुर। सन् 1913 में अपनी काव्यकृति गीतांजलि पर, वे पहले भारतीय साहित्यकार थे जिन्हें नोबेल पुरुस्कार से विभूषित किया गया। कवीन्द्र रवीन्द्र बहुमुखी प्रतिभा के कवि, नाटककार, कथाकार, उपन्यासकार, दार्शनिक, शिक्षाविद्, देशभक्त और एक सच्चे मानवप्रेमी होने के साथ- साथ अपनी 1500 पेण्टिंगों में अदृश्य सौन्दर्य तथा संकटग्रस्त मानव को विपदा से उबारने वाले त्राता और साथी के रूप में दिखाई देने वाले असाधारण चित्रकार भी थे। गीतांजलि के एक गीत में वे कहते हैं कि हे प्रभु जब मैं संकट में होंऊं तो आप मदद के लिए मत आना, हाँ आपसे ये प्रार्थना जरूर है कि विपत्ति के समय मुझे ऐसा आत्मबल देना कि मैं घबराऊँ नही। टैगोर संसार के ऐसे विलक्षण कवि हैं जिनका लिखा राष्ट्रगान भारत और बंगलादेश में गाया जाता है, जो जन गण मन और आमार सोनार बांग्ला के रूप में प्रसिद्ध है। गुरुदेव अपने युग के महान प्रवक्ता थे। उनमें एक निश्छल बालक, एक नारी की तरल करुणा और पुरुषोचित पुरुषार्थ का अपूर्व समन्वय था। उनमें ओज, तीक्ष्ण बुद्धि और कौतूहल के भाव एक साथ दिखाई देते हैं। उन्होंने बच्चों का मन खुशियों से भर देने के लिए काबुलीवाला जैसी कहानियाँ लिखी। उन्होंने चाँदनी के टुकड़े बटोरे और अपनी नया चांद जैसी कविता के शब्दों के थनों में सौन्दर्य के माधुर्य का दुग्ध भर दिया। उनका विश्वभारती शिक्षा संस्थान शान्तिनिकेतन यत्र विश्वम भवति एक नीड़म की तरह है जिसमें विश्व भर के शिक्षार्थी पक्षी एक घोंसले की तरह उसमें डेरा डालते हैं। उनकी रचनाओं की जड़ें भारत की भूमि में हैं, पर उनका अनुभव सारभौम है इसलिए पूरा संसार उन्हें पढ़ता है। टैगोर के विचार में सम्पूर्णता और एकता है, क्योंकि आजीवन उन्होंने विखराव और विभाजन के विरुद्ध संघर्ष किया। उनका अडिग विश्वास था, अज्ञान बंधन है और ग्यान मुक्ति है। भगवान को विश्व में महसूस करना और अपने भीतर भी महसूस करना, उसे ज्ञान से जानना, प्रेम के माध्यम से देखना और आचरण से प्रचारित करना, यह काम हैं, जिसे भारत ने अपने बुरे दिनों में भी नहीं छोड़ा।

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