आया

आया रौशनी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा हैं उसके सोचने समझने की शक्ति जैसे खत्म सी हो गई हैं । उसका छोटा बेटा रोए जा रहा है लेकिन उसको कोई असर ही नहीं पर रहा हैं । उसका जीवन जैसे फिसलता जा रहा हो । आस-पड़ोस से आये लोग और उसके मायके वाले उसको सहुलियत दे रहे थे । मायके के नाम पर केवल उसके एक भाई-भाभी और उसका एक लड़का था पर उसे जैसे सब कुछ सुनाई देते हुए भी कुछ सुनाई नहीं दे रहा था । उसे अपने आगे का जीवन अंधकारमय दिख रहा था । उसके बड़े बेटे को समझ में नहीं आ रहा था कि क्यों उसके पापा सोये हुए है और उनपर बहुत सारे माला और फूल रखे हुए हैं । थोड़ी देर बाद जब वह देखता हैं कि उसके पिता को चार लोग कंधे से उठा कही ले जा रहे है और वह कुछ कर नहीं रहे तो उसे कुछ अजीब लगता हैं और वह पूरे दम लगाकर चीखता है फिर अपने पिता को कहीं न ले जाने की विनती करता है फिर भी जब उसकी बात कोई नहीं मानता तो वह जोड़-जोड़ से रोना आरम्भ कर देता है उसे देख उसका छोटा भाई भी रोने लगता हैं। अपने दोनो बेटो के रोने की आवाज से रौशनी अपने वर्तमान स्थिति में वापस आती है और अपने पिता के उम्र के सुहाग को अपनी अंतिम यात्रा के लिए जाते देख चित्कार कर उठती है । प्रत्येक मनुष्य को तो अपने अंतिम यात्रा को पूरा करने के लिए बाध्य होता हैं अत: उसका पति भी चला जाता हैं । धीरे-धीरे पड़ोसी संगे सम्बन्धी सभी चले जाते है। रौशनी की भाभी उसे हिम्मत देते हुए कहती हैं- ‘हिम्मत से काम लो रौशनी अगर तुम ही इस तरीके से टूट जाओगी तो इन बच्चों का क्या होगा, कौन सम्भालेगा इन्हें।’ भाई ने भी दिलासा देते हुए कहा –‘देखो रौशनी हिम्मत से काम लो हम सब तो है ही । खुद को कभी अकेला मत समझना कुछ जरुरत पड़ते ही फोन करना ।’
रौशनी के विवाह के छ: साल ही हुए थे । जब वह बीस साल की थी तो उसका विवाह उसके पिता के उम्र के बराबर के एक आदमी से हुई थी । रौशनी के पिता मील में काम करते थे और उसके भाई का सैलून का दुकान था । जीवन भर मील में हाथ घिसते-घिसते पापा की कमर की हड्डियां भी घीस गई थी जिसके कारण उन्हें बैठने तक मेम कठिनाई होती थी । माँ तो बचपन में ही छोड़कर स्वर्ग के रास्ते चल पड़ी थी । घर का सारा बोझ भाई के कंधे पर था । सैलून के दुकान के सहारे ही उसे अपने घर को चलाने के साथ-साथ बहन की शादी और बाप का देख-रेख भी करके एक बेटे का कर्त्तव्य भी निभाना था । जब बहन उन्नीस साल की हुई तो भाई ने बहुत सारे लड़को को देखा बहुत किसी के पास अपने बहन के रिस्ते को लेकर गया लेकिन सभी ने दहेज के लिए इतने बड़े मुंह खोले जिसको बंद करने की क्षमता उसके पास नहीं थी । फिर एक दिन किसी ने एक लड़के के विषय में बताया । उस लड़के में उम्र को छोड़कर और किसी भी चीज की कमी न थी । उसके आय का स्तर भी रौशनी के परिवार की तरह ही था । वह एक राजमिस्त्री था । उसकी दहेज की मांग भी कुछ नहीं थी । उसके परिवार में बस वह और उसकी मां रहती थी । जब उस लड़के की उम्र ही पैतालिस थी तो उसकी मां का पूंछना ही क्या, जीवन के अंतिम चरण पर वह खड़ी थी ।
उस लड़के के उम्र को लेकर रौशनी कै भाई बहुत ही झिझका लेकिन दहेज देकर अपनी बहन का विवाह करवाना भी उसके सामर्थ्य से बाहर की बात थी । पिता ने भी आग्रह किया और अपने बेटे को समझाते हुए कहा- ‘देखो बेटा हम जैसो के साथ सायद ऐसा ही होता है मेरी जो हालत है उसके अनुसार मुझसे तो कुछ करने से रहा जो करना है तुम्हें ही करना है, पहले से ही मेरे कमर और तबीयत के वजह से तुमने कर्ज ले रखे है। अब और कर्ज लोगे तो भरोगे कहा से । सायद उसकी शादी वही होनी लिखी है ।’ भाभी की तो कुछ राय ही नहीं थी । अपने पति और ससुर के समक्ष उसकी कुछ चलती ही न थी ।
रौशनी के भाई-पिता इस रिस्ते से काफी खुश थे । वह लड़का भी रौशनी को देखकर उसको पसन्द कर चुका था । जब सब राज़ी ही थे तो रौशनी क्या बोलती और कैसे बोलती ? रौशनी कम पढ़ी-लिखी लड़की थी उसने बस प्राथमिक स्कूल ही पढ़ा था । जब वह कक्षा पाँच में पढ़ती थी उसी समय उसकी मां भगवान को प्यारी हो गई थी । एक तो शिक्षा का अभाव उसपर से अपनी जरुरत तक के लिए मुंह खोलना उसने सिखा नहीं हमेशा परिस्थितियों के समक्ष अपनी इच्छाओं का त्याग करती रही ।
उसकी शादी उसी लड़के से हो जाती हैं। वह भी रोज कमाने और खाने वाला लड़का रहता हैं ।रौशनी अपनी सास की सेवा और घर गृहस्थी को ही सम्भालने में व्यस्त रहती हैं । शादी के छ: महीने बाद सास की मृत्यु हो जाती है । उसके जीवन की गाड़ी इसी सब के बीच चलती रहती है । बीच-बीच में वह कुछ समय के लिए मायके भी जाती है । पति से अपने उम्र का इतना फासला उसे कभी अखरता नहीं क्योंकि उसने इस बात को अपना लिया था । शादी के दो वर्ष बाद उसको एक बेटा होता है । सभी खुश रहते है । वह जितने में रहते उतने में ही अपनी खुशियों में आस-पड़ोस को सामिल करते है और भोज रखते है । रौशनी भी बहुत खुश है । उसका पति कैसा भी हो पर उसे मानता है । इस बात की उसे संतुष्टि है ।
जीवन की गाड़ी इसी तरह कभी रुकते हुए तो कभी तीव्र गति से चलती रहती है । इसी बीच रौशनी के पिता का भी देहान्त हो जाता है । रौशनी अपने पिता का बहुत आदर करती थी इस घटना से वह बहुत आहत होती है लेकिन जीवन तो जीना ही होता है । इसी तरह दो साल और बीत जाते है, उसके घर में एक और फूल खिलता है। इस बार भी उसे बेटा ही होता है, लेकिन इस बार यह पल उतना खुशनुमा नहीं रहता क्योंकि रौशनी के पति की सेहत काफी खराब रहती है । बहुत कहने पर भी वह डॉ. पास नहीं जाता । एक दिन रौशनी अपने भाई को बुलाती है और अपने पति को डॉ. पास जबरदस्ती भेजती है । जांच वैगेरह के बाद पता चलता है कि उसके पति को टी. वी. है और वह भी अंतीम चरण पर हैं । यह सुनते ही रौशनी के पैरों तले जमीन खिसक जाती है । बहुत सारे डॉ. और दवा दारु चलाने के बाद भी उसका पति नहीं बचता जो पैसे रौशनी ने बचाये रखे थे वह पैसे भी इसी में झोंका गये ।
रौशनी को खाने के लाले पड़ने लगे । उसका भाई उसे और उसके बच्चे को अपने घर लेकर गया । एक दिन उसने रौशनी से कहा ‘देखो रौशनी अब तो तुम्हारे सामने पूरा जीवन पडा है। अभी तो तुमने दुनिया देखनी शुरु ही की है तुम्हारी उम्र अभी महज छब्बीस वर्ष ही है। तुम्हारे साथ-साथ दो नन्ही से जाने भी है, बेहत्तर होगा की तुम दूसरी शादी के विषय में सोचो।’ ‘ये क्या बोल रहे है आप भैया’ रौशनी ने जैसे अपने जीवन में पहली बार प्रश्न किया हो । ‘किसी विधवा के साथ जिसके दो बच्चे भी हो कौन शादी करना चाहेगा ।‘
‘बहुत सारे लोग है और यह बाते आम हो गई है तुम्हीं बताओं तुम क्या करोगी । मैं तो हूं लेकिन फिर भी पिता के नाम की बात ही अलग होती है।’
‘ऐसा बाप जिसका बच्चा सौतेला हो क्या वह उसके लिए सही अर्थो में पिता हो सकता है।’
‘हां क्यों नहीं। तुम हाँ बोलो तो मैं रिश्ते के लिए देखता हूं । दो दिन का समय ले लो ।’
रौशनी के लिए यह फैसला लेना बहुत ही कठिन था । वह दोनो दिन रात में सो नहीं पाई। उसके सामने उसके दोनो बच्चों के चेहरे बार-बार आ जाते थे । वह समझ नहीं पा रहीं थी कि वह क्या करे उसने सुन रखा था कि- ‘बिन बाप की औलाद य़ा तो बन जाती है या तो बिगड़ जाती है।’ वह अपने संतानो को बिगड़ते हुए देखना नहीं चाहती थी और बनाने के लिए उसके पास संसाधन ही क्या थे । एक भाई है तो उसकी भी तो घर गृहस्थी है और उस पर से मुझे कुछ पढ़ना लिखना आता नहीं मैं कर भी क्या सकूंगी सिवाये अपने भाई पर बोझ बनने के । बहुत मसक्कत के बाद उसने दुबारा शादी करने का फैसला ले ही लिया । उसने अपने भाई को अपनी राय बता दी । उसके भाई ने भी लड़का खोजना शुरु कर दिया । एक आदमी मिला जिसकी पत्नी मर चुकी थी और उसका पाँच साल का लड़का था । भाई ने उसके विषय में विषय में रौशनी को बताया । रौशनी का पहला प्रश्न यहीं था कि क्या वह उसके बच्चों को स्वीकारेगा । भाई ने कहां हाँ उसने कहा है उसे बच्चों से कोई आपत्ति नहीं । उसका नाम कृपाशंकर रहता है वह प्राइवेट कम्पनी में बारह हजार महीने की तनख्वाह पर कार्य करता है । रौशनी मान जाती है । शादी मंदिर में सम्पन्न हो जाता है । शादी के बाद रौशनी अपने बच्चों को लेकर कृपाशंकर के घर चली जाती है । एक औरत अकेले अपने जीवन का निर्वाह कर सकती है पर एक मर्द नहीं । अपनी इसी वासना की विवशता वश कृपाशंकर ने दूसरी शादी की थी । उसका असली रंग रौशनी के सामने धीरे-धीरे आने लगा । वह अपने बच्चे को प्राय: मिठाईयां और खिलौने लाता लेकिन रौशनी के बेटो के लिए कुछ नहीं लाता वह तरस कर रह जाते । रौशनी कुछ बोल नहीं पाती थी । एक दिन तो हद ही हो गया । जब रौशनी के बच्चो कृपाशंकर से खिलौने के लिए जिद्द करने लगे तो कृपाशंकर ने उन्हें बेल्ट से पीटा । रौशनी ने उसको रोका ‘ऐसे कोई मारता है क्या बच्चों को।’
‘हां ऐसे बच्चों मार खाने के लिए ही बने हैं ।’
‘क्या मैं कभी तुम्हारे बच्चो को अपने बच्चों को अलग मानती हूँ तो फिर तुम क्यों इन्हें देखना भी नहीं चाहते।’ ‘क्योंकि यह मेरे संतान नहीं है और तुम भी कान खोलकर सुन लो अगर तुम्हें रहना है तो रहो लेकिन ये दोनो नालायक यहां नहीं रहेंगे।’ एक औरत सबकुछ सह सकती है लेकिन अपने बच्चे का तिरस्कार या उनका कष्ट नहीं । उसने जोड़देकर पूछा- ‘मैं जब यहां रहूंगी तो ये कहा जायेंगे?’
कृपाशंकर ने उसी रोष में कहा –‘कही भी जाये तुम अपने मायके छोड़ आओं या फिर कई अनाथालय है,दुनिया काफी बड़ी है मुझे फर्क नहीं पड़ता कही भी रहे भाड़ में जाये ।’
गुस्से से रौशनी के नथुने फुलने लगते है वह पूरा बल लगाकर एक जोड़ की चपत कृपाशंकर के गाल पर लगाती है और उसी आक्रोश में कहती है-‘भाड़ में जाओं तुम । तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे बच्चों के लिए इस तरह की बात बोलने की । मैंने उनके भविष्य के लिए ही तुमसे शादी की थी,तुमने भी बोला था कि तुम्हें उनसे कोई दिक्कत नहीं हैं।’
कृपाशंकर ने रौशनी का यह रुप कभी नहीं देखा था वह पिंजरे के शेर जैसा गरज कर बोला-‘बोला था लेकिन अब मैं उन्हें नहीं रखना चाहता अब वह इस घर में नहीं रह सकते।’
ठीक है जब वे इस घर में नहीं रह सकते तो मैं भी यह घर छोड़कर आज और इसी वक्त जा रही हूं रौशनी पैर पटकते हुए कमरे में जाती है और अपने समाज बांधने लगती है।
कृपाशंकर उसी आवेश में बोलता है-‘सोच लो एक बार अगर तुमने इस घर की दहलीज को एक बार पार कर लिया तो फिर कभी इस ओर पलट कर देखना भी नहीं ।’ ‘लानत है तुम जैसे झुठे पर और ऐसे घर पर जो घर नहीं मकान हैं।’ इतना कह वह बच्चों और अपने समान को ले निकल पड़ती है। निकलने को तो वह निकल गई लेकिन भाई के घर को छोड़कर उसके पास और कोई चारा भी न था । वह वही जाती है । उसके समान और बच्चों को देख उसका भाई घबड़ाते हुए पूछता है-‘क्या हुआ ? रौशनी तुम अचानक इस तरह....’ ‘भईया मेरे भाग्य ने वहां पर भी अपना रंग दिखा दिया।‘ उसने अपने को संभालने हुए वहां हुई पूरी बात बताई। ‘अच्छा बहन तुम चिंता मत करो जाओ आराम करो। तुम्हारी भाभी ने खाना बनाया होगा बच्चों को खिलाओं उन्हें भुख लगी होगी।’ भाई ने उसे उसे तो चिंता करने से मना कर दिया लेकिन रौशनी का भविष्य उसके सामने पुन: चिंता का विषय बन खड़ा हो गया ।
रौशनी ठीक से कुछ खाती पीति नहीं थी दिनभर ऐसे ही भविष्य की चिंता में व्यतित हो जाता । एक शाम उसकी भाभी ने रौशनी को पार्क चलने के लिए कहा। रौशनी का मन नहीं था लेकिन बड़े बेटे की जिद्द से वह पार्क में जाती हैं। वहां बच्चों की बहुत भीड़ थी जो अपनी-अपनी मां के साथ आये थे। रौशनी वहीं पार्क के एक कोने में जाकर बैठ जाती है और बच्चे अपने मामी के साथ झुला-झुलने में व्यस्त हो जाते है। इतने में ही एक बच्ची खेलती हुई रौशनी के पास आती है। रौशनी को वह बच्ची बहुत प्यारी लगती है वह उसे अपने पास बैठाती है और उससे बात करने लगती है। इतने में ही एक औरत व्याकुलता के साथ उस छोटी सी बच्ची को ढ़ूढ़ते हुए आती है और उस बच्ची को देख उसके चेहरे पर राहत आती है-‘बिटिया तुम यहां हो मैं पूरे पार्क में तुम्हें ढ़ुढ़ रही हूं।’
‘क्या यह बच्ची आपकी है?’ रौशनी ने पूंछा। ‘अरे नहीं बहन जी मैं तो इसकी देख-भाल करती हूं यह तो यहां के एक साहब की बेटी है, मैं उनके यहां आया का काम करती हुं।’
‘आया का काम’ यह सुनते ही रौशनी के दिमाग में एक विचार उत्पन्न होता है। वह उस औरत से कौतुहलपूर्वक पूछती है ’यह काम आपने कैसे पाया?’
‘यहीं पर एक संस्था है जहं पर औरतें अपना नाम दर्ज करा सकती है। वे लोग उनको आया के तौर पर चयन कर जहां आया की जरुरत होती है वहां भेजते है अच्छा अब मैं चलती हूं।’
रौशनी घर जाती है उसके मन में विचारों का सैलाब चलने लगता है वह स्वयं से बात करने लगती है-‘मैं पढ़ी-लिखी तो नहीं हूं लेकिन कुछ काम कर अपने बच्चों को अपने दम पर स्वालम्बी तो बना ही सकती हूं’। उसने अपने भाई से उस संस्था के विषय में बात किया । उसके भाई को कोई आपत्ति नहीं थी । उसने उसका समर्थन करते हुए कहा-‘अगर तुम कुछ करना चाहती हो तो कर सकती हो।’ जैसे-तैसे रौशनी ने रात काटी अगली सुबह रौशनी के जिन्दगी में आशा की किरण लेकर आया। वह सुबह तैयार होकर नास्ता कर उस संस्था में जाती है और नामांकन कराती है। रौशनी के अन्दर अब एक नया जोश और नई उमंग धीरे-धीरे जागने लगे थे। वह अब अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में दाखिला करने के अपने विचारों को पूर्ण होता हुए देखने लगी।
रौशनी को संस्था के तरफ से कुछ खबर आने का बेशबरी से इंतजार था। आखिर एक दिन उसकी इंतजार की घड़िया खत्म होती है। संस्था की तरफ से उसे बुलावा आता है। वह जल्दी से उत्साह और उत्सुकतापूर्वक तैयार होकर जाती है। संस्था वालो ने कहा-‘रौशनी जी यहां से दस किलोमीटर की दूरी पर एक दो महीने के बच्चे के लिए एक आया की जरुरत है। क्या आप जाना चाहेंगी?’
रौशनी की खुशी का ठिकाना न रहा-‘हां जी मैं जाऊंगी।’
‘कितने रुपये मिलेंगे वह तो सुन लीजिए’।
‘वे जो देंगे मुझे मंजूर होगा।’
‘वे लोग तेरह हजार देने को तैयार है।’
रौशनी के खुशी का ठिकाना न रहा ‘कब से जाना होगा?’
‘बस दो दिन बाद से ही। पत्ता इस पेज पर लिखा हुआ हैं।’
‘जी सुक्रिया अब मैं चलती हूं।’
रौशनी जब घर गई तो वर्षो बाद उसके चेहरे पर खुशी और चमक थी। उसने सब का मुंह मीठा कराते हुए अपने नौकरी के बारे में बताया। तीसरे दिन से ही वह ‘आया’ की नौकरी पर जाने लगी। जब वह जा रही थी तो थोड़ी घबड़ाई हुई थी लेकिन जब वह उस घर के लोगो से मिली तो उसकी घबड़ाहट दूर हो गई। वे लोग बहुत अच्छे थे। उनलोगो ने उसे एडवान्स के रुप में सात हजार रुपये दिये जिसमे से कुछ पैसे उसने अपने बड़े बेटे को स्कूल में नाम लिखाने में खर्च किया। छोटा बेटा अभी आँगन बाड़ी में जाया करता था। उसने बच्चों के लिए ट्यूशन भी रख लिया। अब वह रोज अपने बच्चों को स्कूल छोड़ती फिर अपने नौकरी पर जाती। घर के लिए भी वह कुछ राशन के सामान प्राय: लेते आती ताकि वह अपने भाई पर बोझ न बने। अब वह पूरे स्वाभिमान के साथ अपना जीवन सुखमय तरीके से अपने बच्चों और अपनी नौकरी में तल्लीन हो ज़ीने लगी।
 -अलका गुप्ता,
प्राथमिक शिक्षिका,पश्चिम बंगाल

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