संस्मरण: भाषा का सम्मान



उन दिनों मैं ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ती थी. त्रैमासिक परीक्षा के पहले ही हमारी हिंदी प्राध्यापिका मैटर्निटी लीव पर चली गई. नई अध्यापिका ने हमारी एक भी कक्षा नहीं ली थी. वे हमसे और हम उनसे नितांत अपरिचित थे.

परीक्षा के बाद कक्षा में उत्तर पुस्तिका दिखाने का क्रम शुरू हुआ. तब हिंदी विषय में तीन प्रश्न पत्र होते थे; गद्य-34 नं., पद्य-34 नं., और तीसरा-32 नं. का संस्कृत+हिंदी निबंध.

हमारी हिंदी अध्यापिका ने सबसे पहले गद्य की उत्तर पुस्तिका दिखलाई. वे छात्राओं के नाम पुकारने के साथ -साथ प्राप्तांक भी बोलती जा रही थी. हमारी कक्षा में 47 छात्राएं थी. एक सिरे से किसी के 5 नं, किसी के 7 नं, किसी के 3 नं.! यानि दहाई के अंक तक बस तीन या चार छात्राएं पहुंची थी.

मैं रोने-रोने को हो आई, कक्षा की अच्छी छात्राओं में गिनी जाती थी. मुझे 14/34 नम्बर मिले थे, कक्षा में सर्वोच्च! उत्तर पुस्तिका में तीन चार जगह उन्होंने टिप्पणियाँ लिख रखी थी--'आप अच्छा लिख सकती है', 'शब्दों का चयन अच्छा है', 'आप में प्रतिभा है' आदि आदि.

उन्होंने हृस्व, दीर्घ, अनुनासिक, अनुस्वार आदि मात्राओं की गल्तियों पर जी भर कर नम्बर काटे थे. 

बाद में कक्षा में समझाया था-- अंग्रेजी शब्दों की स्पेलिंग पर आप सभी जितना ध्यान देती हैं, हिंदी की मात्राओं पर भी उतना ही ध्यान देना आवश्यक है. शुद्धता के प्रति उनके इस आग्रह ने हम सभी में भाषा के प्रति सम्मान भाव जगाया. उनकी फटकार और प्रोत्साहन दोनों ही मन में आज भी बसे है. 

उन्हें करबद्ध नमन

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