फेसबुकियाा फ्रेंड और मन की बात..!


जी हाँ, सही पकड़े हैं..! बोलते हुए उसने कहा... मित्र नहीं फ्रेंड...! अब मित्रता है कहां..? अब तो फ्रेंडशिप का जमाना है साहब। एक समय था, जब मित्रता होती थी..! गलबहियां मित्र, पटकनियां मित्र या दुलारा दुश्मन। सुनने में दो, किंतु पात्र एक। जो मित्र, वही दुश्मन भी। पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा... तर्जनी और कनिष्ठा उंगली को सटा-सटा कर बनाई, कटाई जाने वाली चुंबकीय संबंध। उंगली मिली तो मित्र, उंगली मिलाकर ही कट्टीस्स..! अब मित्र और शत्रु दोनों के लिए अलग-अलग पात्रों के सहारे जीना मजबूरी है। मित्र, वह भी वर्चुअल। फेसबुकिया, व्हट्सपिआ और क्या क्या.?

वह बोलता रहा... समाज में शत्रुओं के प्रकार अनगिनत, किन्तु आकार फिजिकल हैं। वे कदम-कदम पर सामने आएंगे, मुस्कुराएंगे गरियाएंगे और तंग करेंगे। किंतु मित्र नामक प्राणी अब वर्चुअल हो गए, सॉफ्ट कॉपी में स्क्रीन पर ही मिलते हैं। मिलते भी नहीं, केवल जुलते हैं। सोशल मीडिया नहीं होता, तो जुलते भी नहीं..? मेरे भी दर्जनों फेसबुकिया फ्रेंड हैं। कभी देखा न जाना, वे भी खिड़की से कूद कर आ गये। कालांतर में मुश्किल होने लगी, सो विद्वतजनों ने कुछ दिन इसे बंद रखने की सलाह दी। तत्काल काल्पनिक लोक से मुक्ति तो मिल गई साहब, किन्तु बड़ा घाटा हुआ। उम्र में दस पन्द्रह साल बड़े, भाई एवं पिता की उम्र के लोग मुझसे दुखी हो गए। कारण, उन्हें फेसबुकिया फ्रेंड नहीं बनाया। अब सोचिए, जो पिता है या बड़ा भाई है उसे फ्रेंड कैसे बनाया जा सकता है.? पिता तो पिता है और बड़े भाई का स्थान भगवान राम जैसा। मित्रता का दर्जा देकर उन्हें छोटा कैसे कर दिया जाए..? आदर एवं अनुशासन वाले शब्दों में गलबहियां और कॉमेंट की मिश्री कैसे मिला दी जाए..? ...बहुत गुबार था उसके अंदर...।

वह फिर बोला... अब असली मुद्दे पर आते हैं साहब। मेरी फेसबुकिया खिड़की लंबे अर्से बाद फिर से खुली। किंतु यह क्या.? यहां तो मतांतरों का भीड़ है। विज्ञापनों का ससुराल भी। अब यह फेसबुक (चेहरे की किताब) नहीं, व्यक्तिगत उपदेशों की नायाब खटाल है। अच्छा हुआ अंग्रेज़ों के समय नहीं थी, अन्यथा पूरी भारतीय युवा शक्ति फेसबुक पर ही असहयोग आंदोलन छेड़ देती। तनिक सोचिए... यदि भारत छोड़ो आंदोलन फेसबुक पर होता..? तब गिरमिटिया मजदूर फेसबुकिया मजदूर कहलाते। बापू को चंपारण की धरती नापनी नहीं पड़ती। वे बिरला मंदिर में बैठे-बैठे फेसबुक व्हाट्सएप से ही अहिंसक विद्रोह कर देते। लाठीचार्ज से भी सुरक्षित। कितना अच्छा होता कि सत्य और अहिंसा का अद्भुत प्रयोग फेसबुक व्हाट्सएप के माध्यम से चलता। चरखे तकली सबकुछ फेसबुक पर चलते। बकरी दुहना ब्रहमचर्य पर शोध, दांडी यात्रा और नोआखाली सत्याग्रह... प्रार्थना सभायें... सभी लाईव आते। जनता जनार्दन बेडरूम में ही बैठकर बापू की महानता देख रही होती। लोग जिसे चाहते फ्रेंड-अनफ्रेंड कर देते। तब भारत छोड़ो आंदोलन से डरी हुई कंपनी सरकार झट से इंटरनेट बंद कर निश्चिंत हो जाती... या डर के इंडिया से भाग ही जाती..? हम लोग और शान से, जोर लगा कर गाते "...बिना खड़ग... बिना ढाल..! "

उसने आसमान निहारा। लंबी उसांसें ली और बोला.. ओह, तब कितने पिछड़े थे हम..? उसके चेहरे पर उभरे अतृप्त भाव और इस आधुनिक टूलकिट के कारण मेरा भी मन कचोटने लगा। मैंने स्वयं को लॉग आउट कर लिया। " मन की बात " मन में ही धरी रह गई...!

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-अमर तिवारी



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